मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

मायावती ने उत्तर प्रदेश के दलितों का क्या किया ?

मायावती ने उत्तर प्रदेश के दलितों का क्या किया ?
एस. आर. दारापुरी आई. पी. एस. (से. नि. ) तथा राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
भारतवर्ष में उत्तर प्रदेश कई मायनों में अपना एक स्थान रखता है. राजनीतिक दृष्टि से यह पहला राज्य है जहाँ प़र एक दलित महिला चौथी बार मुख्य मंत्री की कुर्सी पर आसीन हुई है. उ. प्र. की आबादी भारत के सभी राज्यों से अधिक है. यहाँ दलितों की सबसे बड़ी आबादी ( ३.५१ करोढ़ ) है जो कि प्रदेश की कुल आबादी का २१.१ प्रतिशत है. दुखदाई बात यह है कि यहीं दलितों पर सब से अधिक उत्पीडन की घटनाएँ घटित होती हैं. यहीं सबसे अधिक बच्चे एवं महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं. इसी प्रदेश में पोलिओ के सबसे अधिक मामले पाए जाते हैं. अब यह देखना होगा कि विकास कि दृष्टि से उत्तर प्रदेश के दलित अन्य प्रदेशों के दलितों की अपेक्षा कहाँ ठहरते हैं. इस का सही मूल्याँकन करने हेतु विकास के निम्नलिखित पहलुओं पर दलितों की स्थिति का अध्ययन करना उचित होगा:-
स्त्री- पुरुष अनुपात
उत्तर प्रदेश के दलितों में महिलायों और पुरुषों का लिंग अनुपात ९०० प्रति हज़ार है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर दलितों का यह अनुपात ९३६ है. इसी प्रकार ०-६ वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों का यह अनुपात ९३० है जबकि राष्टीय स्तर पर यह अनुपात ९३८ है.
उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि यहाँ के दलित देश के अन्य प्रान्तों के दलितों से इस अनुपात में काफी पीछे हैं जो कि दलित महिलायों और बच्चों की निम्न स्थिति का प्रतीक है इसका मुख्य कारण न केवल लड़कों की वरीयता के कारण है कन्यायों की भ्रूण हत्या है बल्कि महिलायों एवं बालिकाओं के साथ नियोजित भेदभाव एवं कुपोषण भी है.
वर्ष २००५-२००६ में किये गए राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश में ४७ प्रतिशत महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं. इसी सर्वेक्षण में पाया गया था कि उत्तर प्रदेश में ४७ प्रतिशत बच्चे भी कुपोषण से ग्रस्त होने के कारण कम वज़न वाले थे जिनमें से १३ प्रतिशत बच्चे मृत्यु का शिकार हो गए और ४६ प्रतिशत बच्चों की शारीरिक बढोतरी बाधित हो चुकी थी. इस सर्वेक्षण से यह भी प्रकट हुआ था कि उत्तर प्रदेश में १००० जीवित प्रसवों में से ७३ मृत प्रसव थे जो कि ९ वर्ष पूर्व के राष्ट्रीय औसत ६७.६ से काफी अधिक थे. हाल में cry संस्था दुआरा कराए गए सर्वेक्षण से पाया गया कि उत्तर प्रदेश में ७० प्रतिशत दलित बच्चे कुपोषण का शिकार हैं.
यद्यपि उपरोक्त आंकड़े सभी महिलायों और बच्चों कि स्थिति दार्शाते हैं परन्तु इनमें दलित महिलायों और बच्चों की स्थिति औ़र भी दयनीय है. इसी कारण इस राज्य में महिलायों और पुरुषों का लिंग अनुपात चिंतनीय है. सामान्य वर्ग और दलित महिलायों और बच्चों की उपरोक्त दुर्दशा के लिए महिला एवं बाल कल्याण सम्बन्धी योजनाओं जैसे समग्र बाल विकास योजना, मध्यान्ह भोजन योजना एवं सार्वजानिक खाद्यान्न वितरण प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं सरकारी मशीनरी दुआरा बरती जा रही उदासीनता जिम्मेवार है.
शिक्षा का स्तर
सन २००१ कि जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में दलितों की साक्षरता दर ४६.३ प्रतिशत है जबकि दलितों का राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा दर ५४.७ प्रतिशत है. पुरुषों एवं, महिलायों की शिक्षा दर क्रमश ६०.३ और ३०.५ प्रतिशत है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर दलितों की यह दर क्रमश: ६६.६ और ४१.९ प्रतिशत है. इस प्रकार उत्तर प्रदेश के दलित पुरुष एवं महिलाएं साक्षरता दर में भारत के अन्य प्रान्तों के दलितों से काफी पीछे हैं. उत्तर प्रदेश के साक्षर दलितों में से ३८ प्रतिशत ऐसे हैं जिनका शिक्षा का कोई भी स्तर नहीं है. यहाँ अधिकांश दलित बहुत कम पड़े लिखे हैं . प्राईमरी और मिडल स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने वाले दलितों का प्रतिशत क्रमश: २७.१ और १८.५ प्रतिशत है. मैट्रिक, हायर सेकंडरी और स्नातक स्तर तक शिक्षा पाने वाले दलितों का प्रतिशत: केवल ०.१ प्रतिशत है. सेकंडरी से आगे साक्षरों का प्रतिशत दर मिडल पास से लगभग आधा है तथा उससे ऊपर शिक्षितों का अनुपात मैट्रिक पास (८.५ प्रतिशत ) का १/३ है.
वर्ष २००१ की जनगणना के अनुसार उत्तर पदेश में ५ से १४ वश आयु के १ करोढ़ ३३ लाख दलित बच्चों में से केवल ५३.३ लाख यानिकि ५६.४ प्रतिशत बच्चे स्कूल जा ही नहीं रहे थे. इसके विपरीत सरकारी दावा है कि सभी बच्चे स्कूल जा रहे हैं.
स्कूल छोड़ने की दर
बेसिक शिक्षा निदेशालय, उत्तर पदेश दुआरा जारी आंकड़ों के अनुसार १९९१ में बच्चों दुआरा प्राईमरी स्तर पर स्कूल छोड़ने का दर ४५.०२ प्रतिशत है. इस प्रकार हरेक दूसरा बच्चा प्राईमरी शिक्षा पूरी होने से पहले स्कूल छोड़ देता है. लड़कियों की स्कूल छोड़ने की दर ४६.२५ प्रतिशत है जो कि लड़कों की दर से थोड़ी ऊँची है. यह सर्वविदित है कि विभिन्न कारणों से दलित बच्चों की स्कूल छोड़ने की दर सामान्य जातियों के बच्चों से अधिक होती है जिसका सीधा असर दलितों की साक्षरता दर पर पड़ता है. वर्तमान में भी दलित बच्चों का स्कूल छोड़ने की दर सबसे अधिक है.
स्कूलों में छुआछुत
विभिन्न सर्वेक्षणों से यह पाया गया है कि उत्तर प्रदेश में "छुआछुत और जातिगत भेदभाव" बुरी तरह से व्यापत है. इसका प्रकोप प्राईमरी और मिडिल विद्यालयों में मिड-डे मील में भी स्पष्ट दिखाई देता है.सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार भोजन पकाने हेतु दलित रसोइओं की वरीयता के अनुसार नियुक्ति करने के आदेश थे परन्तु २००७ में एक सर्वेक्षण में यह पाया गया कि उत्तर प्रदेश में केवल १७ प्रतिशत स्कूलों में ही दलित रसोइओं की नियुक्ति की गयी थी. सरकार दुआरा अपने ही आदेशों को लागू करने में बरती जा रही उदासीनता के कारण काफी स्कूलों में सवर्ण जाति के बच्चों दुआरा दलित रसोइओं दुआरा बनाये गए भोजन का बहिष्कार किया गया. इस परिस्थिति में सरकार से यह अपेक्षा की जाती थी की वह ऐसे मामलों में सखत कार्रवाही करके दलित रसोइओं की नियुक्ति को लागू करवाती परन्तु ऐसा न करके मायावती ने उन की नियुक्ति सम्बन्धी आदेश को ही वापस ले लिया. इस का परिणाम यह है की अधिकतर स्कूलों में दलित रसोइओं को निकाल दिया गया. इस से उत्तर प्रदेश में छुअछुता को खुला बढावा मिला है.
कार्य सहभागिता
वर्ष २००१ की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में दलितों की कार्य सहभागिता दर ३४.७ प्रतिशत है जब कि राष्ट्रीय स्तर पर दलितों कि कार्य सहभागिता दर (४०.४०) प्रतिशत है जो कि उत्तर प्रदेश में दलितों में व्यापक बेरोज़गारी और गरीबी को दर्शाता है. कार्य सहभागिता का अर्थ नियमित रोज़गार से है.
दलित मजदूरों की श्रेणी
वर्ष २००१ की जनगणना के अनुसार उत्त प्रदेश के दलितों में कुल मजदूरों का ४२.५ प्रतिशत भाग कृषि मजदूरों का है जब कि पूरे भारत में दलितों की यह औसत ४५.६ प्रतिशत है. अन्य मजदूरों की श्रेणी में दलितों की औसत दर ३०.५ प्रतिशत के मुकाबले में उत्तर प्रदेश की यह दर २२.२ प्रतिशत है. उत्तर प्रदेश में घरेलू उद्योग से जुड़े दलितों का प्रतिशत ४.३ प्रतिशा है जबकि राष्ट्रीय सता प् यह औसत ३.९ प्रतिशत है. इस से स्पष्ट है की उत्तर प्रदेश में रोज़गार की बहुत कमी है.
गरीबी रेखा के नीचे दलित
वर्ष २००४-०५ के आंकड़ों के अनुसा उत्तर प्रदेश में गरीबी रेखा के नीचे लोगों का प्रतिशत ३२.८ प्रतिशत है जबकि पूरे भारत में यह दर केवल २७.५ प्रतिशत है. इन में दलितों का प्रतिशत अन्य वर्गों की अपेक्षा काफी अधिक है. एन. एस. एस. ओ. के वर्ष १९९०-२००० के सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश में ४४ प्रतिशत दलित गरीबी की रेखा के नीचे जी रहे थे. वास्तव में दलितों के गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों का औसत ६० प्रतिशत से कम नहीं है.
आर्थिक स्थिति
उत्त प्रदेश कृषि प्रधान प्रदेश है और ८७.७ प्रतिशत दलित ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं. उनमे से ७५ प्रतिशत कृषि मजदूर अथवा सीमांत एवं लघु कृषक के रूप में खेती से जुड़े हुए हैं. पच्छमी उत्तर प्रदेश को छोड़ कर शेष क्षेत्र में कृषि का विकास नगण्य है जिसका असर किसानों के साथ साथ कृषि मजदूरों पर भी पड़ रहा है. इसी कारण उत्त्तर प्रदेश में कृषि में लगे दलितों की संख्या राष्ट्रीय औसत से कम है. वर्ष १९९०-९१ की कृषि जोत जनगणना के अनुसार उ. प्र. के दलित कृषकों में से ४१.७ प्रतिशत सीमांत, लघु और अर्ध मध्यम श्रेणी के तथा केवल २.४ प्रतिशत ही बड़ी जोत के मालिक थे. जोतों के क्षेत्रफल की दृष्टि से ३९.५ प्रतिशत दलित कृषक लघु/ सीमांत/अर्ध मध्यम एवं मध्यम श्रेणी के तथा केवल २.१ प्रतिशत दलित बड़ी जोत के मालिक थे. इस प्रकार दलितों के पास कुल जोत का १६.३ प्रतिशत तथा कुल जोत क्षेत्रफल का १०.५ प्रतिशात ही था जोकि उनकी २१.१५ प्रतिशा आबादी के मुकाबले में बहुत ही कम है. दलितों की जोत का औसत क्षेत्रफल ०.६० हेक्टेअर है. इस से स्पष्ट है कि उत्त प्रदेश में अधिकतर दलित भूमिहीन हैं.
वर्ष २००१ की जनगणना के अनुसार उ.प्र. के ३०.९ प्रतिशत दलित काश्तकार की श्रेणी में हैं जबकि १९९१ कि जनगणना में यह प्रतिशत ४२.६३ था. इस प्रकार १९९१ से वर्ष २००१ के दशक में लगभग १२ प्रतिशत दलित काश्तकार की श्रेणी से गिर क़र भूमिहीन की श्रेणी में आ गए हैं. यह स्थिति दलितों के सश्क्तिकर्ण की बजाये उनके अशक्तिकर्ण को दर्शाती है. दलितों के भूमि से इस वन्चितिकरण का एक कारण सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार के कारण उनका का लाभ प्राप्त न होना और बेरोज़गारी है क्योंकि वर्तमान में कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार में कोई कमी आने की बजाये उसमे बढोतरी ही हुई है. इस के साथ ही रोजगार के कोई अवसर भी पैदा नहीं हुए हैं. मजदूर परिवारों को नरेगा में १०० दिन का रोजगार देने वाली योजना का यह हाल है कि पिछले वर्षों में ग्रामीण मजदूरों को केवल ८ दिन का रोज़गार ही मिला था जैसाकि केग की रिपोर्ट में है. मायावती ने तो २००७ में प्रधान मंत्री बनने पर इस योजना को ही ख़तम कर देने की घोषणा कर दी थी. मनरेगा में व्यापक भ्रष्टाचार किसी से छुपा नहीं है और मायावती इस को रोकने में बिलकुल असफल रही हैं जिसका खमियाजा दलितों को भुगतना पड़ रहा है.
पिछले ३६ वर्षों से उ.प्र.में दलितों सहित अन्य भूमिहीनों को थोड़ी थोड़ी ज़मीन आबंटित की जाती रही है . एक तो यह भूमि अधिकतर अनुपजाऊ तथा बंजर किस्म की रही है. दूसरी ओर अधिकतर आबंटियों को इन पर कब्ज़े ही नहीं मिले. इस का एक सब से बढ़िया उदाहरन हरदोई जनपद के दलितों दुआरा विधान भवन के सामने किये गये धरने एवं अनशन का है. उनकी शिकायत थी कि उन्हें 32 वर्ष पूर्व मिले भूमि पटटों का आज तक कब्ज़ा नहीं मिला है. उनकी भूमि प़र कब्ज़ा करने वाले सवर्णों को उस क्षेत्र के बसपा विधायक का संरक्षण प्राप्त है. बहुत दिन तक धरना और अनशन के बाद उन्हें कहीं कब्ज़ा मिल सका. ऐसी स्थिति पूरे उ.प्र. में है. दलितों के पटटों पर दबंगों के कब्ज़े हैं परन्तु मायावती अपने सर्वजन समाज को नाराज़ नहीं करना चाहती. अत: दलितों के पट्टे आज भी दबंगों के कब्जे में हैं और दलितों की कोई सुनवाई नहीं है.
दलित उत्पीडन में उत्तर प्रदेश सब से आगे
यह सर्वविदित है कि दलित उत्पीडन के मामले में उ.प्र. भारत में प्रथम स्थान रखता है. यह स्थिति राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो दुआरा वर्ष २०१० की र्रेपोर्ट से भी प्रकट होती है. इसका मुख्य कारण उ.प्र. में दलितों की बड़ी आबादी, सामंती सामाजिक व्यस्था तथा सरकार दुआरा उत्पीडन के मामलों की उपेक्षा है. उ.प्र. में यह पुरानी परम्परा रही है कि जो भी मुख्य मंत्री आता है वह अपने काल में अपराध के आंकड़े अपने पूर्व वाले मुख्य मंत्री के काल से कम कर के दिखाता है. मायावती भी इस का कोई अपवाद नहीं है. मायावती ने तो वर्ष १९९५ में अपने प्रथम मुख्य मंत्री काल में अपराध के आंकड़ों को लेकर पुलिस अधिकारियों को निलंबित और स्थानान्तित करके तहलका मचा दिया था. इसके बाद तो उन्होंने दलित उत्पीडन को रोकने के ध्येय से बनाये गए केन्द्रीय अधिनियम ( अनुसूचित जाति/ जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम १९८९ ) को लागू न करने का सरकारी आदेश जारी करके इस प़र रोक ही लगा दी थी. बाद में इस का बहुत विरोध होने और मामला हाई कोर्ट पहुँचने पर उसे वापस लिया गया परन्तु व्यव्हार में यह आदेश अब भी लागू है. इस समय इस एक्ट के दुरूपयोग को रोकने के नाम पर मायावती का मौखिक आदेश है कि इस एक्ट का प्रयोग केवल हत्या और बलात्कार के मामलों में ही किया जाये और वह भी डाक्टरी परीक्षण के बाद. दलित उत्पीडन के शेष १९ प्रकार के मामलों में यह लागू नहीं किया जाये. इस के कारण उ.प्र. में दलितों पर बराबर अत्याचार हो रहे हैं परन्तु पुलिस इस एक्ट के अंतर्गत मुकदमे दर्ज नहीं करती और दबंग अत्याचार करने के लिए स्वतन्त्र हैं. पुलिस अपराध के आंकड़े कम रखने के कारण दलित उत्पीडन की रिपोर्ट नहीं लिखती. इससे उत्तर प्रदेश के दलित न केवल सामंतों दुआरा किये जा रहे उत्पीडन को झेलने के लिए बाध्य हैं बल्कि उत्पीडन का शिकार होने पर मिलने वाली आर्थिक सहायता से भी वंचित रह रहे हैं.
वर्ष २००७ में समाचार पत्रों में दलित महिलायों के बलात्कार के छपे मामलों के अध्ययन के अनुसार वर्ष २००७ में दलित महिलायों के बलात्कार के ११० मामलों में से पुलिस दुआरा केवल ५० प्रतिशत मामले ही दर्ज किये गए थे. बलात्कार के इन मामलों में से ८५ प्रतिशत मामले नाबालिग दलित लड़कियों के साथ थे. इसी प्रकार बलात्कार के बाद हत्या के १९ मामलों में से ५० %, हत्या में से २५% , शीलभंग में से ७१%, तथा अपहरण में से ८०% मामले दर्ज ही नहीं किये गए थे. ऐसी ही स्थिति उत्पीडन के अन्य मामलों की भी है. वास्तव में मायावती सवर्ण वोटों के चक्कर में इस एक्ट को लागू करके उन्हें नाराज़ नहीं करना चाहती है जिस का खामिआज़ा दलितों को भुगतना पड़ रहा है.
देश के अन्य राज्यों के दलितों से तुलना करने पर यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश के दलित बिहार और ओढिसा के दलितों को छोड़कर विकास के सभी मानकों पर अन्य राज्यों के दलितों से पिछड़े हुए हैं. यह भी विदित है कि मायावती १९९५ से लेकर अब तक चौथी बार उ.प्र. की मुख्य मंत्री बनी है परन्तु इस काल में दलितों कि स्थिति में कोई भी सुधार नहीं हुआ है. इसके विपरीत दलितों की आर्थिक स्थिति पहले से बदतर हुई है. क्या उ.प्र. के दलितों के पिछड़ेपन के लिए मायावती को काफी हद तक जुम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए? यह सर्वविदित है कि मायावती ने न तो पहले और न इस बार भी दलितों एवं प्रदेश का विकास का कोई एजेंडा बनाया. विकास की किसी भी अवधारणा के अभाव में न तो प्रदेश का और न ही दलितों का कोई विकास हुआ.
राज्य सरकार के बजट का काफी बड़ा हिस्सा गैर योजनागत व्यय पर लगाया गया है. कई अरब की धन राशी भव्य समारोहों, स्मारकों. एवं अपनी मूर्तिओं सहित अन्य मूर्तियों प़र खर्च की गयी जबकि यह धनराशी प्रदेश के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य कल्याणकारी योजनाओं प़र खर्च की जा सकती थी. मायावती सरकार दुआरा प्रतीकों की राजनीति करने से दलितों का कुछ भावनात्मिक तुष्टिकरण तो हुआ परन्तु उनका कोई भी विकास नहीं हुआ. व्यापक भ्रष्टाचार के कारण उन्हें कल्याणकारी योजनाओं का भी कोई लाभ नहीं ,मिल सका .
पिछले वर्ष के ट्रांसपेरेंसी इंटरनॅशनल संस्था दुआरा किये गए विवेचन से यह पाया गया था कि भ्रष्टाचार के मामले में उ.प्र. चिंतनीय दशा से भ्रष्ट राज्य है. प्रदेश में सर्वत्र विकास का अभाव इस का दुष्परिनाम है. परदेश के दो बड़े नेता- मुलायम सिंह तथा मायावाती भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपित हैं. मुलायम सिंह के विरुद्ध तो अभी जांच चल ही रही है पान्तु मायावती के खिलाफ तो विवेचना पूरी हो चुकी है. उसके विरुद्ध ताज कोरिडोर का मामला इलाहाबाद उच्च न्यायलय तथा ३० करोड़ की अवैध संपत्ति में आरोप पत्तर दाखिल करने का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है जिस पर अगले साल के फरवरी माह की प्रथम तारीख को आरोप पत्तर दाखिल करने का आदेश होने की सम्भावना है. इस पर मायावती को ज़मानत कराने के लिए अदालत में समर्पण करना होगा और उस समय उसकी जेल जाने की नौबत भी आ सकती है.
मायावती के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का असर उ.प्र. की राजनीति और नौकरशाही पर भी पड़ा है. यही कारण है कि प्रदेश में घोर भ्रष्टाचार व्याप्त है. सभी कल्याणकारी योजनायें जैसे मनरेगा, राशन वितरण प्रणाली, बाल विकास, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, विधवा पेंशन, वृदा पेंशन, जननी सुरक्षा योजना आदि घोर भ्रष्टाचार का शिकार हो गयीं हैं जिससे न केवल दलित बल्कि सभी लोग इनके वांछित लाभ से वंचित रह गए हैं . शिक्षा एवं स्वास्थ्य मायावती सरकार के सब से कम वरीयता वाले क्षेत्र रहे हैं. २००९ के चुनाव के समय मायावती देश का प्रधान मंत्री का सपना देख रही थीं जो पूरा नहीं हुआ और चुनाव में बड़ी मुश्किल से २० सीटें ही मिल पायीं. अब तो २०११ के चुनाव में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने की भी कोई सम्भावना नहीं है जैसा कि जनता की आवाज़ सुनाई पड़ रही है.
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है की उत्तर प्रदेश के दलितों की अधोगति के लिए मायावती को काफी हद तक जुम्मेवार ठहराया जा सकता है जोकि उसके व्यक्तिगत भ्रष्टाचार और सिधांतहीन राजनीति का ही दुष्परिणाम है. उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश के दलित भी अब समझ गए होंगे कि केवल किसी भी तरह से सत्ता पा लेने से ही समस्याएँ हाल नहीं हो जातीं. उसके लिए डॉ. आंबेडकर जैसी सैधांतिक तथा एजेंडा आधारित मौलिक परिवर्तन की राजनीति की ज़रुरत है.

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