मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

भाजपा : बुद्धं शरणम् गच्छामि



भाजपा : बुद्धं शरणम् गच्छामि
-एस.आर.दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट 
भाजपा जहाँ एक ओर दलितों को रिझाने के लिए डॉ. आंबेडकर को हथियाने में लगी है वहीँ अब वह बुद्ध को भी हथियाने का जुगाड़ कर रही है. इस सम्बन्ध में भाजपा ने एक “धम्म चक्र यात्रा” को सारनाथ से हाल ही में रवाना किया है जिस को राजनाथ सिंह ने हरी झंडी दिखाई थी. इस में एयर कंडीशंड बसें तथा इन्नोवा कारें लगायी गयी हैं. इस यात्रा के मुखिया राज्य सभा के पूर्व सदस्य भंते डी. धम्मवीरियो हैं जो कि काफी तिकड़मी हैं और पूर्व में लालू प्रसाद यादव के साथ थे परन्तु अब सत्ताधारी पार्टी के साथ आ गए हैं. इस यात्रा में इन के साथ 70-80 भंते भी हैं. यह यात्रा चार चरणों में उत्तर प्रदेश के लगभग 70 केन्द्रों पर जाएगी और हर जगह पर दो दिन रुकेगी. इस यात्रा के मुख्य सूत्रधार मायावती के पूर्व नजदीकी रहे सीतापुर के सांसद राजेश वर्मा हैं जो अब भाजपा में हैं.
वैसे तो भाजपा ने इस का असली राजनीतिक मकसद छुपाने के लिए इसे “धम्म चक्र यात्रा” का नाम दिया है परन्तु इस का असली काम उत्तर प्रदेश में दलितों में मोदी के आंबेडकर और बौद्ध धर्म सम्बन्धी विचारों का प्रचार प्रसार करना है. दरअसल यह भाजपा का दलित वोटरों में अपनी पैठ बनाने का ज़ोरदार प्रयास है. इसका अन्दाज़ा इस से लगाया जा सकता है कि इस तथाकथित यात्रा की मानीटरिंग प्रधान मंत्री कार्यालय द्वारा सीधे की जा रही है. इस यात्रा में लगाई गयी गाड़ियों पर मोदी के देशी तथा विदेशी बौद्ध स्थलों के दर्शन सम्बन्धी चित्र बनाये गए हैं. यात्रा के दौरान रुकने वाले प्रत्येक केंद्र को एक एक टीवी सेट दान दिया जायेगा और वहां पर एक घंटे की सीडी दिखाई जाएगी जिस में मोदी के बौद्ध धर्म और आंबेडकर सम्बन्धी विचारों का विडियो दिखाया जायेगा. यह यात्रा 14 अक्तूबर को लखनऊ में समाप्त होगी.
इस यात्रा के बारे में भाजपा के महासचिव अरुण सिंह ने अभियान के संयोजकों के साथ आठ मीटिंगें की थीं और यात्रा की मोदी ब्रांडिंग को उचित ठहराया था क्योंकि प्रधान मंत्री ने ही संसद में डॉ. आंबेडकर पर चर्चा का सुझाव दिया था और आंबेडकर नाम पर एक सिक्का भी जारी किया गया था. अतः जनता को यह बताना ज़रूरी है कि मोदी जी डॉ. आंबेडकर का कितना सम्मान करते हैं. वैसे भाजपा के बुद्ध प्रेम का अंदाज़ा इस से भी लगाया जा सकता है कि काफी वर्ष पहले जब राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री थे तो उन्होंने आंबेडकर महासभा, लखनऊ के प्रांगण में एक कार्यक्रम के दौरान यह घोषणा की थी कि वहां पर बामियान (अफ्गानिस्तान्) में तालिबान द्वारा ध्वस्त की गयी बुद्ध प्रतिमा से भी ऊँची मूर्ति लगाई जाएगी परन्तु वहां पर आज तक एक पत्थर तक नहीं लगा. अब राजनाथ सिंह ने सारनाथ में पुनः घोषणा की है कि कुशीनगर में भी 500 फुट ऊँची मूर्ति लगाई जाएगी.
यदि भाजपा राजनीतिक लाभ के लिए ही सही बुद्ध का इस्तेमाल करना चाहती है तो सबसे पहले बौद्ध साहित्य की पाली भाषा को अधिक से अधिक विद्यालयों में पढ़ाने की व्यवस्था करे और सिविल सर्विसेज़ परीक्षा में पाली साहित्य के विषय को पुनर्स्थापित करे जैसे स्मृति ईरानी आइआइटी संस्थानों में संस्कृत पढ़ाने की वकालत कर रही है. दूसरे पूरे देश में बिखरी हुई बौद्ध धरोहर की देखभाल के लिए मुसलमानों के वक्फ्बोर्ड की तरह बौद्ध-धरोहर संरक्षण बोर्ड बनाने की मांग को स्वीकार करे.   
दरअसल भाजपा ने डॉ. अम्बेदकर के नाम का दलित वोटरों को आकर्षित करने का फार्मूला दलित नेताओं मायावती, रामविलास पासवान, उदित राज, अठावले और प्रकाश आंबेडकर आदि से ही सीखा है. इन नेताओं ने डॉ. आंबेडकर की शिक्षाओं और आदर्शों को नज़रंदाज़ करके उस का इस्तेमाल केवल दलित वोट बैंक खींचने के लिए ही किया है और अब भाजपा, कांग्रेस, सपा और अन्य पार्टिया भी वही कर रही हैं. दलित नेताओं ने अगर डॉ. आंबेडकर की शिक्षाओं और आदर्शों को ईमानदारी से अपनाया होता तो आज डॉ. आंबेडकर केवल वोट बटोरने वाले पोस्टर ब्वाय बन कर नहीं रह जाते. इन सभी नेताओं ने अब तक आंबेडकर के नाम पर व्यक्तिगात स्वार्थ की राजनीति ही की है और डॉ. आंबेडकर की विचारधारा को दफनाया है.

जैसे भाजपा के लिए डॉ. आंबेडकर को पचाना आसन नहीं है उसी तरह बुद्ध की ईश्वर, आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग, नरक और वर्ण विरोधी विचारधारा आरएसएस और भाजपा के लिए आत्मसात करना आसान नहीं होगा. यह बात अलग है कि हिन्दू बुद्ध को विष्णु का नौवां अवतार मान कर उसकी पूजा भी करते हैं परन्तु उस की शिक्षाओं से डरते हैं. वैसे अम्बेडकरवादी दलित भाजपा की इस चाल को अच्छी तरह समझ रहे हैं. 
कहने को तो पिछले चुनाव में भाजपा ने विकास का नारा दिया था परन्तु इसकी आड़ में जाति, सम्प्रदाय और धर्म की राजनीति ही की थी. इसी रणनीति के अंतर्गत वह अब बुद्ध का भी हिन्दुकरण करके दलितों को गुमराह करने का प्रयास कर रही है. वैसे तो हिन्दू बुद्ध को विष्णु का नौवां अवतार घोषित करके उसे हथिया ही चुके  है. अब यह दोबारा इसी लिए संभव हो पा रहा है क्योंकि बाबासाहेब ने दलितों को बौद्ध धम्म का जो मुक्ति मार्ग दिखाया था उस पर भी वे ईमानदारी से नहीं चले हैं. उनमें से अधिकतर अभी भी हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म दोनों नावों पर पैर रखे हुए हैं. न वे अच्छे बौद्ध बने हैं और न जाति से ही पूरी तरह मुक्त हुए हैं. वे डॉ. आंबेडकर की जयकार तो करते हैं परन्तु उनकी जाति तोड़ने और हिन्दू धर्म छोड़ने की विचारधारा से दूर रहते हैं. इसी लिए भाजपा के लिए उन्हें हिन्दू धर्म की तरंग पर पटा लेना आसान हो जा रहा है.
अब यह दलितों को सोचना है कि क्या वे भाजपा को बुद्ध और डॉ. आंबेडकर का हिन्दुकरण करके उन्हें हथियाने और पचा लेने का अवसर देंगे या फिर अच्छे बौद्ध और सच्चे अम्बेडकरवादी बन कर बौद्ध धम्म और आंबेडकर की समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की विचारधारा को बचाने का प्रयास करेगे. वैसे तो भाजपा ने पहले ही दलितों की बहुत सी हिन्दू उपजातियों को हिंदुत्व की विचारधारा में लीन कर लिया है. यह दलितों के लिए परीक्षा की घडी है. देखें वे अपने बौद्ध और अम्बेडकरवादी अस्तित्व को बचा पाते हैं या फिर हिंदुत्व के गर्त में समा जायेंगे?  

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

मायावती को कन्हैया पर गुस्सा क्यों आता है?
-एस.आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
हाल में 14 अप्रैल को लखनऊ में आंबेडकर जयंती के अवसर पर सर्वजन की रैली को संबोधित करते हुए मायावती ने जेएनयू के कन्हैया कुमार पर अपना गुस्सा दिखाया और दलितों को उस से सावधान रहने के लिए कहा. उस ने कन्हैया के बारे में मुख्यतया चार बातें कहीं: (1) कन्हैया दलित नहीं भूमिहार है (2) कन्हैया अम्बेडकरवादी नहीं कम्युनिस्ट है (3) कन्हैया लाल सलाम और नीला सलाम को मिला कर दलितों को धोखा देना चाहता है तथा (4) कन्हैया जय भीम का नारा लगा कर दलितों को गुमराह करना चाहता है. इससे स्पष्ट है कि मायावती को अपने को छोड़ कर किसी अन्य द्वारा दलितों की राजनीति करने या आंबेडकर के बारे में बातचीत करने या नारा लगाने पर सख्त आपत्ति है क्योंकि वह समझती है कि दलितों की राजनीति या आंबेडकर पर उस का ही एकाधिकार है और किसी दूसरे का इस क्षेत्र में प्रवेश बिलकुल वर्जित है.
इस से यह भी स्पष्ट है कि मायावती को कम्युनिस्टों से सखत नाराज़गी और खतरा है. मायावती की कम्युनिस्टों से यह नाराज़गी उस के गुरु कांशी राम की ही देन है क्योंकि उन्हें भी कम्युनिस्टों से बहुत एलर्जी थी. वह अपनी जनसभायों में खुले तौर पर कहा करते थे कि कम्युनिस्ट आस्तीन के सांप हैं और दलितों को इन से दूर रहना चाहिए. वर्ष 1995 में मायावती के उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री बनने से पहले जब मैं एक बार कांशी राम जी से कम्युनिस्टों और दलितों के आपसी गठजोड़ के बारे में बातचीत कर रहा था तो कांशी राम जी ने कहा कि कम्युनिस्ट हमारे लड़कों को नक्सली बना कर मरवा देते हैं. मैंने जब उन से यह कहा कि जो भी नक्सली मरते हैं वे तो दलितों और किसानों की लडाई को लेकर ही मरते हैं अपने लिए नहीं. जब मैंने उन से यह पूछा कि जो नक्सली मरते हैं उन में से कितने दलित होते हैं और कितने गैर दलित? कांशी राम जी के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था. कांशी राम जी की कम्युनिस्टों के बारे में यह धारणा दरअसल दलितों के बीच डॉ. आंबेडकर के कम्युनिस्ट विरोधी होने के दुष्प्रचार पर आधारित थी जो कि बिलकुल सही नहीं है. सच्च तो यह है कि 1940 में डॉ. आंबेडकर ने कम्युनिस्टों के साथ मिल भारत की पहली सफल मजदूर हड़ताल बम्बई की काटन मिलों में की थी. बाद में तत्कालीन वामपंथियों द्वारा केवल वर्ग की बात करने और जाति को गौण स्थान देने के कारण डॉ. आंबेडकर कम्युनिस्टों से अलग हो गए थे परन्तु वे कभी भी कम्युनिस्ट विरोधी नहीं थे. वे तो रूस की क्रांति से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने 1946 में संविधान के अपने मसौदे में सारी कृषि भूमि के राष्ट्रीयकरण कौर सामूहिक खेती की वकालत की थी जब कि आज तक भी भारतीय वामपंथी इस रैडिकल मांग को उठाने का साहस नहीं कर सके.
डॉ. आंबेडकर का वामपंथियों से कुछ मतभेद मार्क्सवाद के कुछ पह्लुयों को लेकर था. एक तो उनका मत था कि राज्य का कभी भी लोप नहीं होगा जैसा कि वामपंथी सोचते हैं. दूसरे बाबा साहेब सर्वहारा के अधिनायकवाद के पक्ष में नहीं थे क्योंकि वे लोकतंत्र में विश्वास रखते थे. तीसरे वे हिंसक क्रांति के पक्षधर नहीं थे जबकि इतिहास बताता है कि क्रांतियाँ प्राय हिंसक हो जाती हैं क्योंकि शासक वर्ग का आखिरी हथियार हिंसा ही होती है जिस के लिए शोषित वर्ग को आत्मरक्षा में हिंसा करनी पड़ती है. अभी तक लगभग सभी क्रांतियाँ हिंसक ही हुयी हैं. इस के इलावा बौद्ध धम्म जिस को बाबा साहेब ने अपनाया था भी मार्क्सवाद का विरोधी नहीं है. इस से स्पष्ट है कि बाबासाहेब के मार्क्सवाद से कुछ वैचारिक मतभेद थे परन्तु वे किसी भी तरह से कम्युनिस्ट विरोधी नहीं थे. वे समाजवाद के प्रबल पक्षधर थे जो कि मार्क्सवाद का एक अभिन्न अंग है.
यह सर्विदित है की मार्क्सवाद का समाजवाद की स्थापना का मार्ग संघर्ष और जनांदोलन का रास्ता है जब कि कांशी राम केवल जोड़तोड़ की राजनीति के पक्षधर थे. उनका जनांदोलन में कोई विशवास नहीं था क्योंकि आन्दोलन का रास्ता कठिन रास्ता होता है. वर्ष 1995 में जब मैंने कांशी राम जी से जनांदोलन की आवश्यकता के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि हरेक राजनैतिक पार्टी किसी मुद्दे को ले कर जनांदोलन करती है जिस से पार्टी कार्यकर्ताओं का मुद्दे के प्रति लगाव बढ़ता है और पुलिस का डंडा खा कर वे मज़बूत हो जाते हैं और आत्मरक्षा करना भी सीख जाते हैं पर आप ने आज तक किसी भी दलित मुद्दे को लेकर कोई जनांदोलन क्यों नहीं किया है. इस पर कांशी राम जी ने मुझे जो जवाब दिया मैं उस से चकित रह गया. उन्होंने कहा कि दारापुरी जी! दलित बहुत कमज़ोर लोग हैं वे पुलिस का डंडा नहीं झेल पाएंगे. इस पर मैंने उन्हें कहा कि कांशी राम जी! मैं पुलिस वाला हूँ, मैं जानता हूँ कि जब तक दलित पुलिस का डंडा नहीं खायेंगे वे तब तक कमज़ोर ही बने रहेंगे और कभी भी अपनी आत्मरक्षा नहीं कर पायेंगे. इसी का परिणाम है कि बसपा पार्टी आज भी किसी भी मुद्दे को लेकर जनांदोलन नहीं करती और न ही दलित अपनी आत्मरक्षा कर पाते हैं क्योंकि उन्हें इस के लिए प्रशिक्षित ही नहीं किया गया. उन्होंने दलित उत्पीडन रोकने के लिए कभी कोई प्रयास भी नहीं किया. यह भी एक ऐतहासिक चमत्कार ही है कि बसपा ही ऐसी पार्टी है जो कि बिना कोई जनांदोलन किये सत्ता में आ गयी. इसी लिए मायावती को भी वामपंथियों के आन्दोलन और संघर्ष के रास्ते से डर लगता है और कन्हैया दलितों और वामपंथियों को मुक्ति आन्दोलन में एक साथ लाने की बात करता है तो उसे कन्हैया पर गुस्सा आना स्वाभाविक है क्योंकि अब तो वह दलितों को समरसता की घुट्टी पिला रही है.
मायावती जी को कन्हैया के भूमिहार हो कर आंबेडकर और दलितों की बात करने पर भी सख्त एतराज़ है क्योंकि उस का कहना है कि दलित और आंबेडकर तो मायावती की जागीर है उस पर कोई गैर दलित अधिकार जमाने का प्रयास क्यों करे. मायावती यह भूल जाती है कि अब बसपा बहुजन के हाथ से निकल कर सर्वजन के हाथ में चली गयी है और अब बसपा ने “हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु महेश है” के प्रवचन को स्वीकार कर लिया है. जब मायावती को सतीश चंद मिश्रा जैसे घोर ब्राह्मणवादी नेता को अपना सब से बड़ा विश्वास पात्र बनाने में कोई आपत्ति नहीं है तो फिर कन्हैया के भूमिहार होने पर आपत्ति क्यों है? वह कम से कम दलितों और आंबेडकर की बात तो करता है जब कि सतीश चंद मिश्रा तो ब्राह्मण सम्मान को पुनर्स्थापित करने की बात करता है. जब मायावती अपनी पार्टी के टिकट किसी भी गुंडे बदमाश, माफिया और दलित विरोधी को ऊँचे दामों में बेच कर उन्हें अपनी पार्टी में स्वीकार कर सकती है तो फिर उसे कन्हैया की जाति पर आपत्ति क्यों है? मायावती ने तो अब तक जाति और सत्ता की राजनीति ही की है जब कि बाबासाहेब तो जाति-उच्छेद और मुद्दा आधारित राजनीति के पक्षधर थे. कन्हैया कम से कम जाति से ऊपर उठ कर मुद्दों की राजनीति की बात तो करता है जो आज तक मायावती ने नहीं की है और न करेगी.
मायावती को कन्हैया के लाल सलाम और नीला सलाम को मिलाने और जय भीम कहने पर भी आपत्ति है. उसे डर है कि इससे दलित उस के हाथ से निकल कर वामपंथियों से न जा मिलें. मायावती को शायद मालूम नहीं है कि 1962 और 1967 में जब उत्तर प्रदेश में डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित पार्टी रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया (आरपीआई) अपने शिखर पर थी तो उस समय डॉ. छेदी लाल जी ने कम्युनिस्टों और मुसलामानों के साथ हाथ मिलाया था. उस समय कहा जाता था कि उत्तर प्रदेश में नीली टोपी और लाल झंडा एक हो गए हैं. यह सर्वविदित है कि भारत के कम्युनिस्टों द्वारा वर्ग के चक्कर में जाति को महत्त्व न देने की बहुत बड़ी भूल की गयी जिस कारण जन्मजात सर्वहारा दलित वर्ग उन के साथ उतनी संख्या में नहीं जुड़ सका. परन्तु इधर कम्युनिस्टों ने अपनी इस ऐतहासिक भूल को सुधारा है ख़ास करके सीपीआई(एम) और सीपीआई (एम-एल) गुटों ने. इतिहास यह भी दर्शाता है कि कम्युनिस्ट कभी भी दलित विरोधी नहीं रहे हैं और न हैं. वैसे भी दलितों के कुदरती दोस्त कम्युनिस्ट ही हो सकते हैं जो मजदूर और किसान की मुक्ति की लडाई की बात करते हैं कोई दूसरा नहीं. ऐसी परिस्थिति में दलितों और कम्युनिस्टों को हाथ मिलाने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. इस में कन्हैया और उस के साथियों की भूमिका बहुत सहायक हो सकती है जो अम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद की मिलीजुली विचारधारा को लेकर चलने का प्रयास कर रहे हैं.
इधर कम्युनिस्टों ने डॉ. आंबेडकर के जाति उन्मूलन कार्यक्रम को भी काफी हद तक स्वीकार किया है. वर्तमान में दलित उत्पीड़न के मामलों में कम्युनिस्ट ही आगे आ रहे हैं मायावती, पासवान, उदित राज या अठावले नहीं, चाहे वह तमिलनाडु हो या हरियाणा हो. कांशी राम और मायावती ने तो दलित उत्पीड़न पर कभी मुंह ही नहीं खोला. कांशी राम का तो कहना था कि जितना दलित उत्पीड़न बढ़ेगा उतना ही हमारा वोट बैंक बढ़ेगा. यह भी सर्विदित है कि वर्तमान कारपोरेट परस्त राजनीति के विरोध में कम्युनिस्ट और दलित ही खड़े हो सकते हैं, भाजपा, कांग्रेस, बसपा और सपा नहीं क्योंकि इन सब की राजनीति और पॉलिसी कारपोरेट परस्त ही है. इन में केवल नाम का अंतर है नीति और कार्यक्रम में कोई अंतर नहीं. इसी लिए तो उत्तर प्रदेश में मायावती के चार बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद भी दलितों की हालत में कोई अंतर नहीं आया है जैसा कि विकास के मापदंडों सम्बन्धी आंकड़ों से स्पष्ट है. मायावती ने तो दलित राजनीति को उन्हीं गुंडे, बदमाशों और मफियायों के हाथों बेच दिया जिन से उनकी लड़ाई थी.
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मायावती का कन्हैया पर गुस्सा आंबेडकर और दलितों के नाम पर चलाई जा रही जातिवादी, अवसरवादी, भ्रष्ट, स्वार्थी, कारपोरेट परस्त और लम्पट राजनीति के लिए खड़े होने वाले खतरे को लेकर है. मायावती अभी भी यह भ्रम पाले हुए है कि दलितों का बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी उसके प्रभाव में है परन्तु पिछले दो चुनाव इस के विपरीत इशारा करते हैं. दलितों के चमार/जाटव समुदाय को छोड़ कर शेष सभी छोटी उपजातियों का बड़ा हिस्सा भाजपा, सपा तथा कांग्रेस के साथ जा चुका है. अब इन्हें कन्हैया पर गुस्सा दिखा कर नहीं बल्कि डॉ. आंबेडकर की जाति उच्छेद और मुद्दा आधारित कारपोरेट विरोधी राजनीति और नीतियाँ अपना कर ही वापस जीता जा सकता है. परन्तु वर्तमान दलित राजनेताओं से इस की उम्मीद नहीं की जा सकती है क्योंकि वे भी वर्तमान कारपोरेट परस्त मुख्य धारा की राजनीति के ही पोषक हैं. अतः वर्तमान दलित राजनीति को एक रैडिकल वैकल्पिक राजनीति की ज़रुरत है जिस की पूर्ती के लिए आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट की स्थापना की गयी है.

रविवार, 17 अप्रैल 2016

आंबेडकर के नाम पर



आंबेडकर के नाम पर
- आनंद तेल्तुम्बडे,   (अनुवादक : एस.आर. दारापुरी)
इधर डॉ. आंबेडकर के स्मारकों की बाढ़ सी आ गयी है. आज कल  संघ परिवार डॉ. आंबेडकर जिन्होंने हिन्दू धर्म पर इतनी तीखी टिप्पणियाँ की थी जिस कारण उन्हें अपना कट्टर दुश्मन मानना चाहिए, को हथियाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहा है. उसी समय  दलितों और गैर दलितों में दूरी बढ़ती जा रही है और उन पर निर्बाध अत्याचार हो रहे हैं.
अब इंग्लैंड में बाबा साहेब के नाम पर लन्दन में एक स्मारक होगा. बाबा साहेब 1920 के शुरू में इस घर में रहे थे जब वे लन्दन स्कूल आफ इकोनामिक्स में पढ़ रहे थे. अगस्त के तीसरे हफ्ते में नौकरशाही का घपला तब उजागर हुआ जब उक्त मकान मालिक ने एक रोषभरी चेतावनी दे डाली. यह शेखी बघारने वाले मंत्री के लिए काफी था क्योंकि उन्होंने कई माह पहले उक्त मकान को खरीद लिए जाने की घोषणा कर दी थी. इस चेतावनी के बाद चीजें तेज़ी से चलने लगीं और उम्मीद है कि उस 2050 वर्ग फीट मकान का सौदा 3.1 लाख पौंड में जल्दी तै हो जायेगा. ( नोट: अब उक्त मकान खरीद लिया गया है.) भारत में मोदी जी ने जनपथ, नयी दिल्ली पर एक अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर का नींव पत्थर रख दिया है. दूसरा मेमोरियल सेंटर 26 अलीपुर रोड, पुरानी दिल्ली जहाँ पर डॉ. आंबेडकर जब संविधान सम्मति के अध्यक्ष थे  वहां  पर रहे थे, पर बनाया जायेगा. मेमोरियल ऐसा बनेगा जो ऊपर से हवाई जहाज़ से देखने वालों को भी रोमांचित कर देगा. एक दूसरा मेमोरियल महू (मध्य प्रदेश) जहाँ डॉ. आंबेडकर पैदा हुए थे जब उन के पिता जी अंग्रेजी फ़ौज में नौकरी कर रहे थे. मुम्बई में भी एक बहुत भव्य स्मारक इंदु मिल्स की ज़मीन पर बनेगा. यहाँ पर 6 दिसंबर, 2011 को रिपब्लिकन सेना ने ग्राउंड पर कब्ज़ा करके एक चलतु स्मारक बना दिया था जिससे आंबेडकर भक्ति दिखाने की एक होड़ सी लग गयी थी. भारत सरकार के समाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री श्री थावर चाँद गहलोत पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि डॉ. आंबेडकर से जुड़े सभी स्थलों का विकास करने का मोदी सरकार पहले ही निर्णय ले चुकी है. अतः यदि बॉन (जर्मनी) में नहीं तो न्यूयार्क या ऐसे सभी स्थल, अगर वे खोजे जा सकें,   जहाँ जहाँ पर डॉ. आंबेडकर महाराजा बड़ोदा द्वारा दिए गए छोटे से वजीफे से रहे थे, स्मारक बनाया जा सकता है. स्मारकों से आगे बढ़ कर मोदी सरकार ने डॉ. आंबेडकर की 125वीं जयंती पूरे वर्ष भर मनाने की घोषणा की है जिस से उत्तेजित होकर भाजपा की विरोधी कांग्रेस ने महू में एक बड़ी रैल्ली तथा डॉ. आंबेडकर की ग्रैजुएशन की शताब्दी पूरा होने के उपलक्ष्य में कोलंबिया विश्विद्यालय में दलित बुद्धिजीविओं की कांफ्रेंस करने की घोषणा की है. “तीन रामजिन्होंने चुनाव के दौरान भाजपा को दलितों के वोट दिलाये इस बात का श्रेय ले सकते हैं. सचमुच में आंबेडकर के अनुयायी इस से ज्यादा और क्या मांग सकते थे? इन सब परिघटनाओं को देख कर अगर कोई दुखी होते तो वह स्वयम आंबेडकर ही होते. बड़े दुःख की बात है कि डॉ. आंबेडकर को मानने वाले जो पहचान के अहम्  में चूर हैं कभी भी शासक वर्गों की उन्हें अपने यथार्थ के प्रति अँधा बना देने की चाल को नहीं समझेंगे. ( लेनिन के शब्दों में यह भाजपा का आंबेडकर के प्रति कोई हृदय परिवर्तन नहीं है बल्कि दलितों के ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष की धार को कुंद करने की सोची समझी चाल है काश! दलित इसे समझ सकें )  
डॉ. आंबेडकर के स्मारकों के पीछे का रहस्य क्या है? इस में कोई शक नहीं है कि डॉ. आंबेडकर  बहुत सारे स्मारक बनाये जाने के हक्कदार हैं जबकि डॉ. आंबेडकर स्वयं नायक पूजा के खिलाफ थे. स्मारक लोगों की कृतिज्ञता के प्रतीक होते हैं और आगे आने वाली नस्लों के लिए प्रकाश स्तम्भ और ऐसे लोगों का अनुसरण करने की प्रेरणा देते हैं जिन्होंने दूसरों के लिए काम किया. कम्युनिस्ट भी जो कि मनुष्य को ही इतिहास का रचियता मानते हैं,  ने भी अपने नायकों के स्मारक बनाये हैं. डॉ. आंबेडकर के मामले में भी उनके परिनिर्वाण के बाद उन के अनुयायियों ने थोडा थोडा चंदा इकठ्ठा करके दादर चौपाटी, मुम्बई में जहाँ पर उनका दाह संस्कार किया गया था एक स्मारक बनाया था. उस स्थान पर बनायी गयी इमारत बौद्ध स्तूप का प्रतिरूप  है जो उनके जाति विनाश के जीवन भर के संघर्ष का प्रतीक है और उसे चैत्य भूमि का नाम दिया गया है. यह छोटी सी इमारत भारत के कोने कोने से लोगों की भीड़ को आकर्षित करती है. 6 दिसंबर को उनके परिनिर्वाण दिवस पर 2 लाख से भी ज्यादा लोग वहां पर श्रद्धांजली देने के लिए आते है. काफी समय तक इस के इलावा डॉ. आंबेडकर का कोई स्मारक नहीं था. जब इस के लिए दलित संघर्ष कर रहे थे तो किसी भी राजनीतिक पार्टी या सरकार ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया. यह 1960 के दशक के मध्य के बाद ही हुआ है जब  मध्य जातियों द्वारा क्षेत्रीय पार्टियाँ बनाने के कारण राजनीति अधिक स्पर्धात्मक हो गयी और राजनीतिक पार्टियों ने दलित वोटों को बटोरने में डॉ. आंबेडकर के प्रतीक की ताकत को पहचाना. हमारे चुनाव में सब से अधिक वोट पाने वाले की जीत की पद्धति ने छोटे छोटे वोट बैंक को भी बहुत महत्पूरण बना दिया है. लोकसभा की 84 अरक्षित सीटों तथा राज्य एसेमब्लियों तथा स्थानीय निकायों में आरक्षित सीटों और दूसरों की अपेक्षा अधिक संगठित होने के कारण सभी पार्टियों द्वारा पटाने के लिए दलित बहुत सस्ता निशाना बन गए हैं.
इस प्रकार का नजरिया अपनाने वाली कांग्रेस पहली पार्टी थी जिस ने 1965 में सहयोजन करने की रणनीति अपनाई. आंबेडकर का मूर्तिकरण इस रणनीति का हिस्सा बनी. अचानक शहरों में डॉ. आंबेडकर की मूर्तियाँ और सड़कों के नाम डॉ. आंबेडकर के नाम पर रखे जाने लगे. तब तक भी डॉ. आंबेडकर का कोई स्मारक नहीं था. चैत्य भूमि के बाद डॉ. आंबेडकर के स्मारक के रूप में सब से महत्वपूर्ण परेल के दबाक चाल में वे दो कमरे होने चाहिए थे जिन में वे 1931 तक रहे थे और राजगृह जो उनका घर था जिस में उन का पुस्तकालय भी था जिसे 1942 में दिल्ली से बम्बई लाया गया था. पहले वाले को तो भुला ही दिया गया है परन्तु राजगृह को स्मारक बनाया जाना चाहिए था. परन्तु यह महाराष्ट्र की राजनीति के मक्कडजाल  में फंस कर रह गया और उपेक्षा का शिकार हो रहा है जब कि इसे देखने के लिए हर रोज़ दलित आते हैं. एक दिन यह महत्वपूर्ण स्मारक जनता के लिए ओझिल हो जायेगा. भाजपा के सत्तारूढ़ होने के बाद डॉ. आंबेडकर को हथियाने की प्रतियोगिता तेज हो गयी है और स्मारकों के लिए हंगामा इसी नाटक की अभिव्यक्ति है.
स्मारक बनाओ, मिशन दफनाओ. स्मारक तभी अर्थपूर्ण हैं जब कि व्यक्ति के मिशन का भी आदर किया जाये और उसे आगे बढ़ाया जाये. आंबेडकर का मिशन था जाति का विनाश ताकि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व  पर आधारित समाज का निर्माण किया जा सके. परन्तु  डॉ. आंबेडकर के प्रति प्रेम के अनुपात में ही उन के सपनों का तिरस्कार भी है. जाति को छोडिये संविधान द्वारा निषिद्ध की गयी छुआछूत आज भी बुरी तरह व्याप्त है.  21वीं सदी के शुरू में किये गए तीन बड़े सर्वे- 11 राज्यों के 565 गाँव का एक्शन एड सर्वे (2001-02), नवसृजन का गुजरात के 1,589 गाँव का सर्वे (2007-10) और हाल में नैशनल काउन्सिल आफ एप्लाईड रिसर्च रिपोर्ट 2014 छुआछूत की हिला देने वाली घटनाएँ दर्शाती हैं. छुआछूत जातियों का एक पहलु है. जाति के जीवित रहते छुआछूत कभी भी समाप्त नहीं हो सकती.   डॉ. आंबेडकर का स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व  का आदर्श  हजरों प्रकाश वर्ष दूर है और हर दिन गुजरने के साथ साथ दूर होता जा रहा है. स्वतंत्रता  तो अधिकतर लोगों के लिए, जो रोटी कमाने की चिंताओं में डूबे हैं और राज्य ने मजबूती से उन की आवाज़ को दबा दिया है, के लिए  एक  कल्पना बन कर रह गयी है . आम लोगों की बातचीत में भी समानता की चर्चा नहीं होती  बल्कि इस की जगह विश्व बैंक की समावेशी और आर.एस.एस. की समरसता ने ले ली है. आज भारत की दुनिया के असमान  समाज वाले देशों में गिनती होती है. जाति आधारित समाज में भाईचारा का होना तो स्वाभाविक ही नहीं है ख़ास करके 1991 के  बाद के जातिवादी भारत में.  दलितों  की हालत जिन के लिए डॉ. आंबेडकर ने आजीवन काम किया से स्मारकों से प्रेम करने वालों के दलित प्रेम का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.  विकास का कोई ऐसा पैमाना नहीं है जिस से दलितों और गैर दलितों (जिन में मुसलमान भी शामिल हैं और जिन की हालत कुछ मायनों में दलितों से भी बुरी है) का महत्त्व नहीं है. कोई भी पैमाना लीजिये- गरीबी, शहरीकरण, मृत्यु दर, पेशेवार वितरण,  कुपोषण , शारीरक वजन, विभिन्न स्तरों पर शिक्षा में प्रवेश, स्कूल छोड़ने की दर,  विभिन्न जन सुविधाओं तक पहुँच में दलित जातियां गैर दलित जातियों से बहुत पीछे हैं. सब से अधिक चिंता की बात है कि आज़ादी के बाद के चार दशकों में यह दूरी बहुत धीमी गति से कम हो रही है.
परन्तु नव उदारवादी सुधारों को लागू करने के बाद इन के बीच दूरी तेज़ी से बढ़ी है. इन नीतियों का दलितों पर बहुत बुरा असर हुआ है और वे हरेक क्षेत्र में हाशिये पर चले गए हैं. यदि अत्याचारों में बढ़ोतरी को जाति चेतना के उभार का परिणाम भी मान लिया जाये तो भी इस निष्कर्ष से नहीं बचा जा सकता कि इस में पिछले अढाई दशक के नव उदारवाद के दौरान अप्रत्याशित वृद्धि हुयी है. हरेक वर्ष दलितों के विरुद्ध अत्याचार के 40,000 हज़ार केस दर्ज होते हैं. अत्याचार करने वालों: किल्वेल्मानी (1968) जिस में 44 दलित औरतें और बच्चे मरे थे, आन्ध्र प्रदेश के कर्मचेडू (1985) और चुन्दुरु (1991)  दलित जनसंहार और 1996 में बिहार के बिठानी टोला जहाँ 21 दलित और 1997 में लक्ष्मनपुर बाठे जिस में 61 लोग  मारे गए  थे, 2000 में मियांपुर जहाँ 32 लोग, नागरी बाज़ार जहाँ 1998 में 10 लोग और 1999 में शंकर बीघा जहाँ 22 दलित मारे गए थे,  के अदालत से  लगातार छूट जाने से यह स्थापित हो गया है कि जातिवादी अपराधियों को दलितों के विरुद्ध राज्य का सहारा मिल रहा है.
यह देखना दिलचस्प है कि एक तरफ संघ परिवार और भाजपा सरकार डॉ. आंबेडकर का गुणगान कर रहे हैं और दूसरी तरफ वे लोग डॉ. आंबेडकर की धर्म निरपेक्षता की धरोहर को बिगाड़ रहे हैं.  हिन्दू धर्म और हिंदुत्व पर कडवी टिप्पणियों के कारण संघ परिवार के लिए डॉ. आंबेडकर सब से बड़े दुश्मन होने चाहिए. परन्तु दुःख इस बात का है कि अम्बेडकरी विचारधारा से दलितों के विचलित होने ने उन के लिए इसे खतरे की जगह एक स्वर्णिम अवसर बन गया है. उन्होंने उसे (आंबेडकर) को अपने  लिए प्रातः स्मरणीय बना लिया है.  अपने देवगणों में शामिल करके वे धीरे धीरे परन्तु नियोजित ढंग से डॉ. आंबेडकर को विकृत कर रहे हैं. आंबेडकर के जीवन की कुछ छोटी छोटी  बातों के गिर्द झूठ का जाला बुन कर वे बहुत जोर शोर से एक भगवा डॉ. आंबेडकर का प्रचार कर रहे हैं. इस आंबेडकर को बहुत बेशर्मी से घर वापसी का पक्षधर दिखाया जा रहा है. वे हिन्दुओं के सब से बड़े हितैषी दिखाए जा रहे हैं. क्योंकि उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया है जो कि हिन्दू धर्म का ही एक पंथ है. कितना बड़ा झूठ है यह! वे मुसलामानों के विरोधी थे.  वे हेडगेवार और विषैली विचारधारा के प्रवर्तक गुरु गोवलकर के मित्र थे.  वे संघ के प्रशंसक थे आदि आदि.  यह सही है कि हेडगेवार, गोलवलकर और सावरकर एवं राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ के लोग  डॉ. आंबेडकर से मिले थे  परन्तु डॉ. आंबेडकर उनसे नहीं. परन्तु इस का यह अर्थ नहीं कि वे उनके मित्र थे.  उन्होंने कभी भी उनकी विचारधारा की प्रशंसा नहीं की थी. यह सही है कि बी एस मुंजे और उन के साथी उन से बम्बई एअरपोर्ट पर मिले थे जब वह राष्ट्रीय झंडा समिति के सदस्य थे और उन्होंने उन्हें एक भगवा झंडा इस अनुरोध के साथ दिया था कि इसे राष्ट्रीय  झंडा बनाया जाये. क्या इस का यह मतलब है कि डॉ. आंबेडकर उनकी मांग का समर्थन करते थे? क्या इस का यह अभिप्राय है कि उन्होंने संस्कृत को राष्ट्र भाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था? वे अपने छोटे साम्प्रदायिक कद के अनुसार डॉ. आंबेडकर को भी बौना बनाने में लगे हैं. इस प्रकार का अपनाव डॉ. आंबेडकर का सीधा अपमान है. परन्तु खेद का विषय है कि स्मारकों के नशे में चूर अम्बेडकरवादी इसे नहीं देख पा रहे हैं.