शनिवार, 30 अगस्त 2014

हमारा गणराज्य कितना धर्म निरपेक्ष?



(इतिहास के झरोखे से)
हमारा गणराज्य कितना धर्म  निरपेक्ष?
एस. आर. दारापुरी आई. पी. एस. (से.नि.)
हम लोग अवगत हैं कि हमारे देश के संविधान के अनुसार हमारा गणराज्य धर्म निरपेक्ष गणराज्य है जिस का अर्थ है कि राज्य का कोई भी धर्म नहीं है. इस कारण राज्य के काम काज में धर्म का कोई दखल नहीं होगा. इस  से अपेक्षा की जाति है कि राज्य का काम करने वाली विधायका, कार्यपालिका और न्याय पालिका भी धर्म निरपेक्ष होगी और इन में कार्यरत्त व्यक्ति भी पूर्णतया धर्म निरपेक्ष आचरण करेगे.  परन्तु अब तक गणराज्य के व्यवहार से ऐसा होना नहीं पाया गया है. इस के कुछ ऐतहासिक उदहारण निम्न हैं:-
1.       14 अगस्त, 1947 की रात को 12 बजे जब आज़ादी का झंडा फहराया गया था उस से तीन घंटा पहले नेहरु और उन के साथी दिल्ली में एक पवित्र अग्नि के इर्द गिर्द बैठे थे और इस कर्मकांड के लिए तंजौर से खास तौर पर बुलाये गए पुजारियों ने मन्त्र पढ़े थे और उन के ऊपर पवित्र जल छिड़का था. महिलाओं के माथे पर संधूर का तिलक लगाया गया था. इस के तीन घंटे बाद हिन्दू ज्योतिशियों द्वारा निर्धारित दिन और समय पर मध्य रात्रि में नेहरु ने राष्ट्र ध्वज फहरा कर ब्रोडकास्ट द्वारा देशवासियों को बताया था कि उन की भाग्य के साथ पूर्व निश्चित भेंट हो गयी है और भारत गणराज्य का जन्म हो गया है. ( सन्दर्भ: दा इंडियन आइडियोलॉजी – पैरी एंडरसन , पृष्ठ 103)
2.       भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बहुत धर्म भीरु हिन्दू थे. दुर्भाग्य से कायस्थ होने के कारण वे शूद्र वर्ग में आते थे. इस कारण उन का सामाजिक दर्जा निम्न था जिस के उच्चीकरण के लिए उन्हें काशी की विद्वत जन सभा से आशीर्वाद प्राप्त करना ज़रूरी था. अतः 1950 में राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद वे काशी गए. वहां पर उन्होंने विद्वत जनसभा के 200 ब्राह्मण सदस्यों के चरण धोये और उन्हें दक्षिणा दी.
डॉ. राजेद्र प्रसाद के इस कृत्य से दुखी हो कर डॉ. राम मनोहर लोहिया ने अपनी पुस्तक “ डा कास्ट सिस्टम “ के प्रारंभ में ही लिखा था, “भारतीय लोग इस पृथ्वी के सब से अधिक उदास लोग हैं........भारत गणराज्य के राष्ट्रपति ने बनारस शहर में शरेआम दो सौ ब्राह्मणों के चरण धोये. शरेआम दुसरे  के चरण धोना भोंडापन है, इसे केवल ब्राह्मणों तक ही सीमित रखना एक दंडनीय अपराध होना चाहिए. इस विशेषाधिकार प्राप्त जाति में केवल ब्राह्मणों को बिना विद्वता और चरित्र का भेदभाव किये शामिल करना पूरी तरह से विवेकहीनता है और यह जाति व्यवस्था और पागलपन का पोषक है.
राष्ट्रपति का ऐसे भद्दे प्रदर्शन में शामिल होना मेरे जैसे लोगों के लिए निर्मम अभ्यारोपण है जो केवल दांत पीसने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते.” ( The Caste System- Lohia, page 1 & 2)
3. ( )    डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने जब राष्ट्रपति के रूप में राष्ट्रपति में प्रवेश किया तो उन्होंने सब से पहले राष्ट्रपति भवन में कार्यरत सभी मुस्लिन खानसामों (रसोईयों) को हटा दिया. नेहरु इस से बहुत नाराज़ हुए.  इस पर उन्होंने आदेश दिया कि सभी मुस्लिम खानसामों को हिन्दू खानसामों की जगह प्रधान मंत्री के निवास पर लगा दिया जाये जब कि इस से सुरक्षा अधिकारी नाखुश थे.
3.(ख) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की एक अन्य हरकत से नेहरु बहुत नाराज़ थे जब वह राष्ट्रपति के रूप में सोमनाथ मंदिर जिस का जीर्णोद्धार किया गया था में शिवलिंग की स्थापना समारोह में भाग लेने गए थे. नेहरु को यह पता चला था कि खाद्य और कृषि मंत्री ने सरदार पटेल से मिल कर चीनी का मूल्य बढाया था और उस बढ़ी कीमत में से आधा पैसा चीनी मिल वालों ने रख लिया था और आधा पैसा सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में लगाया गया था. नेहरु को यह सूचना काफी देर से मिली थी जबकि इस सम्बन्ध में कुछ भी करना संभव नहीं था. यह भी ज्ञातव्य है कि नेहरु ने राजेन्द्र प्रसाद जी को वहां पर जाने से लिखित रूप में जाने से मना किया था परन्तु वह नहीं माने. (सन्दर्भ: Reminiscences of the Nehru Age – M.O.Mathai , p- 71))

4.डॉ. राजेन्द्र प्रसाद हनुमान भक्त थे. इसी लिए जब वे राष्ट्रपति भवन पहुंचे तो उन्होंने राष्ट्रपति भवन में कई लंगूर रख लिए जिन्हें वे अपने हाथ से खिलाते थे. जल्दी ही इन लंगूरों की जन संख्या में काफी वृद्धि हो गयी. ये लंगूर आस पास के रिहाइशी इलाकों के घरों में घुस कर सामान उठा लाते थे और नार्थ ब्लाक तथा सायूथ बलाक  में घुस कर पत्रावलियां  तथा टिफिन आदि उठा लाते थे परन्तु इन के उत्पात के विरुद्ध कुछ भी करना संभव नहीं था. राष्ट्रपति भवन के पास रहने वाले लोगों तथा सचिवालय के कर्मचारियों को तब राहत मिली जब राजेन्द्र प्रसाद जी राष्ट्रपति के पद से मुक्त हो गए और वे सभी लंगूर पकड़ कर दिल्ली के चिड़िया घर में पहुंचा दिए गए.
5. पंडित मदन मोहन मालवीय एक कट्टर सनातनी हिन्दू थे जो मुसलमानों, ईसाईयों और विदेशियों को अछूत मानते थे. वह जब भी इंगलैंड जाते थे तो अपने गंगा जल के कई लोटे ले जाते थे. वहां पर जब भी कोई अँगरेज़ या निम्न जाति का हिन्दू उन के कमरे में मिलने के लिए आता था तो वह उस के जाने के बाद कमरे को गंगा जल छिड़क कर पवित्र करते थे. कट्टर हिन्दू आज भी पञ्च गव्या; गाय का पेशाब, गोबर, मक्खन और दूध का मिश्रण बना कर मंदिर और तालाब का शुद्धिकरण करते हैं. (सन्दर्भ: Thus Spoke Ambedkar Vol. IV pages 101 & 102)
6. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद कट्टर सनातनी हिन्दू थे. जब डॉ. आंबेडकर ने कानून मंत्री के रूप में नेहरु जी की सहमती से लोक सभा हिन्दू कोड बिल पेश किया था तो डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने हिन्दू कोड बिल का विरोध किया था जैसा कि अन्य कट्टर हिन्दू सदस्य और संगठन कर रहे थे. परिणाम स्वरूप हिन्दू कोड बिल पास नहीं हो सका और इस से नाराज़ हो कर डॉ. आंबेडकर ने नेहरु मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था.

...........जारी है   










बुधवार, 27 अगस्त 2014

मायावती के भ्रष्टाचार की दलित राजनीति पर काली छाया



मायावती के भ्रष्टाचार की दलित राजनीति पर काली छाया
-एस. आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
आज लगभग सभी समाचार पत्रों में मायावती के विरुद्ध आय से ज्यादा संपत्ति के मामले को लेकर समाचार छपे हैं. इस में यह बताया गया है कि लखनऊ के एक व्यक्ति कमलेश कुमार वर्मा की सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका जिस में यह कहा गया है कि मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में सी.बी.आई. को मायावती के विरुद्ध नयी प्रथम सूचना दर्ज करने का आदेश दिया जाये. इस पर कोर्ट ने मायावती को जवाब दाखिल करने के लिए ततीन सप्ताह का समय दिया है.
पूर्व में सी.बी.आई. द्वारा ताज कोरिडोर के मामले की जांच के दौरान मायावती के विरुद्ध मामला दर्ज करके विवेचना उपरांत सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल करने पर कोर्ट द्वारा इसे तकनीकि आधार पर रद्द कर दिया गया था. 2012 में कोर्ट ने ताज कोरिडोर मामले में सम्बंधित अधिकारियों की संपत्तियों की जांच करने के आदेश दिए थे. इसी आदेश के अंतर्गत  मायावती की संपत्तियों की जांच भी की गयी थी. जांच से मायावती की संपत्तियां उस की ज्ञात आय से बहुत अधिक पायी गयी थीं. इस पर सी.बी.आई. ने अपनी तरफ से प्रथम सूचना दर्ज न करके ताज कोरिडोर के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को आधार बना कर प्रथम सूचना दर्ज की थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने यह कह कर रद्द कर दिया था कि उस ने सी.बी.आई. को ऐसा आदेश नहीं दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने यह ज़रूर कहा था कि अगर सी.बी.आई. चाहे तो अपनी तरफ से प्रथम सूचना दर्ज करके अग्रिम कार्रवाही कर सकती है परन्तु अज्ञात कारणों से सी.बी.आई. ने ऐसा नहीं किया. कुछ लोगों का कहना है कि सी.बी.आई. ने ऐसा तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी (कांग्रेस) के राजनीतिक दबावव के कारण नहीं किया था क्योंकि मायावती यूपीए की सरकार को समर्थन दे रही थी. वर्तमान जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने सी.बी.आई. से भी प्रथम सूचना दर्ज न करने का कारण पूछा है. जनहित याचिका की पैरवी कर रहे वकील शांति भूषण का कहना है कि इस मामले में सी.बी.आई. पहले ही पर्याप्त सबूत इकठ्ठा कर चुकी है और मायावती के विरुद्ध चार्ज शीट भी तैयार कर चुकी है.
इस जनहित याचिका के सम्बन्ध में कानून जानने वालों का कहना है अब मायावती के लिए बचना शायद उतना आसान नहीं होगा जितना कि पहले था. अब क्योंकि सी.बी.आई पहले ही मायावती की आय से अधिक संपत्ति के बारे में सारे सुबूत इकट्ठे कर के आरोप पत्र तक तैयार कर चुकी है अतः अब उस के लिए प्रथम सूचना दर्ज न करने का कोई बहाना नहीं चलेगा. इस समय मायावती के लिए भी अपने निर्दोष होने के बारे में कोई सफाई देना संभव नहीं होगा. परिणामस्वरूप अगर सुप्रीम कोर्ट सी.बी.आई. को मायावती के विरुद्ध प्रथम सूचना दर्ज करके विवेचना करने का आदेश दे देती है तो यह मायावती के लिए काफी भारी पड़ सकता है. यह भी उल्लेखनीय है कि मायावती के विरुद्ध उक्त मामला 1995 से 2003 तक का है परन्तु  अगर सी.बी.आई. चाहे तो वह इस के बाद की अवधि की संपत्ति की जांच भी कर सकती है क्योंक इस दौर में भी मायावती की संपत्ति में अप्रत्याशित वृद्धि हुयी है. कानून में “लगातार अपराध” की विवेचना का भी प्रावधान है.
मायावती के आय से अधिक संपत्ति के मामले में अंतिम परिणाम क्या होगा यह तो समय ही बताएगा परन्तु मायावती के भ्रष्टाचार का दलित राजनीति पर बहुत बुरा असर हुआ है. इस पार्टी के संस्थापक कांशी राम ने बाबा साहेब का मिशन पूरा करने के नारे के साथ राजनीति में कदम रखा था. अतः इस पार्टी के खास करके इस की कर्ताधर्ता मायावती के कार्य कलापों को बाबा साहेब की विचारधारा पर ही जांचना उचित होगा.
अब अगर मायावती के भ्रष्टाचार की बात की जाये तो इस सम्बन्ध में डॉ. आंबेडकर की टिप्पणी बहुत प्रासंगिक है. इस में बाबा साहेब ने एक बार किसी सन्दर्भ में कहा था, “मेरे विरोधी मेरे ऊपर तमाम आरोप लगाते रहे हैं परन्तु आज तक मेरे ऊपर कोई भी दो आरोप नहीं लगा सका. एक मेरे चरित्र के बारे में और दूसरा मेरी ईमानदारी के बारे में.” क्या मायावती इस प्रकार का दावा कर सकती है? बाबा साहेब की ईमानदारी की दूसरीं मिसाल यह है कि जब बाबा साहेब नेहरु मंत्रिमंडल में श्रम मंत्री थे तो कुछ उद्योगपति दिल्ली में उनके बेटे यशवंत राव से आ कर मिले और उन्होंने उसे अपने पिता जी से अपना काम करा देने के लिए कहा. इस के बारे में जब बाबा साहेब को पता चला तो उन्होंने तुरंत उस का बोरिया बिस्तर बंधवा कर दिल्ली से बम्बई भिजवा दिया.   
मायावती के भ्रष्टाचार के बारे प्रो. तुलसी राम ने “दलित-जातिवादी राजनीती और हिंदुत्व” लेख में जो लिखा है वह बहुत स्टिक है. उन्होंने लिखा है, “उन्हें आम सभाओं में चांदी-सोने के ताज पहनाए जाते थे और उनके हर जन्म दिवस पर लाखों रुपए की भारी-भरकम माला भी पहनाई जाती थी। 1951 में मुंबई के दलितों ने बड़ी मुश्किल से दो सौ चौवन रुपए की एक थैली डॉ. आंबेडकर को उनके जन्मदिन पर भेंट की थी, जिस पर नाराज होकर उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर कहीं भी ऐसा दोबारा किया तो वे ऐसे समारोहों का बहिष्कार करेंगे। 
पिछली दफा राज्यसभा का परचा दाखिल करते हुए मायावती ने आमदनी वाले कॉलम में एक सौ तेईस करोड़ रुपए की संपत्ति दिखाई थी। हकीकत यह थी कि मायावती के गैर-जनतांत्रिक व्यवहार के चलते बसपा में भ्रष्ट और अपराधी तत्त्वों की भरमार हो गई थी, जिसके कारण पूरा दलित समाज न सिर्फ बदनाम हुआ, बल्कि इस से दलित विरोधी भावनाएं भी समाज में खूब विकसित हुर्इं। एक तरह से मायावती दलित वोटों का व्यापार करने लगी थीं। पिछले अनेक वर्षों में चमार और जाटव समाज के लोग उत्तर प्रदेश में भेड़ की तरह मायावती के पीछे चलने लगे थे। इसलिए वे भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को चुन कर विधानसभा और संसद में भेजने लगे थे। “ इस से स्पष्ट है मायावती के भ्रष्टाचार का दलित राजनीति पर कितना दुष्प्रभाव पड़ा है.
मायावती के भ्रष्टाचार का सब से बुरा असर बसपा काडर के आचरण पर पड़ा है जिस के कारण बहुत से नेता और कार्यकर्त्ता भी भ्रष्ट हो गए जिन में से काफी जेल में हैं और बाकियों के खिलाफ जांचें चल रही हैं. जब मायावती ऊँचे दामों पर विधान सभा, लोक सभा और जिला परिषद के टिकट बेचने लगी तो टिकट खरीद कर चुनाव लड़ने वाले पूंजीपति, माफिया और दबंग लोग चुनाव में कार्यकर्ताओं को पैसा बाँट कर वोट खरीदने लगे. इस से राजनीतिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार बहुत व्यापक हो गया. मायावती का दलित वोटों के बारे में यह कहना कि यह हस्तान्तरणीय है पूरे दलित समाज के लिए अपमानजनक था. जब मायावती ने ट्रांसफर पोस्टिंग में पैसा लेना शुरू किया तो इस का सब से बुरा प्रभाव समाज के कमज़ोर तबकों खास कर दलितों पर पड़ा. यह स्वाभाविक है जो अधिकारी पैसा देकर पोस्टिंग पाते थे वे फील्ड में जा कर भ्रष्टाचार करते थे. इस का नतीजा यह था कि वे विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं जैसे मनरेगा, राशन वितरण, पेंशन तथा अन्य योजनाओं में भ्रष्टाचार करते थे और लाभार्थी अधिकतर दलित उन के लाभ से वंचित रह जाते थे. और तो और मायावती ने दलित महापुरुषों की मूर्तियों में जो पत्थर लगवाये उन में भी बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ. वैसे भी यह सर्वविदित है कि भ्रष्टाचार गरीब विरोधी होता है. अतः मायावती के भ्रष्टाचार का सब से बड़ा खामियाजा दलितों को ही भुगतना पड़ा.
वैसे तो बसपा में पैसा लेकर टिकट देने का धंधा काफी पहले ही शुरू हो गया था. 1994 में जब बसपा ने राज्य सभा में एक सांसद भेजा था वह कोई दलित नहीं था. बल्कि वह एक उद्योगपति जयंत मल्होत्रा था जिस को लेकर  दलितों में काफी प्रतिक्रिया और नाराज़गी थी. इस नाराज़गी के सम्बन्ध में मैंने जब कांशी राम से चर्चा की तो उन्होंने मुझे स्पष्ट बताया कि “पार्टी को चलाने के लिए पैसे की ज़रुरत होती है और मल्होत्रा ने हमारी पार्टी को पैसा दिया है.” इस पर मैंने उन्हें कहा था कि अगर पैसा ही सब कुछ हो जायेगा तो फिर आप की पार्टी के गरीब मिशनरी कार्यकर्ताओं का नंबर कब आएगा. पैसे देकर विधान सभा का टिकट पाने वालों  में मेरे अपने सगे समधी छोटे लाल भी थे. वह जहाँ से टिकट चाहते थे उन्हें वहां का टिकट न देकर दूसरी जगह का टिकट दे दिया गया और वह चुनाव हार गए तथा बर्बाद हो गए. बाद में तो विधान सभा और लोकसभा के टिकट बोली लगा कर बिकने लगे जिस से गुंडों, माफियाओं और पूँजीपतियों की पार्टी में भरमार हो गयी और पार्टी के समर्पित कार्यकर्त्ता हाशिये पर चले गए.
वैसे तो आज कल राजनीतिक क्षेत्र में ईमानदारी एक दुर्लभ वस्तु है. फिर भी यह आशा की जाती है कि जो वर्ग भ्रष्टाचार का सब से अधिक शिकार रहा हो अगर वह सत्ता में आता है तो वह भ्रष्टाचार को रोकने और कम करने की कोशिश ज़रूर करेगा. मायावती जो भ्रष्टाचार के सब से बड़े शिकार लोग दलितों की प्रतिनिधि के तौर पर सत्ता में आई थी, इस अपेक्षा पर सही नहीं उतरी इस के विपरीत उस ने उसी भ्रष्ट व्यवस्था को अपनाया और उसे मज़बूत किया जिस का खामियाजा उत्तर प्रदेश के दलितों को भुगतना पड़ा. केवल इतना ही नहीं मायावती ने अपने अनुयायियों की सोच को भी भ्रष्ट कर दिया है. मायावती के भ्रष्टाचार को वह यह कह कर उचित ठहरा देते हैं कि जब अधिकतर नेता भ्रष्ट हैं तो मायावती के भी भ्रष्ट होने में क्या बुरा है. कुछ तो यह भी कहते हैं कि चूँकि कि मायावती दलित है इस लिए उस के भ्रष्टाचार की आलोचना की जाती है. पता नहीं कि ऐसा कह कर वे दलित नेतायों के लिए भ्रष्टाचार में आरक्षण या छूट की वकालत कर रहे हैं या कुछ और. वैसे तो दलितों के और नेता भी दूध के धुले नहीं हैं परन्तु अब तक उन के भ्रष्टाचार का सीमित असर है परन्तु मायावती के भ्रष्टाचार का एक व्यापक असर हुआ है जिस ने दलित राजनीति को बिकायू और भ्रष्ट बना दिया है. मायावती का यह कहना कि हमारा वोट बैंक हस्तान्तरणीय है पूरे दलित समाज के लिए बहुत अपमानजनक रहा है. दरअसल मायावती ने दलित राजनीति को उन्हीं गुंडों, बदमाशों, माफिययों और पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया जिन से उनकी लडाई थी और जिन के चंगुल से उन्हें मुक्त होना था. इस से सारा दलित आन्दोलन और दलित  राजनीति वर्षों पीछे चली गई है और इसे फिर आगे बढ़ाने में काफी समय और मेहनत लगेगी.

सोमवार, 25 अगस्त 2014

मायावती के उत्तर प्रदेश में उप चुनाव न लड़ने के निहितार्थ



मायावती के उत्तर प्रदेश में उप चुनाव न लड़ने के निहितार्थ
-एस. आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट 
सभी अवगत हैं कि अगले महीने उत्तर प्रदेश में 11 विधान सभा तथा एक लोकसभा सीट के लिए उप चुनाव होने वाले हैं. एक ओर जहाँ समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस इस के लिए अपनी अपनी ताल ठोक रही हैं वहीँ मायावती का इस चुनाव में भाग न लेने का ऐलान आश्चर्यजनक है. चुनाव न लड़ने के पीछे मायावती ने यह तर्क दिया है कि उत्तर प्रदेश में अगले साल तक सपा की सरकार भंग होकर समय से पहले चुनाव होने की पूरी सम्भावना है इस लिए वह उप चुनाव न लड़ कर अभी से उस चुनाव की तैय्यारी में जुटने वाली हैं और वह दिल्ली में रह कर अन्य राज्यों में होने वाले चुनाव की तैय्यारी के लिए समय देंगी.
मायावती का चुनाव न लड़ने का यह तर्क आसानी से गले उतरने वाला नहीं है क्योंकि यह उप चुनाव एक दो सीटों पर न हो कर 12 सीटों पर हो रहा है जो कि एक बड़ी संख्या है. फिर ऐसी पार्टी के लिए तो ऐसा चुनाव लड़ना और भी ज़रूरी है जो कि हाल के लोक सभा चुनाव में बुरी तरह से हार चुकी हो. उस के लिए अपने काडर को पुनर्जीवित करने का एक अच्छा मौका है. चुनाव पार्टी को जनता के बीच जा कर अपनी बात कहने का मौका देता है और जनता में आप की उपस्थिति भी दर्ज होती है परन्तु मायावती इस मौके का जानबूझ कर इस्तेमाल नहीं कर रही तो इस के कुछ न कुछ गहरे निहितार्थ ज़रूर होंगे.
मायावती द्वारा उप चुनाव न लड़ने के बारे में कुछ लोगों का कहना है कि मायावती लोक सभा के चुनाव में
अपनी पार्टी की शर्मनाक हार से बहुत हतोत्साहित हो चुकी हैं और उन्हें डर है कि अगर इस चुनाव में भी उस की फिर वैसी ही दुर्दशा हुयी तो यह उस के लिए बहुत बुरा होगा. परन्तु अगर हार के डर से पार्टी चुनाव लड़ना ही छोड़ दे तो फिर पार्टी का भविष्य क्या होगा?
बसपा के कुछ लोगों का कहना है कि मायावती मुलायम सिंह को कमज़ोर करने के इरादे से यह चुनाव नहीं लड़ रही ताकि वोटों का बंटवारा न हो और भाजपा अधिक से अधिक सीटें जीत ले. यदि यह तर्क सही भी मान लिया जाये तो इस से बसपा को तो कोई फायदा होने वाला नहीं है. सारा फायदा तो भाजपा को ही होगा.
कुछ लोगों का कहना है कि चुनाव न लड़ने का मुख्य कारण मायावती की भाजपा से गहरी सांठ गाँठ होना है . हाल में मायावती ने जिस आत्मविश्वास के साथ अगली मुख्य मंत्री होने का दावा ठोका है, उस से परिलक्षित होता है कि शायद पहले की तरह मायावती का भाजपा  से कोई सौदा हो गया है. मायावती का पूरे विशवास के साथ यह कहना कि निकट भविष्य में सपा की सरकार बर्खास्त होने वाली है और अगले साल उत्तर प्रदेश में समय से पहले चुनाह हो सकते है, भी कुछ खास दिशा में संकेत करते हैं. वैसे मायावती के भाजपा से पुराने रिश्ते हैं क्योंकि वह पूर्व में तीन बार भाजपा से सहायता लेकर मुख्य मंत्री बन चुकी हैं और अब भी उसे भाजपा से हाथ मिलाने में कोई गुरेज़ नहीं होगा.
अब चूँकि मायावती यह उप चुनाव नहीं लड़ रही तो सवाल पैदा होता है कि बसपा के प्रत्याशी न होने पर बसपा का वोट किसको जायेगा. स्पष्ट है वह सपा, कांग्रेस को न जा कर भाजपा को ही जायेगा. यह दलित राजनीति के लिए और भी घातक होगा. एक तो पिछले चुनाव में ही दलितों का बहुत बड़ा हिस्सा मायावती की गलतियों के कारण भाजपा की गोद में जा चुका है. दूसरे बसपा द्वारा इस  चुनाव को न लड़ने के कारण भाजपा को दलितों के और नजदीक आने का मौका मिलेगा. यह भी हो सकता है कि भाजपा और दलितों को प्रभावित करके बसपा से तोड़ने में सफल हो जाये क्योंकि मायावती ने अपने साथ साथ अपने काडर को भी काफी हद तक भ्रष्ट कर दिया है जिसे भाजपा के लिए खरीदना कठिन नहीं होगा.
अतः बसपा द्वारा चुनाव न लड़ने के गहरे निहितार्थ हैं. मायावती चुनाव न लड़ के सपा को कमज़ोर करने के बहाने भाजपा को मज़बूत कर रही है. इस में मायावती की भाजपा के साथ सांठ गाँठ भी स्पष्ट दिखाई देती है. मायावती की इस तिकड़म से फिलहाल बसपा को तो कोई लाभ होने वाला नहीं है बल्कि उस की कीमत पर भाजपा ज़रूर मज़बूत हो जाएगी. वैसे तो उत्तर भारत में भाजपा को पुनर्जीवित करने का अधिक श्रेय मायावती को ही जाता है. मगर अब मायावती को यह याद रखना चाहिए कि वर्मान भाजपा 1995 वाली नहीं है जब वह अपने असितित्व  की लडाई लड़ रही थी. अब वह अपनी पूरी ताकत में है और स्वतंत्र रूप से उत्तर प्रदेश में अगली सरकार बनाने का इरादा रखती है. ऐसा प्रतीत होता है कि मायावती द्वारा वर्तमान चुनाव न लड़ना भाजपा के लिए वरदान सिद्ध होगा और वह उत्तर प्रदेश में और मज़बूत हो जाएगी. कहीं ऐसा न हो कि मायावती पर “चौबे छब्बे बनने चले थे दूबे बन कर लौटे“ वाली बात चरितार्थ न हो जाये.     

शनिवार, 23 अगस्त 2014

डॉ. आंबेडकर और पिछड़ी जातियां



डॉ. आंबेडकर और पिछड़ी जातियां
एस. आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट  
डॉ. आंबेडकर को प्राय दलितों के उद्धारक के रूप में पहचाना जाता है जबकि वे सभी पददलित वर्गों दलितों और पिछड़ों के अधिकारों के लिए लड़े थे. परन्तु वर्ण व्यवस्था के कारण पिछड़ी जातियां जो कि शूद्र हैं अपने आप को अछूतों (दलितों) से सामाजिक सोपान पर ऊँचा मानती हैं. एक परिभाषा के अनुसार पिछड़ी जातियां शूद्र हैं तो दलित जातियां अति शूद्र हैं. अंतर केवल इतना है कि पिछड़ी जातियां सछूत और दलित जातियां अछूत मानी जाती हैं. यह भी एक एतहासिक सच्चाई है कि सछूत  होने के कारण पिछड़ी जातियों का कुछ क्षेत्रों में अछूतों से अधिक शोषण हुआ है. यह भी उल्लेखनीय है कि पिछड़ी जातियां कट्टर हिन्दुवाद के चंगुल में फंसी रही हैं जबकि दलित हिन्दू धर्म के खिलाफ निरंतर विद्रोह करते रहे हैं. सामाजिक श्रेष्ठता के भ्रम के कारण पिछड़ी जातियां  डॉ. आंबेडकर को अपना नेता न मान कर दलितों का नेता ही मानती आई हैं. यह इसी लिए भी है क्योंकि अधिकतर पिछड़ी जातियां सवर्ण हिन्दुओं के प्रभाव में रही हैं और उन्हें डॉ. आंबेडकर के बारे में बराबर भ्रमित किया जाता रहा है ताकि वे डॉ. आंबेडकर की विचार धारा से प्रभावित होकर दलितों के साथ एकता स्थापित न कर लें और सवर्णों के लिए बड़ी चुनौती पैदा न कर दें. पिछड़ों और दलितों में इस दूरी के लिए दलित और पिछड़ों के नेता भी काफी हद तक जिम्मेवार हैं जो कि जाति की राजनीति करके अपनी रोटी सेंकते रहे हैं.
अब अगर एतहासिक परिपेक्ष्य में देखा जाये तो डॉ. आंबेडकर ने जहाँ पददलित जातियों के अधिकारों के लिए जीवन भर संघर्ष किया वहीँ उन्होंने पिछड़ी जातियों के अधिकारों के लिए भी निरंतर संघर्ष किया. इस तथ्य की पुष्टि निम्नलिखित तथ्यों से होती है:-
1.       डॉ. आंबेडकर की उच्च शिक्षा में बड़ौदा के महाराजा सायाजी राव गायकवाड जो कि पिछड़ी जाति के थे और उन्होंने उन्हें अमेरिका में पढ़ने के लिए छात्रवृति दी थी, का बहुत बड़ा योगदान था.
2.       डॉ. आंबेडकर को सहायता और योगदान देने वाले पिछड़ी जाति के दूसरे व्यक्ति  छत्रपति साहू जी महाराज थे.
3.       डॉ. आंबेडकर के रामास्वामी नायकर जो दक्षिण भारत के गैर ब्राह्मण आन्दोलन के अगुया थे, से सम्बन्ध बहुत अच्छे थे.
4.       डॉ. आंबेडकर पिछड़ी जाति के समाज सुधारक ज्योति राव फुले की सामाजिक विचारधारा से बहुत प्रभावित थे. 
5.  डॉ. आंबेडकर ने ट्रावनकोर (केरल) में इज़ावा जो कि पिछड़ी जाति है, के समानता के आन्दोलन का समर्थन किया था. 
6.डॉ.आंबेडकर ने ही 1928 में साईमन कमीशन के सामने भारत के भावी संविधान में पिछड़ी जातियों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की वकालत की थी.  
7.       डॉ. आंबेडकर ने संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष के रूप में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के सम्बन्ध में संविधान की धारा 15 (4) में “बैकवर्ड” शब्द का समावेश करवाया था जो बाद में सामाजिक और शैक्षिक तौर से पिछड़ी जातियों के लिया आरक्षण का आधार बना.
8.       डॉ. आंबेडकर के प्रयास से ही संविधान की धारा 340 में पिछड़ी जातियों की पहचान करने के लिए आयोग की स्थापना किये जाने का प्रावधान किया गया.
9.       डॉ. आंबेडकर ने 1942 में शैडयूल्ड कास्ट्स फेडरशन नाम से जो राजनैतिक पार्टी बनायीं थी उस की नीति में यह उल्लिखित था कि पार्टी पिछड़ी जातियों और जन जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों के साथ गठजोड़ को प्राथमिकता देगी और अगर ज़रुरत पड़ी तो पार्टी अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व करने के लिए अपना नाम बदल कर “बैकवर्ड क्लासेज़ फेडरशन” कर लेगी. अतः पार्टी ने उस समय सोशलिस्ट पार्टी से ही चुनावी गठजोड़ किया था.
10.  1951 में जब डॉ. आंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल को लेकर कानून मंत्री के पद से  इस्तीफा दिया था तो उस में उन्होंने कहा था, “मैं एक दूसरा मामला संदर्भित  करना चाहूँगा जो मेरे इस सरकार से असंतोष का कारण है. यह पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जातियों के साथ इस सरकार द्वारा किये गए बर्ताव के बारे में है. मुझे इस बात का दुःख है की संविधान में पिछड़ी जातियों के लिए कोई भी संरक्षण नहीं किया गया है. इसे राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाने वाले आयोग की संस्तुतियों के आधार पर सरकारी आदेश पर छोड़ दिया गया है. हमें संविधान पारित किये एक वर्ष से अधिक हो गया है परन्तु सरकार ने अभी तक आयोग नियुक्त करने की सोचा भी नहीं है.” इस से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि डॉ. आंबेडकर पिछड़े वर्गों के हित के बारे में कितने चिंतित थे.
11.   कानून मंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित करते हुए पिछड़ी जातियों की उपेक्षा के बारे में चेतावनी देते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था,” अगर वे अपने समानता का दर्जा पाने के प्रयासों में मायूस हुए तो “शैडयूल्ड कास्ट्स फेडरशन” कम्युनिस्ट व्यवस्था को तरजीह देगी और देश का भाग्य डूब जायेगा.” इस से भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है की डॉ. आंबेडकर पिछड़े वर्गों के हित के बारे में कितने प्रयत्नशील थे.  पिछड़े वर्गों के हितों की उपेक्षा की बात उन्होंने  बम्बई के नारे पार्क में एक बड़ी जन सभा में भी दोहराई थी.
12.   डॉ. आंबेडकर द्वारा पिछड़ी जातियों के मुद्दे को लेकर पैदा किये गए दबाव के कारण ही नेहरु सरकार को 1951 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग नियुक्त करना पड़ा. यह बात अलग है कि सरकार ने इस आयोग की संस्तुतियों को नहीं माना बल्कि आयोग के अध्यक्ष को ही आयोग की संस्तुतियों ( आरक्षण का जातिगत आधार) के विपरीत मंतव्य देने के लिए बाध्य कर दिया गया.  
13.   डॉ. छेदी लाल साथी जो कि सत्तर के दशक में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष थे ने मुझे बताया था कि 1954 का चुनाव हारने के बाद बाबा साहेब बहुत मायूस थे. उस समय पिछड़े  वर्ग के नेता चंदापुरी जी, एस.डी.सिंह चौरसिया और अन्य लोगों  ने उन्हें कहा कि आप घबराईये नहीं हम सब आप के साथ हैं. इसी ध्येय से उन्होंने पटना में पिछड़ा वर्ग की एक रैली का आयोजन किया था जिस में बहुत बड़ी भीड़ जुटी थी. इस से बाबा साहेब बहुत प्रभावित हुए थे और वे फिर दलितों और पिछड़ों की राजनीति में सक्रिय हुए.
14.   इस सम्बन्ध में डॉ. छेदी लाल साथी ने अपनी पुस्तक " दलितों व् पिछड़ी जातियों की स्थिति" के पृष्ठ  113 पर लिखा है, पटना से वापस आने के बाद बाबासाहेब ने अपने साथियों से विचार विमर्श करके शैड्युल्ड कास्ट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया को भंग करके उसके स्थान पर रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया के गठन का फैसला लिया क्योंकि सन 1952 और 1954 में दो बार चुनाव हारने के बाद बाबासाहेब ने महसूस किया कि अनुसूचित जातियों की आबादी तो केवल 20% ही है और जब तक उनको 52% पिछड़े वर्ग का समर्थन नहीं मिलेगा, वह चुनाव में नहीं जीत पाएंगे. अतः; बाबासाहेब ने पिछड़े वर्ग के नेतायों, विशेष करके शिवदयाल सिंह चौरसिया आदि से मशवरा करके रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया में 20% दलित वर्ग के आलावा 52% पिछड़े वर्ग के लोगों तथा 12% आबादी वाले मुसलमान, ईसाई और सिखों को भी सम्मिलित करने का निर्णय लिया. एक साल से अधिक समय रिपब्लिकन पार्टी का संविधान बनाने और सलाह मशविरा में निकल गया."
इस दृष्टि से पटना की यह रैली एतहासिक थी क्योंकि इस में दलितों और पिछड़ों की एकता की नींव डली थी. बाबासाहेब ने नागपुर में 15 अक्तूबर, 1956 को शैड्युल्ड कास्ट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया को भंग करके उसके स्थान पर रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया की स्थापना करने की घोषणा की थी. 1957 से 1967 तक इन वर्गों की एकता पर आधारित रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया एक बड़ी राजनैतिक ताकत के रूप में उभरी थी परन्तु बाद में  कांग्रेस जिस के लिए यह पार्टी सब से बड़ा खतरा बन गयी थी, ने दलित नेतायों की कमजोरियों का फायदा उठा कर उन्हें खरीद लिया और यह पार्टी कई टुकड़ों में बंट गयी. बाद में उभरी बसपा जैसी पार्टी ने भी इस गठबंधन को तहस नहस कर दिया.
15.   अपने जीवन के अंतिम वर्षों में बाबा साहेब ने दलितों और पिछड़ों की एकता स्थापित करने के लिए पिछड़े वर्गों के नेता राम मनोहर लोहिया आदि से संपर्क स्थापित भी किया और उन के बीच पत्राचार भी हुआ था.  परन्तु दुर्भाग्य से जल्दी ही बाबा साहेब का परिनिर्वाण हो गया और वह गठबंधन नहीं हो सका.
16.   उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि डॉ. आंबेडकर ने न केवल दलितों हितों के लिए ही संघर्ष किया बल्कि वे जीवन भर पिछड़े वर्ग के हितों के लिए भी प्रयासरत रहे. उन के प्रयास से ही संविधान में पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान हो सका और उन द्वारा पैदा किये गए दबाव के कारण ही प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग गठित हुआ और बाद में मंडल आयोग गठित हुआ और पिछड़े वर्ग को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण मिला जिस के लिए  पिछड़े वर्ग को बाबा साहेब का अहसानमंद होना चाहिए.
अतः पिछड़े वर्ग को उन के उत्थान के लिए बाबा साहेब के योगदान को स्वीकार करना चाहिए. वर्तमान की  नयी चुनौतियों के परिपेक्ष्य में इन वर्गों की एकता को पुनर स्थापित करने की ज़रूरत है. यह बात भी सही है कि दलितों और पिछड़ों में कुछ वर्गीय अन्तर्विरोध हैं जिन्हें हल किये बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता.  यह सर्विदित है कि दलित, अति पिछड़े (हिदू, ईसाई और मुसलमान) कुदरती दोस्त हैं. यह समीकरण जातिगत न होकर सांझे मुद्दों पर ही आधारित हो सकता है जो कि देश में बहुसंख्यकवाद और हिन्दुत्ववादी फासीवादी राजनीति का सामना कर सकता है.