रविवार, 11 अक्तूबर 2015

क्या आरक्षण पर पुनर्विचार अथवा उसका आधार बदलने की ज़रुरत है?



क्या आरक्षण पर पुनर्विचार अथवा उसका आधार बदलने की ज़रुरत है?
-एस.आर. दारापुरी राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट   
बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान मायावती ने एक बार फिर सवर्ण तबके के गरीब लोगों के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत की है. इस से पहले जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री थीं तो उन्होंने गरीब सवर्णों के लिए आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण देने की घोषणा की थी. यद्यपि मायावती की यह घोषणा सर्वजन के फार्मूले के अंतर्गत सवर्ण वोटों को आकर्षित करने का प्रयास है परन्तु इससे भाजपा व् अन्य आरक्षण विरोधियों की आरक्षण के आधार को जाति के स्थान पर आर्थिक किये जाने की मांग को बल मिलता है जो कि दलितों/पिछड़ों के हित के खिलाफ है.
आरक्षण के बारे में एक भ्रम यह भी फैलाया गया है कि आरक्षण की समय सीमा केवल दस वर्ष थी. यह केवल अर्ध सत्य है. संविधान में दस वर्ष की समय सीमा केवल राजनैतिक आरक्षण की है जो कि समय समय पर बढ़ाई जाती रही है. सरकारी सेवाओं तथा शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण की कोई समय सीमा नहीं है क्योंकि इन को पूरा करने में बहुत लम्बा समय लगने की सम्भावना है. शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश में आरक्षण के बारे में यह भी भ्रान्ति है कि इस में अंकों के प्रतिशत की कोई सीमा नहीं है. इस बारे में सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का अंकों का प्रतिशत सामान्य जातियों के कट आफ प्रतिशत से किसी भी तरह 10% से अधिक नहीं होगा. यहाँ यह भी स्पष्ट करना है कि आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों को केवल प्रवेश स्तर पर ही अंकों में ढील मिलती है न कि परीक्षा पास करने में.   
यह सर्वविदित है कि हमारे संविधान में आरक्षण का आधार सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़ापन तथा सरकारी सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है. यह आरक्षण दलितों तथा इन क्षेत्रों में पिछड़े समूहों जिन में पिछड़ी जातियां शामिल हैं को दिया गया है. इस में कहीं भी आर्थिक आधार की बात नहीं है. इसी लिए जब जब किसी भी पार्टी की केन्द्रीय सरकार या प्रांतीय सरकार ने आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का प्रयास किया है वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किया जाता रहा है. हाल में राजस्थान में भाजपा की सरकार ने आर्थिक आधार पर 14% आरक्षण देने की घोषणा तो कर दी है परन्तु इसका हाई कोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किया जाना निश्चित है.
लगभग सभी राजनैतिक पार्टियाँ समय समय पर सवर्ण गरीबों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का वादा अथवा घोषणा करके वोट लेने की कोशिश करती रही हैं जबकि वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत ऐसा करना बिलकुल संभव नहीं है. फिर भी राजनैतिक पार्टिया जान बूझ कर आम लोगों को इस प्रकार का झांसा देती रहती हैं. आरक्षण के बारे में एक बात स्पष्ट तौर पर समझ लेनी चाहिए कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन प्रोग्राम नहीं है. यह तो सदियों से हिंदुयों की सामाजिक व्यवस्था द्वारा वंचित किये गए तबकों की प्रशासनिक, शैक्षिक एवं राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व देने का प्रयास मात्र है. संविधान निर्माण के समय आरक्षण के आधार के बारे में यही राष्ट्रीय सहमती बनी थी. हाँ यह बात सही है कि सवर्ण जातियों में भी गरीब लोग हैं. परन्तु उन की गरीबी दलितों और पिछड़ों पर सदियों से थोपे गए सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ेपन के मुकाबले में बहुत तुच्छ है. क्योंकि वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें आर्थिक आधार पर आरक्षण देना संभव नहीं है अतः उन्हें छात्रवृति तथा सस्ता क़र्ज़ आदि देकर शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए.
आज कल घुमा फिरा कर आरक्षण पर कोई भी बहस इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पर आ जाती है. इसी लिए सब से पहले यह देखना उचित होगा कि क्या आरक्षण का उद्देश्य पूरा हो गया है? समाज के जिन तबकों को आरक्षण दिया गया था क्या वे राष्ट्रीय स्तर पर सभी क्षेत्रों जैसे सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक में अन्य वर्गों के समतुल्य स्थान प्राप्त कर गए हैं? अभी तक का मूल्यांकन तो यह दर्शाता है कि उन की हालत में बहुत मामूली सुधार हुआ है. यदि दलितों को केन्द्रीय सरकार की सरकारी सेवाओं में 65 वर्षों में प्राप्त हुए प्रतिनिधित्व को देखा जाये तो वह प्रथम श्रेणी की सेवाओं में 22-1/2% आरक्षण के विरुद्ध मुश्किल से 15% तक पहुंचा है. इस के मुकाबले में 24 वर्षों में इस वर्ग की सेवाओं में पिछड़े वर्ग के 27% आरक्षण के विरुद्ध उनका प्रतिनिधित्व केवल 4% तक ही पहुंचा है. इसी तरह अगर शिक्षा के क्षेत्र में देखा जाये तो देश भर के विश्वविद्यालयों में दलित वर्ग के प्रोफेसरों का प्रतिनिधित्व मुश्किल से 2% भी नहीं है. यह भी देखा जाना चाहिए कि इतने वर्षों के बाद भी तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में इन का कोटा पूरा क्यों नहीं हो पाता है? अतः यदि आरक्षण पर किसी पुनर्विचार की ज़रुरत है तो वह इस की निम्न उपलब्धि के कारणों के बारे में गहन विचार करने की है न कि इसे समाप्त करने अथवा इस का आधार बदलने के बारे में. यह भी याद रहना चाहिए कि आरक्षण व्यवस्था का लक्ष्य दलितों और पिछड़े वर्गों को विशेष अवसर देकर राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना भी है.  
दरअसल वर्तमान में आरक्षण विरोध का मुख्य कारण सवर्ण तबकों में बढ़ती हुयी बेरोज़गारी है. यह सर्विदित है कि सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के कारण सरकारी क्षेत्र में नौकरियां बराबर कम हो रही हैं और सरकार अपना खर्चा कम करने के लिए नयी नौकरियां नहीं दे रही है. केंद्र में वर्तमान भाजपा सरकार ने अपना खर्चा घटाने के इरादे से एक साल तक कोई भी भर्ती न करने की घोषणा की है. 1991 में नई आर्थिक नीति लागू करते समय निजीकरण तथा भूमंडलीकरण के माध्यम से रोज़गार के अवसरों के असीमित बढ़ने के सपने दिखाए गए थे परन्तु परिणाम बिलकुल उल्टा निकला है. रोज़गार के अवसरों में बढ़ोतरी के स्थान पर कमी हुयी है. भाजपा की वर्तमान सरकार ने भी चुनाव में हर बेरोजगार को काम देने का वादा किया था परन्तु अभी तक इस दिशा में कोई भी उपलब्धि दिखाई नहीं दी है. दूसरी तरफ निजी क्षेत्र जिसे मोदी हर तरह की सुविधा/छूट दे रहे हैं, लाभ कमा  कर मालामाल हो रहा है परन्तु सरकार उन पर रोज़गार के अवसर पैदा करने के लिए कोई भी दबाव नहीं डाल रही है.
अतः यह वांछनीय है कि सभी राजनैतिक पार्टियां बेरोजगार युवाओं को आरक्षण का झुनझुना पकड़ा कर बरगलाने की जगह वर्तमान सरकार पर रोज़गार के अवसर पैदा करने का दबाव डालें. इस का सब से कारगर उपाय तो रोज़गार को मौलिक अधिकार घोषित करने का ही है जिसके लिए व्यापक जनांदोलन की ज़रुरत है.  यदि रोज़गार मौलिक अधिकार बन जाता है तो फिर सरकार को अपनी कार्पोरेट परस्त नीतियाँ बदलनी पड़ेंगी. फिर सरकार या तो सभी बेरोजगारों को रोज़गार देगी या फिर सब को बेरोज़गारी भत्ता देगी. ऐसा हो जाने पर चाहे वह भागवत हों या मायावती , किसी को भी युवाओं को आरक्षण का झुनझुना दिखा कर बरगलाने का मौका नहीं मिलेगा और न ही आरक्षण के नाम पर बेरोज़गारी से ध्यान बटाने का. रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाने की मांग को लेकर गत वर्ष आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय संयोजक, अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने जंतर मंतर पर 10 दिन का अनशन किया था. इसी मुद्दे को लेकर “उत्तर प्रदेश बचाओ अभियान” के अंतर्गत 28 अक्तूबर, 2015 को गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल, अमीनाबाद, लखनऊ में “युवा संकल्प सभा” का आयोजन किया गया है जिस में पूरे प्रदेश से भारी संख्या में युवा भाग लेंगे.     
   

शनिवार, 12 सितंबर 2015

महात्मा बनाम महात्मा - प्रो. गेल ओम्वेट



महात्मा बनाम महात्मा
-प्रो. गेल ओम्वेट


नोट: गेल ओम्वेट जी का यह लेख गांधीवाद और फुले विमर्श का एक बहुत सटीक विवेचन है. - एस. आर. दारापुरी 

ज्योतिबा फूले के दिल में वंचित तबकों के प्रति करुणा भाव देख कर उन्हें भी गाँधी की तरह ही “महात्मा” की उपाधि से नवाज़ा गया है. लेकिन इस उपाधि की समानता को अपवाद माना जाये तो वे हरेक रूप में प्रसिद्ध “महात्मा” के बिलकुल विपरीत थे. महात्मा गाँधी जहाँ धार्मिक श्रद्धा से भरा संभ्रांत वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले एक ऐसे व्यक्ति थे, जो स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए धार्मिक भावनाओं का भरपूर इस्तेमाल किया करते थे, तो वहीँ दूसरी ओर फूले ऐसे महात्मा थे, जो मूर्तिभंजक (अंध विशवास) विरोधी थे और जनसमुदाय से निकले हुए एक ऐसे बुद्धिजीवी, जिन्होंने जातिवाद और अन्य तमाम असमानताओं के खिलाफ उस संभ्रांत तबके का विरोध किया जो गाँधी जी का समर्थक था. भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए भी इन दोनों के प्रतीक भी एकदम भिन्न थे. गाँधी ने “राम राज”का नारा दिया तो फूले ने “बलि राज” का. मतलब इन दोनों के बीच बहुत गहरे विरोधाभास हैं.
गाँधी के लिए “राम राज” प्रतीक का अर्थ देश के लिए महज़ धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान नहीं थी बल्कि इस में उनकी धर्म और पुराण पर आधारित भावनात्मक संतुष्टि भी जुडी हुयी थी. शायद इसी लिए उन्होंने भारत की अपार सांस्कृतिक-धार्मिक संपदा के चुनाव में सब से विवादस्पद प्रतीक का ही चुनाव किया.
राम की कहानी में पुरूषवाद, सामंतवाद और जातिवाद की तीव्र बदबू है. इस में आदर्श परिवार का मतलब – एक श्रद्धालु भाई, भरोसेमंद पत्नी, विश्वसनीय सेवक जैसे लुभावने प्रतीक, जो एक हिन्दू महिला का आदर्श निर्माण करता है किन्तु ये आदर्श विषमता यानि उंच-नीच पर आधारित हैं.
फिर हम कैसे भूल सकते हैं कि “राम राज” में खुद राम के द्वारा एक शूद्र सन्यासी शम्बूक की हत्या को जायज़ ठहराया गया है. हालाँकि गाँधी जी तमाम राम भक्तों की तरह अपने राम को शांतिप्रिय और सही बताना चाहते थे. पर राम की कहानी में इस मान्यता का स्पष्ट विरोध दिखाई देता है. मुस्लिम आक्रमण जो सबसे प्रभावी रूप में तुर्कों के आगमन के साथ हुआ उसकी तीव्र प्रतिक्रिया राम की कथा में दिखती है. राम स्पष्ट रूप से हिन्दुवाद का संरक्षक और दानवी घुसपैठियों का विरोधी था पर गाँधी इसमें हिन्दू-मुस्लिम एकता को शामिल करना चाहते थे. वे बेशक अपने इस प्रयास के लिए ताउम्र लड़ते भी रहे, परन्तु यह हास्यस्पद  विरोधाभास है कि उनका इसके लिए हिन्दू और मुस्लिम समुदायों को जोड़ना इन दोनों समुदायों में और साम्प्रदायिकता भरने में कारगर सिद्ध हुआ और अंतत इन दोनों समुदायों ने ही एक दूसरे के लिए कट्टरता भर ली.
सच्चाई यह है कि “राम राज” महज भारत को आज़ाद कराने से अधिक की सोच थी. राम राज दरअसल धार्मिक रूप से परिभाषित एक ऐसा यूटोपिया था, जिसने किसी भी भारतीय परम्परा पर सवाल उठाने की जहमत नहीं उठाई. यह आदर्श भारतीय ग्राम समाज की परिकल्पना थी, जो मानव को आधुनिकता से बिलकुल दूर रखती थी. हिन्दू परम्परा के प्रति गाँधी जी की सोच भी कभी आलोचनात्मक नहीं थी. वे उसमें से किसी एक बात का भी विवेचन करने में विश्वास नहीं रखते थे. इसी लिए वे गीता जैसी युद्ध शिक्षा की किताब को भी अहिंसा के पाठ में शामिल करने से नहीं हिचकते थे. गाँधी हिन्दू परम्पराओं में शामिल असमानता के तत्व को भी हरदम नज़रंदाज़ करते हुए इनके विरोध का भी दावा किया करते थे.
दूसरी ओर फूले द्वारा “बलि राज” के प्रतीक का प्रयोग बिलकुल ही अलग था. उन्होंने “बलि” को सीधे किसी परम्परा या मान्यता से नहीं उठाया था, बल्कि उसका पुनरविवेचन किया था. उन्होंने “आर्य सिद्धांत” को पलटकर स्पष्ट किया कि उन्होंने गैर-आर्य, जो भारत के मूलनिवासी थे और आर्यों से युद्ध में हार गए थे.
पारम्परिक मान्यता के अनुसार बलि एक राक्षस था, जिसे ब्राह्मण अवतार वामन ने सीधा नरक में पहुँचा दिया था. लेकिन इस के विपरीत फूले के द्वारा प्रस्तुत पुनरविवेचन प्रचलित किसान-परम्परा पर आधारित था. आज भी महाराष्ट्र के किसान बलि को एक आदर्श राजा के रूप में याद करते हैं, जिस की पुष्टि उनकी लोकोक्ति “ इड़ा पीड़ा हर जाये बलि रजा वापस आए” से होती है. केरल के ओणम त्यौहार में यह माना जाता है कि आदर्श राजा बलि वापस पृथ्वी पर आये हैं. बलि के चुनाव में फूले ब्राह्मणवादी परम्परा के ऐतहासिक आर्य-अनार्य संघर्ष को उभार कर चुनौती दे रहे थे.
वहीँ गाँधी राम पर विश्वास रखते थे और उनका राम पर विश्वास इस हद तक था कि उन्होंने उस के महिला विरोधी, और जातपांत से भरे काम को नज़रंदाज़ कर एक आदर्श राजा के रूप में माना. लेकिन फूले ने बलि के चुनाव में उन्हें इस रूप में नहीं माना. उनकी अपनी सत्य शोधक वृति आस्था और विशवास से परे थी. उन्होंने इतिहास में जाकर एक आदर्शवादी यूटोपिया की खोज की. इस तरह बलि के राज “बलिस्थान” के निर्माण के पीछे कोई कल्पना लोक नहीं, बल्कि एक राज्य को स्थापित करने की आशा थी, जिसमे शिक्षा, संघर्ष और उपलब्धि हो.
जहाँ गाँधी का “राम राज” एक आदर्श गाँव था जहाँ शांति, मधुरता, स्थायित्व परन्तु उद्योगों का विरोध था. उन्होंने मानव को बिना कारण भावना और लोभ में झूलते देखा था. वे उनकी ज़रूरतों को नियंत्रित करना चाहते थे, ताकि वे भक्तों की तरह रहें. गाँधी का चरखा न सिर्फ आत्मनिर्भरता का प्रतीक था, बल्कि यह एक किस्म की आत्म-आश्रितता का भी प्रतीक था जो अमानवीय मशीनों के विरुद्ध औद्योगीकरण का विरोध कर रहा था. यह फूले की मानवतावादी दृष्टि की कल्पना, निर्माता, शोधार्थी, उद्यमी और परिवर्तनशीलता से विपरीत था. फूले ने मानव और पशु के बीच मूल अंतर यह पाया कि मानव में प्रयास से निरंतर परिवर्तन संभव है. इस मामले में फूले और उनके बाद बाबा साहेब डा. आंबेडकर दोनों ही  मार्क्स से मेल खाते थे कि मानव इतिहास में चाहे जो भी जीते, शोषण हो, प्रताड़ना हो, वह जिस हद तक उत्पादन की ताकत है, वह मानव क्षमता का भी विकास करेगी ही. औद्योगीकरण एक उपलब्धि है जिसने ख़ुशी लायी, यह किसी किस्म की गुलामी नहीं है. गाँधी आजाद भारत के स्वपन को परिभाषित करने में उस धर्म की स्तुति करने बैठ गए थे, जो मुस्लिम विरोधी और दलित विरोधी है. यह उन्हें मान्यता प्रदान करता है, जो राम को देशभक्ति का प्रतिरूप मानते हैं, जबकि इस पिछड़ेपन के विपरीत फूले का ऐतहासिक मूल्यांकन जो बलि रजा को गाथायों से निकाल कर एक नया अर्थ देता है, उन्हें देश के बहुसंख्यक पीड़ितों से जोड़ता है और वास्तव में भारत के भविष्य का एक नया आधार तय करता है.
 (मूक्वक्ता से साभार)


शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

कितनी जन-मित्र है हमारी पुलिस?-एस.आर.दारापुरी



कितनी जन-मित्र है हमारी पुलिस?
-एस.आर.दारापुरी आई.पी.एस.(से.नि.)
हाल में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने “क्राईम इन इंडिया” शीर्षक के अंतर्गत पूरे देश में वर्ष 2013 में घटित अपराध के आंकड़े प्रकाशित किये हैं. इन आंकड़ों में पुलिस से संबधित दो आंकड़े बहुत रोचक हैं क्योंकि वे आम जन में व्याप्त पुलिस की उत्पीड़क छवि को झुठलाते दिखाई देते हैं जो कि वास्तविकता से परे है.
यह सर्वविदित है कि पुलिस ही प्रतिदिन मानवाधिकारों का सब से बड़ा हनन करती दिखाई देती है जो कि केस दर्ज न करना, आरोपियों/गैर आरोपियों की अवैध गिरफ्तारी, पुलिस हिरासत में हिंसा, तफ्तीश में कानून की बजाये डंडा तफ्तीश, झूठे मुकदमों में फंसाना, फर्जी बरामदगी दिखाना, रिश्वतखोरी और फर्जी मुठभेड़ों में मारना आदि के रूप में सामने आता है. पुलिस की यह कार्रवाही स्पष्ट तौर पर लोगों के मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है. अतः यह स्वाभाविक है कि पुलिस की इन गैर कानूनी कार्रवाहियों के विरुद्ध बहुत सारी शिकायतें भी होती होंगी. परन्तु राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा वर्ष 2013 के लिए जारी किये गए आंकड़े दर्शाते हैं कि इस पूरे वर्ष में पूरे देश में पुलिस के विरुद्ध मानवाधिकार हनन की कुल दो शिकायतें प्राप्त हुयी थीं जिन में दोषियों के विरुद्ध कार्रवाही की गयी. इसी प्रकार उक्त अवधि में फर्जी मुठभेड़ की केवल दो शिकायतें प्राप्त हुयीं जिन में अभी तक कोई कार्रवाही नहीं हुयी है. क्या इन आंकड़ों पर विशवास किया जा सकता है. काश हमारी पुलिस वैसी होती जैसा कि ये आंकड़े दर्शाते हैं.
अब अगर उपरोक्त अवधि में पुलिस के विरुद्ध प्राप्त शिकायतों की स्थिति देखी जाये तो वह भी उपरोक्त जैसी ही है. यह भी सर्वविदित है कि आम आदमी पुलिस के विरुद्ध शिकायत करते हुए डरता है. वह तभी शिकायत करता है जब उस के साथ बहुत ज्यादती होती है और उसे कहीं से कोई राहत नहीं मिलती. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा वर्ष 2013 के लिए जारी किये गए आंकड़े यह दर्शाते हैं कि उक्त अवधि में पुलिस के विरुद्ध 51,120 शिकायतें प्राप्त हुयी थीं जिन में से 14928 में विभागीय जांच, 247 में मैजिस्टीरियल जांच और 655 में न्यायिक जांच की गयी. इन जांचों के परिणाम बहुत स्तब्धकारी हैं क्योंकि इन में से 26,640 यानि कि 52% शिकायतें झूठी पाई गयीं. इन जांचों के परिणामस्वरूप 1989 (3%) मामलों में ही पुलिस वालों के विरुद्ध केस दर्ज हुए. जांच से दोषी पाए जाने पर 3896 (7%) मामलों में विभागीय कार्रवाही के आदेश दिए गए और 799 अर्थात 1% मामलों में न्यायालयों में आरोप पत्र प्रेषित किये गए. यह आंकड़े भी दर्शाते हैं कि पुलिस के विरुद्ध की गयी शिकायतों में केवल 8% मामलों में ही विभागीय तथा मुकदमा चलाने की कार्रवाही  की गयी और 92% मामलों में कोई भी कार्रवाही नहीं हुयी.
पुलिस द्वारा मानवाधिकार हनन तथा अन्य शिकायतों के सम्बन्ध में की गयी कार्रवाही के आंकड़े दर्शाते हैं कि हमारे देश में पुलिस वालों को दण्डित करने की व्यवस्था बहुत कमज़ोर है जिस कारण पुलिस वाले धड़ल्ले से गैर कानूनी कार्र्वाहियाँ करते रहते हैं क्योंकि उन्हें इस के लिए दण्डित किये जाने का कोई भय नहीं है. पुलिस वालों के लिए दंड से इस छूट के मुख्य कारण एक तो विभाग के अन्दर उच्च अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त होना है क्योंकि निचले अधिकारियों द्वारा बहुत से गैर कानूनी काम उच्च अधिकारियों की सहमति से ही किये जाते हैं. ऐसी हालत में उन से गैर कानूनी कामों के लिए निचले अधिकारियों को दण्डित करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है. इसी का नतीजा है कि वर्ष 2013 में पुलिस के विरुद्ध शिकायतों में से 52% फर्जी/झूठी होना दर्शाया गया है. इस के इलावा बहुत से पुलिस कर्मचारी अपनी राजनीतिक अथवा अन्य पहुँच के कारण भी दंड से बच जाते है. दरअसल पुलिस में जन-शिकायतों के निस्तारण की व्यवस्था बहुत कमज़ोर है. यद्यपि मानवाधिकारों के संरक्षण और उन के हनन के मामलों में जांच/कार्रवाही करने के लिए हरेक राज्य में मानवाधिकार आयोग बने हैं परन्तु वे विभिन्न कारणों से निष्प्रभावी हैं. एक तो उन में नियुक्तियां राजनीतिक लिहाज़ से की जाती हैं और दूसरे उन के पास स्टाफ बहुत कम होता है जो कि प्राप्त शिकायतों की जांच अपने स्तर से करने में अक्षम होता है. इसी लिए आयोग में प्राप्त शिकायतों को उसी पुलिस के पास भेज दिया जाता है जिन के विरुद्ध शिकायत होती है. इस से शिकायतकर्ता का दोहरा उत्पीडन होता है और जांच भी निष्पक्ष तौर पर नहीं होती. यही स्थिति राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भी है.
अतः जनता की पुलिस के विरुद्ध शिकायतों के त्वरित और सही निस्तारण के लिए एक स्वतंत्र शिकायत निवारण व्यवस्था की सखत ज़रुरत है ताकि लोगों को न्याय मिल सके और कानून का उल्लंघन करने वाले दोषी पुलिस कर्मचारी दण्डित हो सकें. इस के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेशित किये गए पुलिस सुधारों को लागू किया जाना आवश्यक है क्योंकि उन में पुलिस के विरुद्ध जन शिकायतों के निस्तारण के लिए प्रदेश तथा जिला स्तर पर पुलिस शिकायत निवारण कमेटियां बनाने की व्यवस्था है. अतः मेरे विचार में यह लोगों के हित में है कि वे पुलिस सुधारों को लागू करने के लिए जनांदोलन चलायें और सभी राजनीतिक पार्टियों पर दबाव बनायें ताकि उन्हें वर्तमान में शासक वर्ग की पुलिस की बजाये जनता की पुलिस मिल सके जो उत्पीड़क की बजाये जन-मित्र हो.           
 

सोमवार, 7 सितंबर 2015

उत्तर प्रदेश में दलित अधिकारियों की पदावनति के लिए ज़िम्मेदार कौन?- एस.आर.दारापुरी



उत्तर प्रदेश में दलित अधिकारियों की पदावनति के लिए ज़िम्मेदार कौन?
-    एस.आर.दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
गत माह उत्तर प्रदेश सरकार ने शासनादेश द्वारा पदोन्नति में आरक्षण और परिणामी ज्येष्ठता के आधार पर 15/11/97 के बाद और 28/4/12 के पूर्व पदोन्नति पाए सभी दलित अधिकारीयों/कर्मचारियों को उनके मूल पद पर पदावनत करने का आदेश जारी किया था. शासनादेश में कहा गया है कि उक्त कार्रवाही सुप्रीम द्वारा एम नागराज के मामले में दिए गए निर्णय के अनुपालन में की जा रही है.
आइये सब से पहले यह देखें कि 2006 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एम नागराज के मामले में क्या दिशा निर्देश दिए गए थे? इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण और परिणामी ज्येष्ठता के नियम को स्थगित करते हुए कहा था कि उत्तर प्रदेश सरकार जिन जातियों को इस का लाभ देना चाहती है वह उन जातियों के सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़ापन, सरकारी नौकरियों में उनके प्रतिनिधित्व के बारे में आंकड़े तथा इस से कार्यक्षमता पर पड़े प्रभाव का आंकलन करके रिपोर्ट प्रस्तुत करे. सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय 2006 में आया था जब उत्तर परदेश में मुलायम सिंह की सरकार थी. इस पर उन्होंने पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लगा दी थी.
मई 2007 में मायावती की सरकार आई परन्तु मायावती ने सुप्रीम कोर्ट के एम. नागराज के मामले में दिए गए निर्णय की कोई भी परवाह न करते हुए पदोन्नति में आरक्षण देने सम्बन्धी आदेश जारी कर दिए जो कि सुप्रीम कोर्ट के इस मामले में दिए गए निर्देशों के विपरीत थे. विरोधियों द्वारा इस आदेश को इलाहबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी परन्तु वहां पर बहुत लचर पैरवी की गयी और सरकार हार गयी. जब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा तो वहां पर भी लचर पैरवी ही की गयी जिस कारण सरकार फिर हार गयी. वहां पर नागराज मामले की शर्तों के अनुपालन सम्बन्धी कोई भी बात नहीं रखी गयी.
अप्रैल, 2012 में उत्तर प्रदेश में पुनः समाजवादी पार्टी की सरकार आ गयी और उन्होंने पदोन्नति में आरक्षण पर तुरंत रोक लगा दी क्योंकि ऐसा करना उनका चुनावी एजंडा था. 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने मायावती द्वारा पदोन्नति में दिए गए आरक्षण को पूरी तरह रद्द करते हुए निर्देश दिया कि 15/11/97 के बाद और 28/4/12 के पूर्व पदोन्नति पाए दलित वर्ग के सभी अधिकारीयों/कर्मचारियों को तुरंत पदावनत करके 15 सितम्बर तक अनुपालन आख्या प्रेषित की जाये. इस आदेश के फलस्वरूप हजारों दलित अधिकारी/कर्मचारी पदावनत होने जा रहे हैं. कुछ के आदेश जारी हो गए हैं और कुछ के शीघ्र जारी होने जा रहे हैं.  
अब देखने की बात यह है कि क्या इस त्रासदी से बचने के लिए कुछ किया जा सकता था. इस सम्बन्ध में यदि मायावती सरकार की भूमिका देखी जाये तो वह पूरी तरह से दलित हितों के खिलाफ रही है. जब मई, 2007 में मायावती सत्ता में आई थी तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट के एम. नागराज के मामले में दिए गए दिशा निर्देशों के विरुद्ध पदोन्नति देने का आदेश देने की बजाये उन शर्तों की पूर्ती करनी चाहिए थी जो कि संभव थी. यह सर्वविदित है कि उस समय उत्तर प्रदेश की दलित उपजातियों (60) के सामाजिक/शैक्षिक पिछड़ेपन सम्बन्धी आंकड़े 2001 की जनगणना रिपोर्ट में उपलब्ध थे. सरकार को उन आंकड़ों का जातिवार संकलन करना था जो कि नहीं किया गया. इसी प्रकार सरकारी नौकरियों में जातिवार प्रतिनिधित्व के बारे में भी आंकड़े संकलित किये जा सकते थे जो कि नहीं किये गए. जहाँ तक पदोन्नति में आरक्षण से कार्य कुशलता पर पड़ने वाले प्रभाव के आंकलन की बात है वह स्वत स्पष्ट है कि इस से सरकारी सेवाओं में कार्य कुशलता बढ़ी ही है न कि किसी प्रकार से घटी है. परन्तु मायावती ने ऐसा कुछ न करके पदोन्नति में आरक्षण देने के आदेश जारी कर दिए जो कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द कर दिए गए हैं. यह संभव है कि यदि मायावती सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के अनुपालन में आंकड़े प्रस्तुत कर देती तो आज शायद इस त्रासदी से बचा जा सकता था. यदि उसे ऐसा नहीं करना था तो केन्द्रीय कांग्रेसी सरकार पर जिसे वह समर्थन दे रही थी, पर संविधान संशोधन करने के लिए दबाव बनाना चाहिए था परन्तु उस ने ऐसा कुछ भी नहीं किया.  इस प्रकार 5 साल तक मायावती का पदोन्नति में आरक्षण को बचाने के लिए वांछित कार्रवाही न करना दलितों के लिए बहुत भारी पड़ गया है.
इसी प्रकार इस मामले में यदि समाजवादी सरकार की भूमिका देखी जाये तो उस ने तो इस दिशा में कोई दिलचस्पी ही नहीं दिखाई. उसने 2006 में नागराज का निर्णय आने पर पदोन्नति में आरक्षण पर रोक तो लगा दी परन्तु उसे बचाने के लिए कोई कार्रवाही नहीं की. यदि यह मान भी लिया जाये कि 2007 में उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार आ गयी थी परन्तु 2012 में पुनः सत्ता में आने पर भी उसने कोई कार्रवाही नहीं की. इस के विपरीत जब संसद में पदोन्नति में आरक्षण सम्बन्धी संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया तो उस के विरोध में एक दलित सपा संसद द्वारा ही उसे फड़वाने का काम किया. लगता है कि मुलायम सिंह मायावती से दुश्मनी निकालने के लिए बदले की भावना से पूरे दलित समुदाय को दुश्मन मान बैठे हैं जबकि सच्चाई यह है कि 2012 के चुनाव में दलितों के एक बड़े हिस्से ने मायावती को छोड़ कर सपा को इस उम्मीद के साथ वोट दिया था कि जो काम मायावती ने सर्वजन के चक्कर में पड़ कर नहीं किया वह शायद मुलायम सिंह उन के लिए करें. परन्तु मुलायम सिंह ने भी सवर्ण वोटों के चक्कर में पद कर घोर दलित विरोधी होने का ही परिचय दिया है.
अब अगर इस मामले में बीजेपी की भूमिका देखी जाये तो वह बिलकुल दोगली रही है. कांग्रेस सरकार के ज़माने में बीजेपी पहले तो संविधान संशोधन का समर्थन करती रही. परन्तु बाद में जब संविधान संशोधन का बिल राज्य सभा में पास होकर लोक सभा में पहुंचा तो बीजेपी ने अपना हाथ यह कह कर पीछे खींच लिया कि सरकार को पह्ले नागराज केस में दिए गए दिशा निर्देशों का पालन कर लेना चाहिए. इस प्रकार लोक सभा में संविधान संशोधन बिल पारित नहीं किया जा सका. अब पुनः भाजपा को सत्ता में आये लगभग डेढ़ साल हो गया है परन्तु उस ने एक बार भी संविधान संशोधन का बिल लाने का प्रयास नहीं किया है. इस के विपरीत अब आर.एस.एस. ने पूरे आरक्षण को ही समाप्त करने की मांग उठा दी है.
इस मामले में कांग्रेस की भूमिका भी केवल लीपापोती करने की ही रही है. नागराज का निर्णय तो 2006 में आया था जब कि केंद्र में कांग्रेस 2005 से 2014 तक सत्तारूढ़ रही है. यदि कांग्रेस चाहती तो इन दस वर्षों में  संविधान संशोधन बिल ला कर राज्य सभा और लोक सभा से पास करा सकती थी. परन्तु उस ने जानबूझ कर इस मामले को लटकाए रखा. खानापूर्ति के लिए वह 2013 में इस बिल को राज्य सभा से पास कराकर लोक सभा में लायी तो तब तक चुनाव नजदीक आ चुके थे और हरेक पार्टी अपने वोट पक्के करने में लग गयी थी. इसी लिए लोक सभा में उक्त बिल पास नहीं हो सका.
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पदोन्नति में आरक्षण को बचाने के लिए समय रहते कोई भी कार्रवाही न करने के लिए जितनी कांग्रेस और बीजेपी और समाजवादी पार्टी ज़िम्मेदार है उस से कहीं ज्यादा बसपा ज़िम्मेदार हैं. सपा इस का खुला विरोध करने के कारण और बसपा पांच साल तक सत्ता में रहने के बावजूद कोई भी कार्रवाही न करने के लिए. अतः वर्तमान में इन में से किसी भी पार्टी से कोई उम्मीद करना बेकार है.
ऐसी परिस्थिति में प्रशन उठता है कि पदोन्नति में आरक्षण बचाने के लिए क्या किया जाना चाहिए? इस के लिए दो विकल्प उपलब्ध हैं. एक तो एम. नागराज केस के निर्णय के अनुपालन में अनुसूचित जातियों /जन जातियों के पिछड़ेन के बारे में आंकड़े एकत्र करके सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किये जाएँ और आदेश प्राप्त किया जाये जैसा कि उत्तराखंड और राजस्थान की सरकारों ने किया है और उस से उन्हें राहत भी मिली है. दूसरा विकल्प सभी राजनीतिक पार्टियों पर जन दबाव डाल कर संसद के अगले सतर में संविधान संशोधन कराया जाये. इस कार्य के लिए सभी आरक्षण समर्थक संगठनों और राजनीतिक पार्टियों को एकजुट हो कर बीजेपी पर संविधान संशोधन बिल लाने और शेष पार्टियों पर इसे राज्य सभा और लोक सभा में पास कराने का दबाव बनाने की ज़रुरत है. आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट इस अभियान का पूरा समर्थन करता है और इस आन्दोलन में पूरी तरह से शामिल होगा.