शुक्रवार, 27 मई 2016

बौद्धों की जनसँख्या वृद्धि दर में भारी गिरावट: एक चिंता का विषय



बौद्धों की जनसँख्या वृद्धि दर में भारी गिरावट: एक चिता का विषय  
एस.आर. दारापुरी, आई.पी.एस. (से.नि.) एवं संयोजक उत्तर प्रदेश जनमंच
2011 की जनगणना के अनुसार देश में  बौद्धों की जनसख्या  वृद्धि दर में भारी गिरावट सभी आंबेडकरवादियों के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए क्योंकि बाबासाहेब ने दलितों की मुक्ति के लिए बौद्ध धम्म को एक कारगर हथियार के रूप में अपनाया था. इस के पीछे उनका मुख्य उद्देश्य दलितों को हिन्दू धर्म की नारकीय जाति व्यवस्था से मुक्त करके उन्हें बौद्ध धम्म की जातिविहीन सामाजिक व्यवस्था में स्थापित करना था. यह केवल धर्म परिवर्तन ही नहीं बल्कि दलितों की आर्थिक और मानसिक मुक्ति का भी मार्ग है.
बाबासाहेब ने 14 अक्तूबर, 1956 को पांच लाख दलितों सहित हिन्दू धर्म का त्याग करके समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित बौद्ध धम्म को अपनाया था. इस के माध्यम से उनका एक मुख्य उद्देश्य दलितों का हिन्दुओं के रूप में उपजाति विभाजन ख़त्म करके उन्हें बौद्धों के रूप में एकल पहचान देकर संगठित करना भी था. यह आशा की जाती थी कि बाबासाहेब द्वारा चलाया गया बौद्ध धम्म आन्दोलन तेज़ी से आगे  बढ़ेगा और अधिक से अधिक दलित हिन्दू धर्म द्वारा स्थापित नारकीय जाति व्यवस्था से मुक्त हो जायेंगे. इस कार्य को आगे बढाने के लिए उन्होंने भारतीय बौद्ध महासभा की स्थापना भी की थी. उनके जीवित रहते देश के कई राज्यों में धर्म परिवर्तन के कई  कार्यक्रम आयोजित हुए थे और  दलितों ने भारी संख्या में हिन्दू धर्म त्याग कर बौद्ध धम्म अपनाया था.
यह पाया गया है कि जिन दलितों ने हिन्दू धर्म त्याग कर बौद्ध धम्म अपनाया है उन्होंने हिन्दू दलितों की अपेक्षा अधिक प्रगति की है जैसा कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों से स्पष्ट है. इन आंकड़ों के अनुसार बौद्ध पुरुष और महिलाओं का लैंगिक अनुपात 965 है जब कि हिन्दुओं का 939, मुसलामानों का 951 और सिक्खों  का 903 है. इसी प्रकार 0-6 वर्ष आयु के बौद्ध लड़के व् लड़कियों का लैंगिक अनुपात 933 है जबकि हिन्दुओं का 913, मुसलामानों का 943 और सिखों का केवल 828 है.  इसी जनगणना के अनुसार बौद्धों का शिक्षा दर 81.3% है जबकि हिन्दुओं का 73.3% और मुसलामानों का 68.5%है.  इसी प्रकार बौद्धों का कार्य सहभागिता दर 43.1% है जब कि हिन्दुओं का 41% और मुसलामानों का 32.6% और सिखों का 36.3% है. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बौद्धों का लिंग अनुपात, शिक्षा दर और कार्य सहभागिता दर न केवल हिन्दू दलितों बल्कि हिन्दुओ, मुसलामानों और सिखों से भी ऊँचा है जो कि उन की प्रगति का प्रतीक है.
उप्रोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है हिन्दुओं से बौद्ध बने दलितों पर धर्म परिवर्तन का बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा है जिस के फलस्वरूप उन्होंने न केवल हिन्दू दलितों बल्कि हिन्दुओ, मुसलामानों और सिखों के मुकाबले अधिक प्रगति की है.  इस से उनके जीवन में गुणात्मक परिवर्तन आया है. उन्होंने पुराने पेशे छोड़ कर नए पेशे अपनाये हैं. उनका आर्थिक स्तर ऊँचा हुआ है और उनके पारिवारिक जीवन स्तर में सुधार हुआ है. अतः यह आशा की जाती थी कि इस गुणात्मक परिवर्तन से प्रभावित हो कर अधिक से अधिक दलित बौद्ध धम्म की ओर आकर्षित होंगे और उनकी जनसँख्या में तेज़ी से वृद्धि होगी. परन्तु 2011 की जनगणना के आंकड़े इस के विपरीत स्थिति को दर्शाते हैं.  
2001 की जनगणना के अनुसार भारत में बौद्धों की जनसँख्या लगभग 80 लाख थी जो कि 2011 में बढ़ कर 84.43 लाख हुयी है  परन्तु इसी अवधि में बौद्धों की जनसंख्या बढ़ोतरी  दर 23.2% से घट कर 6.1% हो गयी है अर्थात इस में 17% की गिरावट आई है. इसी प्रकार 2001 में बौद्धों की आबादी देश की कुल आबादी का 0.8% थी जो कि 2011 में 0.7 रह गयी है. इस से स्पष्ट है कि 2001 से  2011 के दशक में  बौद्धों का वृद्धि दर बहुत नीचे गिर गया है जिस के कारण इस दशक में बौद्धों की कुल आबादी में केवल 4.4 लाख की ही वृद्धि हुई है. यह सभी आंबेडकरवादियों के लिए चिंता की बात होनी चाहिए. इस से यह भी लगता है बाबासाहेब का धम्म कारवां आगे बढ़ने की बजाये पीछे जा रहा है.
2011 की जनगणना से यह बात भी उभर कर आई है कि पिछले दशक में जम्मू कश्मीर, पंजाब, दिल्ली, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में बौद्धों की आबादी में भारी गिरावट आई है. उत्तर प्रदेश में 2001 में यह आबादी 3.02 लाख से घट कर  2011 में  2..06 लाख रह गयी है. यह ज्ञातव्य है उत्तर प्रदेश में इस दौरान तीन बार मायावती मुख्य मंत्री रही है और दावा किया जाता है कि उसने बौद्ध के प्रचार के लिए काफी कुछ किया है.  इसी प्रकार पंजाब में इस अवधि में यह आबादी 41,487 से कम होकर 33,237 रह गयी है. इस दौर में कर्नाटक में यह आबादी 3.93 लाख से कम हो कर 95,710 हो गयी है. दिल्ली में यह 23,705 से कम हो कर 18,449 रह गयी है. इस दौरान यद्यपि महाराष्ट्र और कुछ अन्य राज्यों में बौद्धों की आबादी में वृद्धि हुयी है परन्तु कुल आबादी तथा वृद्धि दर में गिरावट आना गंभीर चिंता का विषय है.
 उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि 2001 से 2011 के दशक के दौरान भारत में बौद्धों  की आबादी की वृद्धि दर न केवल कम हुयी है बल्कि कुछ राज्यों में बौद्धों की आबादी में भारी कमी भी हुयी है. यह गिरावट अपेक्षा के बिलकुल विपरीत है. आशा तो यह की जाती थी कि दलितों में निरंतर बढ़ रही जागृति के सापेक्ष इस में आशातीत वृदि होगी परन्तु जनगणना  के आंकड़े बिलकुल निराशाजनक तस्वीर पेश करते हैं. इस से लगता है कि बाबासाहेब का बौद्ध धम्म का कारवां  आगे बढ़ने की बजाये पीछे चला गया है. अतः ऐसी स्थिति में इस गतिरोध के कारणों का गहराई से विवेचन करने की आवश्यकता है. इस गतिरोध के कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित हो सकते हैं:-
 यह सर्वविदित है कि जनगणना के  दौरान काफी धांधली की जाती है क्योंकि जनगणना के कार्य में लगाये गए अधिकतर कर्मचारी हिन्दू होते हैं जो कि हिन्दुओं की जनसँख्या अधिक दिखाने के इरादे से बौद्धों की जनसँख्या कम करके दिखाते हैं और उन्हें हिन्दुओं की श्रेणी में रख देते हैं. जनगणना के दौरान यह देखा गया था कि अधिकतर कर्मचारी जनगणना का फार्म दिशा निर्देशों के विपरीत पेन्सिल से भर रहे  थे जिस से उनमें गड़बड़ी करना आसान हो जाता है. इस प्रकार की बेईमानी कोई पहली बार नहीं की गयी है बल्कि यह हरेक जनगणना में होती आई है.
बौद्धों की जनसँख्या में वृद्धि दर की कमी का एक कारण यह भी है कि बाबासाहेब के चले जाने के बाद जो स्वार्थी, अवसरवादी और सिद्धान्तहीन लम्पट दलित राजनीति उभरी है उसने बाबासाहेब के सामाजिक और धार्मिक आन्दोलन को बहुत पीछे धकेल दिया है. बाबासाहेब के आन्दोलन के दो मुख्य लक्ष्य थे: एक जातिविनाश और दूसरा  पूँजीवाद के खिलाफ लड़ाई. परन्तु दलित राजनीति ने इन दोनों को नकार कर जाति और सत्ता की राजनीति को अपना कर  बाबासाहेब की विचारधारा और आदर्शों के साथ जो खिलवाड़ किया है उस का दुष्प्रभाव बाबासाहेब के सामाजिक और धार्मिक आन्दोलन पर स्पष्ट दिखाई दे रहा है. यह बात सही है कि बाबासाहेब ने राजनीतिक सत्ता को सभी समस्यायों की चाबी बताया था परन्तु उन्होंने आगे यह भी कहा था कि राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल समाज के विकास के लिए किया जाना चाहिए परन्तु अधिकतर दलित नेताओं ने इस का इस्तेमाल अपने विकास के लिए ही किया है. बाबासाहेब ने यह भी कहा था कि केवल चुनाव जीतना ही राजनीतिक पार्टी का ध्येय नहीं होता है बल्कि उस का मुख्य काम जनता को राजनीतिक तौर पर शिक्षित करना होता है. परन्तु दलित नेताओं ने किसी भी तरह से चुनाव जीतने को ही अपना मुख्य लक्ष्य बनाया और  जाति की राजनीति करके दलितों की जाति भावनाओं का शोषण किया है. इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि अवसरवादी और सिद्धान्तहीन राजनीति ने सामाजिक और धार्मिक आन्दोलन को बहुत पीछे धकेल दिया है.
बौद्ध आन्दोलन के प्रति आम दलितों में दिलचस्पी में कमी का एक कारण यह भी है कि जो दलित बौद्ध बने हैं वे भी उतने अच्छे बौद्ध नहीं बने हैं जो कि दूसरों के लिए अनुकरणीय बन सकते थे. उनमें से अधिकतर ने कहने के लिए धर्म परिवर्तन कर तो लिया है परन्तु न तो वे जाति से मुक्त हुए हैं न ही उन्होंने बौद्ध धम्म को पूरी तरह से अपनाया ही है. इससे शेष दलितों में बौद्ध धम्म के प्रति आकर्षण पैदा होने की बजाये उदासीनता पैदा हुयी है जिस का असर बौद्ध आन्दोलन पर पड़ा है. अतः यह ज़िम्मेदारी धर्म परिवर्तित दलितों की थी कि वे अच्छे बौद्ध बन कर शेष दलितों के लिए प्रेरणा श्रोत बनते परन्तु वे इस ज़िम्मेदारी को निभाने में विफल रहे हैं.
डॉ. आंबेडकर के बाद बौद्ध आन्दोलन को चलाने के लिए एक सुनियोजित अभियान की आवश्यकता थी परन्तु उन द्वारा स्थापित भारतीय बौद्ध महासभा भी इस भूमिका को प्रभावी ढंग से  निभाने में विफल रही. इसके विपरीत आर.एस.एस. ने दलितों के हिन्दुकरण की प्रक्रिया को बहुत नियोजित ढंग से चलाया है. उन्होंने दलितों की छोटी उपजातियों को अपने प्रभाव में लेकर उनका हिन्दुकरण कर लिया है और उन्हें दलितों की बड़ी उपजातियों से अलगाव में डाल दिया है. यह सर्वविदित है कि दलित समाज पहले ही उपजाति विभाजन के कारण बुरी तरह से बिखरा हुआ था और वे अधिकतर हिन्दू धर्म के प्रभाव में थे.  डॉ. आंबेडकर के प्रभाव में  दलितों के अंदर  अहिन्दुकरण की एक धारा चली थी और कुछ लोगों ने उस से प्रभावित होकर हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धम्म को अपनाया है. परन्तु इस के मुकाबले में दलितों के हिन्दुकरण की धारा को आर.एस.एस ने पकड़ कर दलितों की छोटी उपजातियों को दलितों की बड़ी उपजातियों के खिलाफ बरगला कर और  अलगाव में डाल कर उन्हें कट्टर हिन्दू बना कर हिंदुत्व की छत्रछाया में ले लिया है. यह विभाजन न केवल समाजिक और धार्मिक है बल्कि राजनैतिक भी है  जो कि पिछले चुनाव में पूरी तरह से उभर कर सामने आया है.

अतः उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि विभिन्न कारणों से बाबासाहेब का सामाजिक और धार्मिक आन्दोलन आगे बढ़ने की बजाये पीछे को जाता दिखाई दे रहा है. पिछली जनगणना ने इस गतिरोध को बिलकुल स्पष्ट कर दिया है. इस दशक में न केवल बौद्ध जनसँख्या की वृद्धि दर में ही गिरावट आई है बल्कि कई राज्यों में बौद्ध जनसँख्या में भी भारी कमी भी आई है. अतः यह अति आवश्यक है कि इस गिरावट के आन्तरिक और बाहरी कारणों को ईमानदारी से चिन्हित किया जाये और उन्हें दूर करने हेतु गंभीर प्रयास किये जाएँ. वर्तमान अवसरवादी, स्वार्थी और सिद्धान्तहीन  राजनीति के स्थान पर एक रैडिकल राजनीतिक विकल्प की तलाश की जाये. इसके साथ ही बाबासाहेब के जाति विनाश और पूँजीवाद विरोधी आन्दोलन को भी तेज किया जाए ताकि दलितों के आंतरिक जातिभेद को नष्ट करके उन्हें हिंदुत्व के बढ़ते खतरे के विरुद्ध लड़ने के लिए एकताबद्ध किया जा सके. इसके साथ ही उनके हिन्दू धर्म से मुक्त होकर बौद्ध धम्म अपनाने के अभियान को भी सुनियोजित ढंग से चलाया जाये ताकि बाबासाहेब के भारत को बौद्ध्मय बनाने के सपने को साकार किया जा सके.   

गुरुवार, 26 मई 2016

डॉ. आंबेडकर का आगरा का ऐतिहासिक भाषण



डॉ. आंबेडकर का आगरा का ऐतिहासिक भाषण
(18 मार्च, 1956)
(नोट:- डॉ. आंबेडकर का यह भाषण ऐतिहासिक और अति महत्वपूर्ण है क्योंकि इस भाषण में उन्होंने अपने तब तक के अनुभव और भविष्य की रणनीति के संकेत दिए हैं. इस में उन्होंने दलित समाज के विभिन्न वर्गों को संबोधित किया है और उनके लिए दिशा निर्देश दिए हैं. वास्तव में यह भावी दलित आन्दोलन के लिए दिशा सूचक थे परन्तु बहुत अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि दलितों ने इन को नज़रंदाज़ किया है जिस का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव 2011 की जनगणना में बौद्धों की जन्संसख्या वृद्धि दर में भारी गिरावट के रूप में सामने आया है. आज दलित समाज बाबासाहेब के जाति उन्मूलन और बौद्ध धम्म आन्दोलन से दूर चला गया है. सिद्धान्तहीन और अवसरवादी दलित राजनीति ने बाबासाहेब के सामाजिक और धार्मिक आन्दोलन को बहुत पीछे धकेल दिया है. आज दलित समाज संगठित होने की बजाये जाति बिखराव का शिकार है. लगता है बाबासाहेब का कारवां आगे बढ़ने की बजाये पीछे की ओर चला गया है. यह सभी आम्बेडकरवादियों के लिए गहन चिंतन का विषय होना चाहिए.)  
जनसमूह से
पिछले तीस वर्षों से तुम लोगों को राजनैतिक अधिकार दिलाने के लिए मैं संघर्ष कर रहा हूँ. मैंने तुम्हें संसद और राज्य विधान सभायों में सीटों का आरक्षण दिलाया है. मैंने तुम्हारे बच्चों की शिक्षा के लिए  उचित प्रावधान करवाए हैं . आज हम प्रगति कर सकते हैं. अब यह तुम्हारा कर्तव्य है कि शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक गैर बराबरी  को दूर करने के लिए एकजुट होकर इस संघर्ष को जारी रखें. इसी उदेश्य हेतु तुम्हें हर प्रकार की कुर्बानियों के लिए तैयार रहना चाहिए जहाँ तक कि खून बहाने के लिए भी.
नेताओं से
“यदि कोई तुम्हें अपने महल में बुलाता है तो स्वेच्छा से जाओ.लेकिन अपनी झोंपड़ी में आग लगा कर नहीं. यदि वह राजा किसी दिन आपसे झगड़ता है और आप को अपने महल से बाहर धकेल देता है , उस समय तुम कहाँ जायोगे? यदि तुम अपने आपको बेचना चाहते हो तो बेचो लेकिन किसी भी तरह अपने संगठन को बर्बाद करने की कीमत पर नहीं. मुझे दूसरों से कोई खतरा नहीं है , लेकिन मैं अपने लोगों से ही खतरा महसूस कर रहा हूँ. “
भूमिहीन मजदूरों से
“मैं गाँव में रहने वाले भूमिहीन मजदूरों के लिए काफी चिंतित हूँ. मैं उनके लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाया हूँ. मैं उनके दुःख और तकलीफें सहन नहीं कर पा रहा हूँ.उनकी तबाहियों का मुख्य कारण यह है कि उनके पास ज़मींन नहीं है. इसी लिए वे अत्याचार और अपमान का शिकार होते हैं. वे अपना उत्थान नहीं कर पाएंगे. मैं इनके लिए संघर्ष करूँगा.यदि सरकार इस कार्य में कोई बाधा उत्पन्न करती है तो मैं इन लोगों का नेतृत्व करूँगा और इन की वैधानिक लड़ाई लडूंगा. लेकिन किसी भी हालत में भूमिहीन लोगों को   ज़मीं दिलवाने की प्रयास करूँगा.”
अपने समर्थकों से
“ बहुत जल्दी ही मैं तथागत बुद्ध की शरण को अंगीकार कर लूँगा. यह प्रगतिवादी धर्म है. यह समानता,  स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित है. मैं इस धर्म को बहुत सालों के प्रयास के बाद खोज पाया हूँ. अब मैं जल्दी ही बुद्धिस्ट बन जायूँगा. तब एक अछूत के रूप में मैं आप के बीच नहीं रह पायूँगा. लेकिन एक सच्चे बुद्धिस्ट के रूप में तुम लोगों के कल्याण के लिए संघर्ष जारी रखूँगा. मैं तुम्हें अपने साथ बुद्धिस्ट बनने के लिए नहीं कहूँगा क्योंकि मैं अंधभक्त नहीं चाहता. केवल वे लोग ही जिन्हें इस महान धर्म की शरण में आने की तमन्ना है, बौद्ध धर्म ग्रहण कर सकते हैं जिससे वे इस धर्म में दृढ विशवास के साथ रहें और इसके आचरण का अनुसरण करें.”
बौद्ध भिक्षुओं से
“बौद्ध धर्म एक महान धर्म है. इस धर्म के संस्थापक तथागत ने इस धर्म का प्रसार किया और अपनी अच्छाईयों के कारण यह धर्म भारत में  दूर-दूर तक एवं गलीकूचों तक पहुँच सका. लेकिन महान उत्कर्ष के बाद यह वर्ष 1293 ई. में विलुप्त हो गया. इसके कई कारण हैं. एक कारण यह भी है कि बौद्ध भिक्षु विलासितापूर्ण जीवन जीने के आदी हो गए. धर्म प्रचार हेतु स्थान-स्थान पर जाने की बजाये उन्होंने विहारों में आराम करना तथा रजवाड़ों की प्रशंसा में पुस्तकें लिखना शुरू कर दिया. अब इस धर्म की पुनर्स्थापना हेतु उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. उन्हें दरवाजे- दरवाजे जाना पड़ेगा. मुझे समाज में बहुत कम भिक्षु दिखाई देते हैं. इसी लिए जन साधारण में से अच्छे लोगों को भी इस धर्म के प्रचार हेतु आगे आना चाहिए.”
शासकीय कर्मचारियों  से
“हमारे समाज में शिक्षा  से कुछ प्रगति हुयी है. शिक्षा प्राप्त करके कुछ लोग उच्च पदों पर पहुँच गए हैं. परन्तु इन पढ़े-लिखे लोगों ने मुझे धोखा दिया है. मैं आशा कर रहा था कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे समाज की सेवा करेंगे. किन्तु मैं क्या देख रहा हूँ कि छोटे और बड़े क्लर्कों की एक भीड़ एकत्रित हो गयी है जो अपने पेट भरने में व्यवस्त हैं. ये जो शासकीय सेवाओं में नियोजित हैं उनका कर्तव्य है कि उन्हें अपने वेतन का बीसवां भाग (5 प्रतिशत) स्वेच्छा से समाज सेवा के कार्य हेतु देना चाहिए. तब ही समाज प्रगति करेगा अन्यथा केवल एक ही परिवार का सुधार होगा. एक वह बालक जो गाँव में शिक्षा प्राप्त करने जाता है सम्पूर्ण समाज की आशाएं उस पर टिक जाती हैं. एक शिक्षित सामाजिक कार्यकर्त्ता उनके लिए वरदान साबित हो सकता है.”
छात्र-छत्राओं से
“मेरी छात्र-छात्राओं से अपील है कि शिक्षा प्राप्त करने के बाद किसी प्रकार की कलर्की करने की बजाये उन्हें  अपने गाँव की अथवा उसके आस-पास के लोगों की सेवा करनी चाहिए जिससे अज्ञानता से उत्पन्न शोषण एवं अन्याय को रोका जा सके. आपका उत्थान समाज के उत्थान में ही निहित है.”
भविष्य की चिंता
“आज मेरी स्थिति एक बड़े खम्भे की तरह है, जो विशाल टेंटों को संभाल रही है. मैं उस समय के लिए चिंतित हूँ कि जब यह खम्भा अपनी जगह पर नहीं रहेगा. मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है. मैं नहीं जानता मैं कब आप लोगों के बीच से चला जायूँ. मैं किसी ऐसे नवयुवक को  नहीं ढूंढ पा रहा हूँ जो इन करोड़ों असहाय और निराश लोगों के हितों की रक्षा करे. यदि कोई नौजवान इस ज़िम्मेदारी को लेने के लिए आगे आता है तो मैं चैन से मर सकूँगा.”





  

शुक्रवार, 13 मई 2016

डॉ. आंबेडकर के साथ कानून मंत्री के रूप में भी छुआछूत होती थी.

डॉ. आंबेडकर के साथ  कानून मंत्री के रूप में भी छुआछूत होती थी.
मैं 1983 में आईपीएस का सीनियर कोर्स करने के लिए राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, हैदराबाद गया था. वहीँ पर हम लोगों का कुछ दिन का प्रशिक्षण NIRD ( National Institute of Rural Development) में भी था. वहां पर मेरी भेंट प्रो. माथुर से हुयी जिन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय जहाँ से डॉ. आंबेडकर ने शिक्षा प्राप्त की थी से शिक्षा प्राप्त की थी. बातचीत के दौरान उन्होंने मुझे बताया कि एक बार हम लोगों ने Columbia Alumni का प्रीतिभोज दिल्ली में आयोजित किया था जिस में वह डॉ. आंबेडकर की बगल वाली सीट पर बैठे थे. उन्होंने बताया कि बातचीत के दौरान डॉ. आंबेडकर ने उनसे कहा कि " मिस्टर माथुर, आप जानते हैं कि मैं इस देश का कानून मंत्री हूँ. मेरे साथी मंत्रियों के घरों में जब कभी कोई सामाजिक फंक्शन होता है तो मैं जाता हूँ और वहां पर जो भी पका होता है मैं खाता हूँ. परन्तु जब कभी मैं अपने साथी मंत्रियों को अपने घर पर बुलाता हूँ तो उन में से अधिकतर कुछ भी नहीं खाते हैं और उस दिन व्रत होने का बहाना बना देते हैं. इस से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मेरे साथियों के बीच मेरा सामाजिक दर्जा क्या है?"
इस से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि जब इस देश के कानून मंत्री और संविधान निर्माता के साथ उन के सवर्ण साथी ऐसा व्यवहार करते थे तो गाँव में एक अधना दलित के साथ क्या व्यवहार होता होगा? इसी लिए डॉ. आंबेडकर ने हिन्दू धर्म की नारकीय जाति व्यवस्था को नकारने का निर्णय लिया था.

शुक्रवार, 6 मई 2016

कार्ल मार्क्‍स की इतिहास की भौताक्वादी और बेशी श्रम के हस्त्गतकरण की अवधारणा



कार्ल मार्क्‍स की इतिहास की भौताक्वादी  और बेशी  श्रम के हस्त्गतकरण की अवधारणा
विज्ञान के इतिहास में मार्क्‍स ने जिन महत्त्वपूर्ण बातों का पता लगाकर अपना नाम अमर किया है, उनमें से हम यहाँ दो का ही उल्लेख कर सकते हैं।
पहली तो विश्व इतिहास की सम्पूर्ण धारणा में ही वह क्रान्ति है, जो उन्होंने सम्पन्न की। इतिहास का पहले का पूरा दृष्टिकोण इस धारणा पर आधारित था कि सभी तरह के ऐतिहासिक परिवर्तनों का मूल कारण मनुष्यों के परिवर्तनशील विचारों में ही मिलेगा और सभी तरह के ऐतिहासिक परिवर्तनों में सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन ही हैं तथा सम्पूर्ण इतिहास में उन्हीं की प्रधानता है। लेकिन लोगों ने यह प्रश्न न किया था कि मनुष्य के दिमाग़ में ये विचार आते कहाँ से हैं और राजनीतिक परिवर्तनों की प्रेरक शक्तियाँ क्या हैं। केवल फ्रांसीसी और कुछ-कुछ अंग्रेज़ इतिहासकारों की नवीनतर शाखा में यह विश्वास बरबस प्रविष्ट हुआ था कि कम से कम मध्ययुग से, सामाजिक और राजनीतिक प्रभुत्व के लिए उदीयमान पूँजीपति वर्ग का सामन्ती अभिजात वर्ग के साथ संघर्ष यूरोप के इतिहास की प्रेरक शक्ति रहा है। मार्क्‍स ने सिद्ध कर दिया कि अब तक का सारा इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास है, अब तक के सभी विविधरूपी और जटिल राजनीतिक संघर्षों की जड़ में केवल सामाजिक वर्गों के राजनीतिक और सामाजिक शासन की समस्या, पुराने वर्गों द्वारा अपना प्रभुत्व बनाये रखने तथा नये पनपते हुए वर्गों द्वारा इस प्रभुत्व को हस्तगत करने की समस्या ही रही है। लेकिन इन वर्गों के जन्म लेने और कायम रहने के कारण क्या हैं? इनका कारण वे शुद्ध भौतिक, गोचर परिस्थितियाँ हैं, जिनके अन्तर्गत समाज किसी भी युग में अपने जीवन-यापन के साधनों का उत्पादन और विनिमय करता है। मध्ययुग के सामन्ती शासन का आधार छोटे-छोटे कृषक समुदायों की स्वावलम्बी अर्थव्यवस्था था, जो अपनी ज़रूरत की प्रायः सभी चीज़ों का स्वयं उत्पादन कर लेते थे। इनमें विनिमय का प्रायः पूर्ण अभाव था, शस्त्रधारी सामन्त बाहर के आक्रमणों से इनकी रक्षा करते थे, उन्हें जातीय या कम से कम राजनीतिक एकता प्रदान करते थे। नगरों के अभ्युदय के साथ अलग-अलग दस्तकारियों और परस्पर व्यापार का विकास हुआ जो पहले आन्तरिक क्षेत्र में सीमित था और आगे चलकर अन्तरराष्ट्रीय हो गया। इस सबके साथ नगर के पूँजीपति वर्ग का विकास हुआ और मध्यवर्ग में ही उसने सामन्तों से लड़-भिड़कर सामन्ती व्यवस्था के अन्दर एक विशेषाधिकार प्राप्त श्रेणी के रूप में अपने लिए स्थान बना लिया। परन्तु 15वीं शताब्दी के मध्य के बाद से, यूरोप के बाहर की दुनिया का पता लगने पर, इस पूँजीपति वर्ग को अपने व्यापार के लिए कहीं अधिक विस्तृत क्षेत्र मिल गया। इससे उसे अपने उद्योग-धन्धों के लिए नयी स्फूर्ति मिली। प्रमुख शाखाओं में दस्तकारी का स्थान मैनुफेक्चर ने ले लिया जो अब फैक्टरियों के पैमाने पर स्थापित था। फिर इसकी जगह बड़े पैमाने के उद्योग ने ले ली जो पिछली सदी के आविष्कारों, ख़ासकर भाप से चलनेवाले इंजन के आविष्कार से सम्भव हो गया था। बड़े पैमाने के उद्योग का व्यापार पर यह प्रभाव पड़ा कि पिछड़े हुए देशों में पुराना हाथ का काम ठप हो गया और उन्नत देशों में उसने संचार के आधुनिक नये साधन भाप से चलने वाले जहाज़, रेल, वैद्युतिक तार उत्पन्न किये। इस प्रकार पूँजीपति वर्ग सामाजिक सम्पत्ति और सामाजिक शक्ति दोनों को अधिकाधिक अपने हाथों में केन्द्रित करने लगा, यद्यपि काफी अरसे तक राजनीतिक सत्ता से वह वंचित रहा जो सामन्तों और उनके द्वारा समर्थित राजतन्त्र के हाथ में थी। लेकिन विकास की एक मंज़िल ऐसी आयी फ्रांस में महान क्रान्ति के बाद जब उसने राजनीतिक सत्ता को भी हथिया लिया, और तब वे वह सर्वहारा वर्ग और छोटे किसानों के ऊपर शासन करनेवाला वर्ग बन गया। इस दृष्टिकोण से, समाज की विशेष आर्थिक स्थिति का सम्यक ज्ञान होने से सथी ऐतिहासिक घटनाओं की बड़ी सरलता से व्याख्या की जा सकती है, यद्यपि यह सही है कि हमारे पेशेवर इतिहासकारों में इस ज्ञान का सर्वथा अभाव है। इसी प्रकार हर ऐतिहासिक युग की धारणाओं और उसके विचारों की व्याख्या बड़ी सरलता से, उस युग की आर्थिक जीवनावस्थाओं और सामाजिक तथा राजनीतिक सम्बन्धों के आधार पर (ये सम्बन्ध भी आर्थिक परिस्थितियों द्वारा ही निर्धारित होते हैं) की जा सकती है। इतिहास को पहली बार अपना वास्तविक आधार मिला। यह आधार एक बहुत ही स्पष्ट सत्य है जिसकी ओर पहले लोगों का ध्यान बिल्कुल नहीं गया था, यानी यह सत्य कि मनुष्यों को सबसे पहले खाना-पीना, ओढ़ना-पहनना और सिर के ऊपर साया चाहिए, इसलिए पहले उन्हें लाज़िमी तोर पर काम करना होता है, जिसके बाद ही वे प्रभुत्व के लिए एक-दूसरे से झगड़ सकते हैं, और राजनीति, धर्म, दर्शन, आदि को अपना समय दे सकते हैं। आखि़रकार इस स्पष्ट सत्य को अपना ऐतिहासिक अधिकार प्राप्त हुआ।
समाजवादी दृष्टिकोण के लिए इतिहास की यह नयी धारणा सर्वोच्च महत्त्व की थी। इससे पता लगा कि पहले के सम्पूर्ण इतिहास की गति वर्ग-विरोधों और वर्ग-संघर्षों के बीच में रही है, कि शासक और शासित, शोषक और शोषित वर्गों का अस्तित्व बराबर रहा है और यह कि मानव-जाति के अधिकांश भाग के पल्ले सदा से कड़ी मशक्कत पड़ी है, आनन्दोपभोग बहुत कम। ऐसा क्यों हुआ? इसीलिए कि मानव-जाति के विकास की सभी पिछली मंज़िलों में उत्पादन का विकास इतना कम हुआ था कि ऐतिहासिक विकास इस अन्तरविरोधी रूप में ही हो सकता था, ऐतिहासिक प्रगति कुल मिलाकर एक विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक समुदाय के क्रियाकलाप का ही विषय बना दी गयी थी, और बहुसंख्यकों के भाग्य में अपने श्रम द्वारा जीवन-निर्वाह के अपने स्वल्प साधन और इसके अतिरिक्त विशेषाधिकार सम्पन्न समुदाय के लिए अधिकाधिक प्रचुर साधन उत्पादित करना रह गया था। परन्तु इतिहास की यही जाँच-पड़ताल, जो हमें इस प्रकार पहले के वर्ग शासन की स्वाभाविक एवं बुद्धिसम्मत व्याख्या प्रदान करती है (अन्यथा हम मानव-स्वभाव की दुष्टता द्वारा ही उसकी व्याख्या कर सकते थे), साथ ही साथ हमें यह बोध कराती है कि वर्तमान युग में उत्पादक शक्तियों के अति प्रचण्ड विकास के कारण मानव-जाति को शासक और शासित, शोषक और शोषित में बाँट रखने का अन्तिम बहाना भी, कम से कम सबसे उन्नत देशों में, मिट चुका है; कि शासक बड़े पूँजीपति अपनी ऐतिहासिक भूमिका समाप्त कर चुके हैं, और जैसा कि व्यापारिक संकटों, और ख़ासकर पिछली भयानक गिरावट और सभी देशों में फैली मन्दी से सिद्ध हो चुका है, वे समाज का नेतृत्व करने के योग्य अब नहीं रह गये हैं, बल्कि उत्पादन के विकास में बाधक बन गये हैं; कि ऐतिहासिक नेतृत्व सर्वहारा वर्ग के हाथ में चला गया है, ऐसे वर्ग के हाथ में चला गया है जो समाज में अपनी समग्र स्थिति के कारण सम्पूर्ण वर्ग शासन, सम्पूर्ण दासता एवं सम्पूर्ण शोषण का अन्त करके ही अपने को मुक्त कर सकता है; और यह कि सामाजिक उत्पादक शक्तियाँ, जो इतनी विकसित हो गयी हैं कि पूँजीपति वर्ग के काबू से बाहर हैं, बस इस प्रतीक्षा में हैं कि एकजुट सर्वहारा उन्हें अपने हाथों में ले ले जिससे कि ऐसी अवस्था कायम की जा सके जिसमें समाज का प्रत्येक सदस्य न केवल सामाजिक सम्पदा के उत्पादन में, बल्कि वितरण और प्रबन्ध में भी हाथ बँटा सकेगा, और जो अवस्था सम्पूर्ण उत्पादन के नियोजित संचालन द्वारा सामाजिक उत्पादक शक्तियों और उनकी उपज को इतना बढ़ा देगी कि प्रत्येक व्यक्ति की सभी उचित आवश्यकताओं की उत्तरोत्तर बढ़ती मात्रा में पूर्ति सुनिश्चित हो जायेगी।
मार्क्‍स ने जिस दूसरी महत्त्वपूर्ण बात का पता लगाया है, वह पूँजी और श्रम के सम्बन्ध का निश्चित स्पष्टीकरण है। दूसरे शब्दों में, उन्होंने यह दिखाया कि वर्तमान समाज में और उत्पादन की मौजूदा पूँजीवादी प्रणाली के अन्तर्गत किस तरह पूँजीपति मज़दूर का शोषण करता है। जब से राजनीतिक अर्थशास्त्र ने यह प्रस्थापना प्रस्तुत की कि समस्त सम्पदा और समस्त मूल्य का मूल स्रोत श्रम ही है, तभी से यह प्रश्न भी अनिवार्य रूप से सामने आया कि इस बात से हम इस तथ्य का मेल कैसे बैठायें कि उजरती मज़दूर अपने श्रम से जिस मूल्य को उत्पन्न करता है, वह पूरा का पूरा उसे नहीं मिलता, वरन उसका एक अंश उसे पूँजीपति को दे देना पड़ता है? पूँजीवादी और समाजवादी, दोनों ही तरह के अर्थशास्त्रियों ने इस प्रश्न का ऐसा उत्तर देने का प्रयत्न किया, जो वैज्ञानिक दृष्टि से संगत हो, परन्तु वे विफल रहे। अन्त में मार्क्‍स ने ही उसका सही उत्तर दिया। वह उत्तर इस प्रकार है : उत्पादन की वर्तमान पूँजीवादी प्रणाली में समाज के दो वर्ग हैंएक ओर पूँजीपतियों का वर्ग है, जिसके हाथ में उत्पादन और जीवन-निर्वाह के साधन हैं, दूसरी ओर सर्वहारा वर्ग है, जिसके पास इन साधनों से वंचित रहने के कारण बेचने के लिए केवल एक माल अपनी श्रम-शक्ति ही है और इसलिए जो जीवन-निर्वाह के साधन प्राप्त करने के लिए अपनी इस श्रम-शक्ति को बेचने के लिए मजबूर है। परन्तु किसी माल का मूल्य उसके उत्पादन में, और इसीलिए उसके पुनरुत्पादन में भी, लगी सामाजिक दृष्टि से आवश्यक श्रम की मात्रा से निर्धारित होता है। अतः एक औसत मनुष्य की एक दिन, एक महीना या एक वर्ष की श्रम-शक्ति का मूल्य इस श्रम-शक्ति को एक दिन, एक महीना या एक वर्ष तक कायम रखने के लिए आवश्यक जीवन-निर्वाह के साधनों में लगे श्रम की मात्रा से निर्धारित होता है। मान लीजिये कि किसी मज़दूर को एक दिन के जीवन-निर्वाह के साधनों के उत्पादन के लिए छः घण्टे का श्रम चाहिए, या उसी बात को यों कहें कि उनमें लगा श्रम छः घण्टे के श्रम की मात्रा के बराबर है, तो श्रम-शक्ति का एक दिन का मूल्य ऐसी रकम में व्यक्त होगा जिसमें भी छः घण्टे का श्रम लगा हो। अब यह भी मान लीजिये कि इस मज़दूर को काम पर लगानेवाला पूँजीपति उसे बदले में यह रकम देता है, और इसलिए उसकी श्रम-शक्ति का पूरा मूल्य उसे अदा करता है। अब अगर मज़दूर दिन में छः घण्टे पूँजीपति के लिए काम करता है तो वह पूँजीपति की पूरी लागत को चुकता कर देता है छः घण्टे के श्रम के बदले छः घण्टे का श्रम देता है। पर ऐसी हालत में पूँजीपति के लिए कुछ नहीं रहता, और इसलिए वह तो इसे बिल्कुल दूसरे ही ढंग से देखता है। वह कहता है : मैंने इस मज़दूर की श्रम-शक्ति छः घण्टे के लिए नहीं बल्कि पूरे दिन के लिए ख़रीदी है, और इसलिए वह मज़दूर से 8, 10, 12, 14 या इससे भी अधिक घण्टों की उपज अशोधित श्रम की, ऐसी श्रम की जिसका भुगतान नहीं किया गया होता, उपज होती है, और यह सीधे पूँजीपति की जेब में पहुँच जाती है। इस तरह पूँजीपति की नौकरी करनेवाला मज़दूर केवल उस श्रम-शक्ति का मूल्य ही नहीं पुनरुत्पादित करता जिसके लिए उसे मज़दूरी मिलती है, बल्कि इसके अलावा वह अतिरिक्त मूल्य भी पैदा करता है जिसे पहले पूँजीपति हस्तगत करता है और जो बाद में निश्चित आर्थिक नियमों के अनुसार समूचे पूँजीपति वर्ग के बीच वितरित होता है। यह अतिरिक्त मूल्य वह मूल कोष होता है जिससे लगान, मुनाफा, पूँजी का संचय बनता है संक्षेप में वह सारी दौलत बनती है जिसका ग़ैर-मेहनतकश वर्ग उपभोग अथवा संचय करते हैं। इससे यह सिद्ध हो गया कि आज के पूँजीपतियों द्वारा धन संचय उसी प्रकार दूसरों के अशोधित श्रम का हस्तगतकरण है जिस प्रकार दास-स्वामियों या भू-दास श्रम का शोषण करनेवाले सामन्ती प्रभुओं का धन-संचय था, और शोषण के इन सभी रूपों में अन्तर केवल अशोधित श्रम के हस्तगतकरण के तरीके और ढंग का ही है। पर इस बात ने सम्पत्तिधारी वर्गों के ढोंग से भरे शब्दजाल का अन्तिम औचित्य भी समाप्त कर दिया, जिसका आशय यह होता था कि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में कानून और न्याय, अधिकारों और कर्तव्यों की समानता तथा हितों के सामंजस्य का बोलबाला है, और यह प्रकट कर दिया कि वर्तमान पूँजीवादी समाज, अपने पूर्ववर्ती समाजों की ही भाँति और उनसे किसी भी तरह कम नहीं, जनता की विशाल की बहुसंख्या के निरन्तर घटते ही जाते अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा शोषण की एक भीमकाय संस्था मात्रा है।
एंगेल्स द्वारा जून, 1877 के मध्य में लिखित लेख का अंश।
<Volks-Kalender> नामक वार्षिकी में,
जो ब्रुंसविक में 1878 में निकली थी, प्रकाशित।