चाँद है जेरे कदम सूरज खिलौना हो गया
चाँद है जेरे कदम सूरज खिलौना हो गया
हाँ, मगर दौर में किरदार बौना हो गया
शहर के दंगों में जब भी मुफलिसों के घर जले
कोथिओं कि लान का मंज़र सलोना हो गया
ढो रहा है आदमी कंधे पे खुद अपनी सलीब
ज़िन्दगी का फलसफा जब भोज ढोना हो गया
यूँ तो अदम के बदन पर भी था पत्तों का लिबास
रूह उरियां क्या हुई मौसम घिनौना हो गया
अब किसी लैला को भी इकरारे-महबूबी नहीं
इस अहद में प्यार का सिम्बल तिकोना हो गया
अदम गोंडवी
सोमवार, 19 दिसंबर 2011
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
भारत में लोकतांत्रिक अवनति: एक आंबेडकरवादी संवैधानिक विश्लेषण
भारत में लोकतांत्रिक अवनति: एक आंबेडकरवादी संवैधानिक विश्लेषण - एस आर दारापुरी आई. पी. एस. (से. नि.) यह शोध-पत्र भारत में लोकत...
-
डॉ. आंबेडकर का आगरा का ऐतिहासिक भाषण (18 मार्च, 1956 ) (नोट:- डॉ. आंबेडकर का यह भाषण ऐतिहासिक और अति महत्वपूर्ण है क्योंकि इस...
-
बौद्धों की जनसँख्या वृद्धि दर में भारी गिरावट: एक चिंता का विषय - एस.आर. दारापुरी , राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्र...
-
भगवान दास : एक स्मृति ( एक संस्मरण , जो उनके परिनिर्वाण के दूसरे दिन लिखा गया था) ( कँवल भारती) ...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें