शनिवार, 10 दिसंबर 2011

२६/११ निर्णय भारतीय मुसलमानों के लिए बड़ी राहत
हाल में मुंबई कोर्ट दुआरा २६/११ आतंकी हमले के दिए गए निर्णय ने भारतीय मुसलमानों को बड़ी राहत दी है. इस में यहाँ एक ओर अजमल कसाब और उसके पाकिस्तानी संचालकों को दोषी करार दिया गया है वहीँ इस में फहीम अंसारी और शेख सबाहुद्दीन अहमद जिन्हें इस मामले में झूठा फंसाया गया था और उन्हें भारतीय सहयोगी षड्यंत्रकारी सिद्ध करने का प्रयास किया गया था, उन्हें बरी कर दिया है .

" मैं शेख और अंसारी को तुरंत रिहा करने का आदेश देता हूँ, " जज महोदय ने अभियोजन पक्ष की कहानी कि इन दोनों ने लश्करे तैएबा के इशारे पर हमलावरों को निशाना बनाये जाने वाले स्थानों के नक़्शे उपलब्ध कराने की कहानी पर अविश्वास करते हुए आदेश दिया . अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि उस ने इन अभियुक्तों के विरुद्ध पेश किये गए साक्ष्य को ' बहुत संदेहजनक ' पाया है. पुलिस ने न्यायालय में कहा था कि अंसारी ने एक वर्ष पहले बधवार पार्क (मुंबई) में एक कमरा किराये पर लिया था और नक़्शे बना कर कुछ नक़्शे लश्करे तैएबा के कमांडर को काठमांडू में उपलब्ध कराए थे .

" मैं महसूस करता हूँ कि अंसारी दुआरा नेपाल में सबाहुद्दीन को कच्चे नक्शे देने और उसके मृत आतंकी की खून से भीगी हुए पैंट से बरामद होना बिलकुल विश्वास करने योग्य नहीं है जाब कि अतिआधुनिक तकनीक जी . पी एस. तथा वी. ओ.आइ. प तकनीक का प्रयोग कर रहे थे " उन्होंने कहा . "लश्करे तोएबा के कमांडर अंसारी दुआरा बनाये गए ऐसे कच्चे नक्शों पर क्यों भरोसा करेंगे जब इन के बढ़िया संस्करण गूगल और विकीमैपिया वेब साईट पर उपलब्ध हैं."
फहीम अंसारी और सबाहुद्दीन की रिहाई ने पुलिस की २६/११ हमले में भारतीय नागरिकों खास करके भारतीय मुसलमानों के शामिल होने की थेओरी को बिलकुल झूठा सिद्ध कर दिया है. यदि अदालत ने इन दोनों के इस साजिश में शामिल होने की थेओरी पर विश्वास करके उन्हें दोषी करार दे दिया होता, इस से मुसलमानों के लिए एक बड़ी मुसीबत खड़ी हो गयी होती. हमें याद है कि बाटला हाउस मुठभेड़ के बाद मुस्लमान कैसे आतंकित हो कर रक्षात्मक हो गए थे . बेशक उक्त मुठभेड़ की सचाई अभी भी संदेह के घेरे में है और यू.पी.ए. सरकार अभी तक भी उसकी न्यायिक जाँच करवाने से डर रही है. ऐसा हरेक आतंकवादी घटना के बाद होता है.

हम जानते हैं कि मुसलमानों के विरुद्ध आम तौर पर आतंकी घटनाओं में शामिल होने का आरोप लगाया जाता है. एक प्रचलित कहावत के अनुसार " सभी मुस्लमान आतंकी नहीं हैं परन्तु सभी आतंकी मुस्लमान हैं." जबकि अब हिन्दू आतंकवादियों के पकडे जाने से यह धारणा भी गलत सिद्ध हो गयी है. इस का परिणाम यह है कि बहुत बड़ी संख्या में मुस्लमान नवयुवकों को कई कई वर्षों तक झूठे मुकदमो में फंसा क़र जेलों में ठूंस दिया गया है. यह देखा गया है कि उनमे से बाद में बहुत से निर्दोष पाए जाते हैं. वे लम्बे समय तक मुकदमें झेलते हैं और आखिर में छूट जाते हैं परन्तु इस बीच में उन्हें बहुत मुसीबतें झेलनी पड़तीं हैं जैसा कि अंसारी और सबाहुद्दीन के मामले में हुआ है.

उत्तर प्रदेश पुलिस जिस ने कि मुंबई प़र संभावित हमले और उस षड्यंतर में फहीम और सबाहुद्दीन के शामिल होने की खबर बहुत पहले ही मुंबई पुलिस को देने का दावा किया था अब कठघरे में खड़ी हो गयी है और उस कि छवि बुरी तरह से ख़राब हुई है. अब उस का दावा है कि कोई बात नहीं अगर फहीम और सबाहुद्दीन मुंबई मामलें में छूट भी गए हैं अब वह उन्हें रामपुर सी .आर पी. ऍफ़ कैंप पर हमले के मामले में नहीं छोड़ेगी जिस में उनके पास बहुत पुख्ता सबूत हैं. बेशक इस मामले की सत्यता के बारे में कई मानवाधिकार संगठन सवाल खड़े क़र चुके हैं. उत्तर प्रदेश पुलिस फहीम को इस आतंकी घटना का मुख्य षड्यंत्रकारी बता रही है . यह कथन काफी शरारत पूर्ण और गुमराह करने वाला है . सच्चाई यह है कि . इस मामले में फहीम पर कोई भी आरोप नहीं है ; बेशक सबाहुद्दीन का नाम चार्ज शीट में जरुर है. यह दर्शाता है पुलिस किस तरह मुसलमानों का नाम बदनाम करती है और आम जनता में नफरत और अविश्वास का माहौल बनाती है.

फहीम और सबाहुद्दीन का दोषमुक्त करार दिया जाना भारतीय मुसलमानों के लिए एक बहुत बड़ी राहत है अन्यथा इस से हिदुत्ववादियों को मुसलमानों को विदेशी साजिशकर्ताओं का साथ देने का आरोप लगाने और बदनाम कारने का एक और मौका मिल जाता. इस निर्णय ने भारतीय न्यायालय की साख को मजबूत किया है और उसमे आम आदमी के भरोसे को पक्का किया है.
एस. आर. दारापुरी आई. पी .एस. ( से. नि. )

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