रविवार, 11 अक्तूबर 2015

क्या आरक्षण पर पुनर्विचार अथवा उसका आधार बदलने की ज़रुरत है?



क्या आरक्षण पर पुनर्विचार अथवा उसका आधार बदलने की ज़रुरत है?
-एस.आर. दारापुरी राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट   
बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान मायावती ने एक बार फिर सवर्ण तबके के गरीब लोगों के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत की है. इस से पहले जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री थीं तो उन्होंने गरीब सवर्णों के लिए आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण देने की घोषणा की थी. यद्यपि मायावती की यह घोषणा सर्वजन के फार्मूले के अंतर्गत सवर्ण वोटों को आकर्षित करने का प्रयास है परन्तु इससे भाजपा व् अन्य आरक्षण विरोधियों की आरक्षण के आधार को जाति के स्थान पर आर्थिक किये जाने की मांग को बल मिलता है जो कि दलितों/पिछड़ों के हित के खिलाफ है.
आरक्षण के बारे में एक भ्रम यह भी फैलाया गया है कि आरक्षण की समय सीमा केवल दस वर्ष थी. यह केवल अर्ध सत्य है. संविधान में दस वर्ष की समय सीमा केवल राजनैतिक आरक्षण की है जो कि समय समय पर बढ़ाई जाती रही है. सरकारी सेवाओं तथा शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण की कोई समय सीमा नहीं है क्योंकि इन को पूरा करने में बहुत लम्बा समय लगने की सम्भावना है. शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश में आरक्षण के बारे में यह भी भ्रान्ति है कि इस में अंकों के प्रतिशत की कोई सीमा नहीं है. इस बारे में सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का अंकों का प्रतिशत सामान्य जातियों के कट आफ प्रतिशत से किसी भी तरह 10% से अधिक नहीं होगा. यहाँ यह भी स्पष्ट करना है कि आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों को केवल प्रवेश स्तर पर ही अंकों में ढील मिलती है न कि परीक्षा पास करने में.   
यह सर्वविदित है कि हमारे संविधान में आरक्षण का आधार सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़ापन तथा सरकारी सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है. यह आरक्षण दलितों तथा इन क्षेत्रों में पिछड़े समूहों जिन में पिछड़ी जातियां शामिल हैं को दिया गया है. इस में कहीं भी आर्थिक आधार की बात नहीं है. इसी लिए जब जब किसी भी पार्टी की केन्द्रीय सरकार या प्रांतीय सरकार ने आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का प्रयास किया है वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किया जाता रहा है. हाल में राजस्थान में भाजपा की सरकार ने आर्थिक आधार पर 14% आरक्षण देने की घोषणा तो कर दी है परन्तु इसका हाई कोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किया जाना निश्चित है.
लगभग सभी राजनैतिक पार्टियाँ समय समय पर सवर्ण गरीबों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का वादा अथवा घोषणा करके वोट लेने की कोशिश करती रही हैं जबकि वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत ऐसा करना बिलकुल संभव नहीं है. फिर भी राजनैतिक पार्टिया जान बूझ कर आम लोगों को इस प्रकार का झांसा देती रहती हैं. आरक्षण के बारे में एक बात स्पष्ट तौर पर समझ लेनी चाहिए कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन प्रोग्राम नहीं है. यह तो सदियों से हिंदुयों की सामाजिक व्यवस्था द्वारा वंचित किये गए तबकों की प्रशासनिक, शैक्षिक एवं राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व देने का प्रयास मात्र है. संविधान निर्माण के समय आरक्षण के आधार के बारे में यही राष्ट्रीय सहमती बनी थी. हाँ यह बात सही है कि सवर्ण जातियों में भी गरीब लोग हैं. परन्तु उन की गरीबी दलितों और पिछड़ों पर सदियों से थोपे गए सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ेपन के मुकाबले में बहुत तुच्छ है. क्योंकि वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें आर्थिक आधार पर आरक्षण देना संभव नहीं है अतः उन्हें छात्रवृति तथा सस्ता क़र्ज़ आदि देकर शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए.
आज कल घुमा फिरा कर आरक्षण पर कोई भी बहस इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पर आ जाती है. इसी लिए सब से पहले यह देखना उचित होगा कि क्या आरक्षण का उद्देश्य पूरा हो गया है? समाज के जिन तबकों को आरक्षण दिया गया था क्या वे राष्ट्रीय स्तर पर सभी क्षेत्रों जैसे सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक में अन्य वर्गों के समतुल्य स्थान प्राप्त कर गए हैं? अभी तक का मूल्यांकन तो यह दर्शाता है कि उन की हालत में बहुत मामूली सुधार हुआ है. यदि दलितों को केन्द्रीय सरकार की सरकारी सेवाओं में 65 वर्षों में प्राप्त हुए प्रतिनिधित्व को देखा जाये तो वह प्रथम श्रेणी की सेवाओं में 22-1/2% आरक्षण के विरुद्ध मुश्किल से 15% तक पहुंचा है. इस के मुकाबले में 24 वर्षों में इस वर्ग की सेवाओं में पिछड़े वर्ग के 27% आरक्षण के विरुद्ध उनका प्रतिनिधित्व केवल 4% तक ही पहुंचा है. इसी तरह अगर शिक्षा के क्षेत्र में देखा जाये तो देश भर के विश्वविद्यालयों में दलित वर्ग के प्रोफेसरों का प्रतिनिधित्व मुश्किल से 2% भी नहीं है. यह भी देखा जाना चाहिए कि इतने वर्षों के बाद भी तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में इन का कोटा पूरा क्यों नहीं हो पाता है? अतः यदि आरक्षण पर किसी पुनर्विचार की ज़रुरत है तो वह इस की निम्न उपलब्धि के कारणों के बारे में गहन विचार करने की है न कि इसे समाप्त करने अथवा इस का आधार बदलने के बारे में. यह भी याद रहना चाहिए कि आरक्षण व्यवस्था का लक्ष्य दलितों और पिछड़े वर्गों को विशेष अवसर देकर राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना भी है.  
दरअसल वर्तमान में आरक्षण विरोध का मुख्य कारण सवर्ण तबकों में बढ़ती हुयी बेरोज़गारी है. यह सर्विदित है कि सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के कारण सरकारी क्षेत्र में नौकरियां बराबर कम हो रही हैं और सरकार अपना खर्चा कम करने के लिए नयी नौकरियां नहीं दे रही है. केंद्र में वर्तमान भाजपा सरकार ने अपना खर्चा घटाने के इरादे से एक साल तक कोई भी भर्ती न करने की घोषणा की है. 1991 में नई आर्थिक नीति लागू करते समय निजीकरण तथा भूमंडलीकरण के माध्यम से रोज़गार के अवसरों के असीमित बढ़ने के सपने दिखाए गए थे परन्तु परिणाम बिलकुल उल्टा निकला है. रोज़गार के अवसरों में बढ़ोतरी के स्थान पर कमी हुयी है. भाजपा की वर्तमान सरकार ने भी चुनाव में हर बेरोजगार को काम देने का वादा किया था परन्तु अभी तक इस दिशा में कोई भी उपलब्धि दिखाई नहीं दी है. दूसरी तरफ निजी क्षेत्र जिसे मोदी हर तरह की सुविधा/छूट दे रहे हैं, लाभ कमा  कर मालामाल हो रहा है परन्तु सरकार उन पर रोज़गार के अवसर पैदा करने के लिए कोई भी दबाव नहीं डाल रही है.
अतः यह वांछनीय है कि सभी राजनैतिक पार्टियां बेरोजगार युवाओं को आरक्षण का झुनझुना पकड़ा कर बरगलाने की जगह वर्तमान सरकार पर रोज़गार के अवसर पैदा करने का दबाव डालें. इस का सब से कारगर उपाय तो रोज़गार को मौलिक अधिकार घोषित करने का ही है जिसके लिए व्यापक जनांदोलन की ज़रुरत है.  यदि रोज़गार मौलिक अधिकार बन जाता है तो फिर सरकार को अपनी कार्पोरेट परस्त नीतियाँ बदलनी पड़ेंगी. फिर सरकार या तो सभी बेरोजगारों को रोज़गार देगी या फिर सब को बेरोज़गारी भत्ता देगी. ऐसा हो जाने पर चाहे वह भागवत हों या मायावती , किसी को भी युवाओं को आरक्षण का झुनझुना दिखा कर बरगलाने का मौका नहीं मिलेगा और न ही आरक्षण के नाम पर बेरोज़गारी से ध्यान बटाने का. रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाने की मांग को लेकर गत वर्ष आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय संयोजक, अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने जंतर मंतर पर 10 दिन का अनशन किया था. इसी मुद्दे को लेकर “उत्तर प्रदेश बचाओ अभियान” के अंतर्गत 28 अक्तूबर, 2015 को गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल, अमीनाबाद, लखनऊ में “युवा संकल्प सभा” का आयोजन किया गया है जिस में पूरे प्रदेश से भारी संख्या में युवा भाग लेंगे.