शुक्रवार, 27 मई 2016

बौद्धों की जनसँख्या वृद्धि दर में भारी गिरावट: एक चिंता का विषय



बौद्धों की जनसँख्या वृद्धि दर में भारी गिरावट: एक चिता का विषय  
एस.आर. दारापुरी, आई.पी.एस. (से.नि.) एवं संयोजक उत्तर प्रदेश जनमंच
2011 की जनगणना के अनुसार देश में  बौद्धों की जनसख्या  वृद्धि दर में भारी गिरावट सभी आंबेडकरवादियों के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए क्योंकि बाबासाहेब ने दलितों की मुक्ति के लिए बौद्ध धम्म को एक कारगर हथियार के रूप में अपनाया था. इस के पीछे उनका मुख्य उद्देश्य दलितों को हिन्दू धर्म की नारकीय जाति व्यवस्था से मुक्त करके उन्हें बौद्ध धम्म की जातिविहीन सामाजिक व्यवस्था में स्थापित करना था. यह केवल धर्म परिवर्तन ही नहीं बल्कि दलितों की आर्थिक और मानसिक मुक्ति का भी मार्ग है.
बाबासाहेब ने 14 अक्तूबर, 1956 को पांच लाख दलितों सहित हिन्दू धर्म का त्याग करके समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित बौद्ध धम्म को अपनाया था. इस के माध्यम से उनका एक मुख्य उद्देश्य दलितों का हिन्दुओं के रूप में उपजाति विभाजन ख़त्म करके उन्हें बौद्धों के रूप में एकल पहचान देकर संगठित करना भी था. यह आशा की जाती थी कि बाबासाहेब द्वारा चलाया गया बौद्ध धम्म आन्दोलन तेज़ी से आगे  बढ़ेगा और अधिक से अधिक दलित हिन्दू धर्म द्वारा स्थापित नारकीय जाति व्यवस्था से मुक्त हो जायेंगे. इस कार्य को आगे बढाने के लिए उन्होंने भारतीय बौद्ध महासभा की स्थापना भी की थी. उनके जीवित रहते देश के कई राज्यों में धर्म परिवर्तन के कई  कार्यक्रम आयोजित हुए थे और  दलितों ने भारी संख्या में हिन्दू धर्म त्याग कर बौद्ध धम्म अपनाया था.
यह पाया गया है कि जिन दलितों ने हिन्दू धर्म त्याग कर बौद्ध धम्म अपनाया है उन्होंने हिन्दू दलितों की अपेक्षा अधिक प्रगति की है जैसा कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों से स्पष्ट है. इन आंकड़ों के अनुसार बौद्ध पुरुष और महिलाओं का लैंगिक अनुपात 965 है जब कि हिन्दुओं का 939, मुसलामानों का 951 और सिक्खों  का 903 है. इसी प्रकार 0-6 वर्ष आयु के बौद्ध लड़के व् लड़कियों का लैंगिक अनुपात 933 है जबकि हिन्दुओं का 913, मुसलामानों का 943 और सिखों का केवल 828 है.  इसी जनगणना के अनुसार बौद्धों का शिक्षा दर 81.3% है जबकि हिन्दुओं का 73.3% और मुसलामानों का 68.5%है.  इसी प्रकार बौद्धों का कार्य सहभागिता दर 43.1% है जब कि हिन्दुओं का 41% और मुसलामानों का 32.6% और सिखों का 36.3% है. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बौद्धों का लिंग अनुपात, शिक्षा दर और कार्य सहभागिता दर न केवल हिन्दू दलितों बल्कि हिन्दुओ, मुसलामानों और सिखों से भी ऊँचा है जो कि उन की प्रगति का प्रतीक है.
उप्रोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है हिन्दुओं से बौद्ध बने दलितों पर धर्म परिवर्तन का बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा है जिस के फलस्वरूप उन्होंने न केवल हिन्दू दलितों बल्कि हिन्दुओ, मुसलामानों और सिखों के मुकाबले अधिक प्रगति की है.  इस से उनके जीवन में गुणात्मक परिवर्तन आया है. उन्होंने पुराने पेशे छोड़ कर नए पेशे अपनाये हैं. उनका आर्थिक स्तर ऊँचा हुआ है और उनके पारिवारिक जीवन स्तर में सुधार हुआ है. अतः यह आशा की जाती थी कि इस गुणात्मक परिवर्तन से प्रभावित हो कर अधिक से अधिक दलित बौद्ध धम्म की ओर आकर्षित होंगे और उनकी जनसँख्या में तेज़ी से वृद्धि होगी. परन्तु 2011 की जनगणना के आंकड़े इस के विपरीत स्थिति को दर्शाते हैं.  
2001 की जनगणना के अनुसार भारत में बौद्धों की जनसँख्या लगभग 80 लाख थी जो कि 2011 में बढ़ कर 84.43 लाख हुयी है  परन्तु इसी अवधि में बौद्धों की जनसंख्या बढ़ोतरी  दर 23.2% से घट कर 6.1% हो गयी है अर्थात इस में 17% की गिरावट आई है. इसी प्रकार 2001 में बौद्धों की आबादी देश की कुल आबादी का 0.8% थी जो कि 2011 में 0.7 रह गयी है. इस से स्पष्ट है कि 2001 से  2011 के दशक में  बौद्धों का वृद्धि दर बहुत नीचे गिर गया है जिस के कारण इस दशक में बौद्धों की कुल आबादी में केवल 4.4 लाख की ही वृद्धि हुई है. यह सभी आंबेडकरवादियों के लिए चिंता की बात होनी चाहिए. इस से यह भी लगता है बाबासाहेब का धम्म कारवां आगे बढ़ने की बजाये पीछे जा रहा है.
2011 की जनगणना से यह बात भी उभर कर आई है कि पिछले दशक में जम्मू कश्मीर, पंजाब, दिल्ली, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में बौद्धों की आबादी में भारी गिरावट आई है. उत्तर प्रदेश में 2001 में यह आबादी 3.02 लाख से घट कर  2011 में  2..06 लाख रह गयी है. यह ज्ञातव्य है उत्तर प्रदेश में इस दौरान तीन बार मायावती मुख्य मंत्री रही है और दावा किया जाता है कि उसने बौद्ध के प्रचार के लिए काफी कुछ किया है.  इसी प्रकार पंजाब में इस अवधि में यह आबादी 41,487 से कम होकर 33,237 रह गयी है. इस दौर में कर्नाटक में यह आबादी 3.93 लाख से कम हो कर 95,710 हो गयी है. दिल्ली में यह 23,705 से कम हो कर 18,449 रह गयी है. इस दौरान यद्यपि महाराष्ट्र और कुछ अन्य राज्यों में बौद्धों की आबादी में वृद्धि हुयी है परन्तु कुल आबादी तथा वृद्धि दर में गिरावट आना गंभीर चिंता का विषय है.
 उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि 2001 से 2011 के दशक के दौरान भारत में बौद्धों  की आबादी की वृद्धि दर न केवल कम हुयी है बल्कि कुछ राज्यों में बौद्धों की आबादी में भारी कमी भी हुयी है. यह गिरावट अपेक्षा के बिलकुल विपरीत है. आशा तो यह की जाती थी कि दलितों में निरंतर बढ़ रही जागृति के सापेक्ष इस में आशातीत वृदि होगी परन्तु जनगणना  के आंकड़े बिलकुल निराशाजनक तस्वीर पेश करते हैं. इस से लगता है कि बाबासाहेब का बौद्ध धम्म का कारवां  आगे बढ़ने की बजाये पीछे चला गया है. अतः ऐसी स्थिति में इस गतिरोध के कारणों का गहराई से विवेचन करने की आवश्यकता है. इस गतिरोध के कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित हो सकते हैं:-
 यह सर्वविदित है कि जनगणना के  दौरान काफी धांधली की जाती है क्योंकि जनगणना के कार्य में लगाये गए अधिकतर कर्मचारी हिन्दू होते हैं जो कि हिन्दुओं की जनसँख्या अधिक दिखाने के इरादे से बौद्धों की जनसँख्या कम करके दिखाते हैं और उन्हें हिन्दुओं की श्रेणी में रख देते हैं. जनगणना के दौरान यह देखा गया था कि अधिकतर कर्मचारी जनगणना का फार्म दिशा निर्देशों के विपरीत पेन्सिल से भर रहे  थे जिस से उनमें गड़बड़ी करना आसान हो जाता है. इस प्रकार की बेईमानी कोई पहली बार नहीं की गयी है बल्कि यह हरेक जनगणना में होती आई है.
बौद्धों की जनसँख्या में वृद्धि दर की कमी का एक कारण यह भी है कि बाबासाहेब के चले जाने के बाद जो स्वार्थी, अवसरवादी और सिद्धान्तहीन लम्पट दलित राजनीति उभरी है उसने बाबासाहेब के सामाजिक और धार्मिक आन्दोलन को बहुत पीछे धकेल दिया है. बाबासाहेब के आन्दोलन के दो मुख्य लक्ष्य थे: एक जातिविनाश और दूसरा  पूँजीवाद के खिलाफ लड़ाई. परन्तु दलित राजनीति ने इन दोनों को नकार कर जाति और सत्ता की राजनीति को अपना कर  बाबासाहेब की विचारधारा और आदर्शों के साथ जो खिलवाड़ किया है उस का दुष्प्रभाव बाबासाहेब के सामाजिक और धार्मिक आन्दोलन पर स्पष्ट दिखाई दे रहा है. यह बात सही है कि बाबासाहेब ने राजनीतिक सत्ता को सभी समस्यायों की चाबी बताया था परन्तु उन्होंने आगे यह भी कहा था कि राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल समाज के विकास के लिए किया जाना चाहिए परन्तु अधिकतर दलित नेताओं ने इस का इस्तेमाल अपने विकास के लिए ही किया है. बाबासाहेब ने यह भी कहा था कि केवल चुनाव जीतना ही राजनीतिक पार्टी का ध्येय नहीं होता है बल्कि उस का मुख्य काम जनता को राजनीतिक तौर पर शिक्षित करना होता है. परन्तु दलित नेताओं ने किसी भी तरह से चुनाव जीतने को ही अपना मुख्य लक्ष्य बनाया और  जाति की राजनीति करके दलितों की जाति भावनाओं का शोषण किया है. इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि अवसरवादी और सिद्धान्तहीन राजनीति ने सामाजिक और धार्मिक आन्दोलन को बहुत पीछे धकेल दिया है.
बौद्ध आन्दोलन के प्रति आम दलितों में दिलचस्पी में कमी का एक कारण यह भी है कि जो दलित बौद्ध बने हैं वे भी उतने अच्छे बौद्ध नहीं बने हैं जो कि दूसरों के लिए अनुकरणीय बन सकते थे. उनमें से अधिकतर ने कहने के लिए धर्म परिवर्तन कर तो लिया है परन्तु न तो वे जाति से मुक्त हुए हैं न ही उन्होंने बौद्ध धम्म को पूरी तरह से अपनाया ही है. इससे शेष दलितों में बौद्ध धम्म के प्रति आकर्षण पैदा होने की बजाये उदासीनता पैदा हुयी है जिस का असर बौद्ध आन्दोलन पर पड़ा है. अतः यह ज़िम्मेदारी धर्म परिवर्तित दलितों की थी कि वे अच्छे बौद्ध बन कर शेष दलितों के लिए प्रेरणा श्रोत बनते परन्तु वे इस ज़िम्मेदारी को निभाने में विफल रहे हैं.
डॉ. आंबेडकर के बाद बौद्ध आन्दोलन को चलाने के लिए एक सुनियोजित अभियान की आवश्यकता थी परन्तु उन द्वारा स्थापित भारतीय बौद्ध महासभा भी इस भूमिका को प्रभावी ढंग से  निभाने में विफल रही. इसके विपरीत आर.एस.एस. ने दलितों के हिन्दुकरण की प्रक्रिया को बहुत नियोजित ढंग से चलाया है. उन्होंने दलितों की छोटी उपजातियों को अपने प्रभाव में लेकर उनका हिन्दुकरण कर लिया है और उन्हें दलितों की बड़ी उपजातियों से अलगाव में डाल दिया है. यह सर्वविदित है कि दलित समाज पहले ही उपजाति विभाजन के कारण बुरी तरह से बिखरा हुआ था और वे अधिकतर हिन्दू धर्म के प्रभाव में थे.  डॉ. आंबेडकर के प्रभाव में  दलितों के अंदर  अहिन्दुकरण की एक धारा चली थी और कुछ लोगों ने उस से प्रभावित होकर हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धम्म को अपनाया है. परन्तु इस के मुकाबले में दलितों के हिन्दुकरण की धारा को आर.एस.एस ने पकड़ कर दलितों की छोटी उपजातियों को दलितों की बड़ी उपजातियों के खिलाफ बरगला कर और  अलगाव में डाल कर उन्हें कट्टर हिन्दू बना कर हिंदुत्व की छत्रछाया में ले लिया है. यह विभाजन न केवल समाजिक और धार्मिक है बल्कि राजनैतिक भी है  जो कि पिछले चुनाव में पूरी तरह से उभर कर सामने आया है.

अतः उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि विभिन्न कारणों से बाबासाहेब का सामाजिक और धार्मिक आन्दोलन आगे बढ़ने की बजाये पीछे को जाता दिखाई दे रहा है. पिछली जनगणना ने इस गतिरोध को बिलकुल स्पष्ट कर दिया है. इस दशक में न केवल बौद्ध जनसँख्या की वृद्धि दर में ही गिरावट आई है बल्कि कई राज्यों में बौद्ध जनसँख्या में भी भारी कमी भी आई है. अतः यह अति आवश्यक है कि इस गिरावट के आन्तरिक और बाहरी कारणों को ईमानदारी से चिन्हित किया जाये और उन्हें दूर करने हेतु गंभीर प्रयास किये जाएँ. वर्तमान अवसरवादी, स्वार्थी और सिद्धान्तहीन  राजनीति के स्थान पर एक रैडिकल राजनीतिक विकल्प की तलाश की जाये. इसके साथ ही बाबासाहेब के जाति विनाश और पूँजीवाद विरोधी आन्दोलन को भी तेज किया जाए ताकि दलितों के आंतरिक जातिभेद को नष्ट करके उन्हें हिंदुत्व के बढ़ते खतरे के विरुद्ध लड़ने के लिए एकताबद्ध किया जा सके. इसके साथ ही उनके हिन्दू धर्म से मुक्त होकर बौद्ध धम्म अपनाने के अभियान को भी सुनियोजित ढंग से चलाया जाये ताकि बाबासाहेब के भारत को बौद्ध्मय बनाने के सपने को साकार किया जा सके.   

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