राज्य समाजवाद बनाम नवउदारवाद: भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था का एक आंबेडकरवादी विश्लेषण
एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट
प्रस्तावना
भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था का विकास एक गहरे अंतर्विरोध को दर्शाता है—एक ओर संविधान में निहित सामाजिक न्याय, समानता और गरिमा के आदर्श, और दूसरी ओर 1990 के दशक के बाद से बढ़ती हुई बाजार-प्रधान नीतियाँ। B. R. Ambedkar का बौद्धिक योगदान इस अंतर्विरोध को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यद्यपि उन्हें प्रायः संविधान-निर्माता और जाति-विरोधी चिंतक के रूप में देखा जाता है, उनकी आर्थिक दृष्टि—विशेषकर राज्य समाजवाद की अवधारणा—अभी भी अपेक्षाकृत कम चर्चा में रही है।
आंबेडकर ने States and Minorities (1947) में आर्थिक लोकतंत्र की एक व्यापक परिकल्पना प्रस्तुत की, जिसमें राज्य की सक्रिय भूमिका, उत्पादन के साधनों पर सार्वजनिक स्वामित्व तथा संसाधनों का न्यायपूर्ण पुनर्वितरण शामिल था। इसके विपरीत, 1991 Economic Liberalisation in India के बाद भारत ने नवउदारवादी नीतियों को अपनाया, जिनमें उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण को प्राथमिकता दी गई।
यह निबंध तर्क प्रस्तुत करता है कि भारत में नवउदारवाद, आंबेडकर की सामाजिक-आर्थिक मुक्ति की परियोजना से एक महत्वपूर्ण विचलन का प्रतिनिधित्व करता है। बाजार-प्रधान विकास मॉडल ने न केवल असमानताओं को कम करने में असफलता दिखाई है, बल्कि कई मामलों में जाति-आधारित संरचनात्मक विषमताओं को और सुदृढ़ किया है।
आंबेडकर का राज्य समाजवाद: अवधारणा और आधार
आंबेडकर का राज्य समाजवाद एक समन्वित दृष्टिकोण था, जिसमें उदार संवैधानिक मूल्यों और समाजवादी आर्थिक सिद्धांतों का संयोजन था। यह दृष्टि मूलतः सामाजिक न्याय और जाति-उन्मूलन के लक्ष्य से प्रेरित थी।
States and Minorities में आंबेडकर ने बीमा, परिवहन, खनन आदि प्रमुख उद्योगों के राष्ट्रीयकरण का प्रस्ताव रखा (Ambedkar 1947/1979) । उनका मानना था कि आर्थिक शक्ति का निजी हाथों में संकेंद्रण लोकतंत्र के लिए घातक है। इसलिए राज्य को उत्पादन के प्रमुख साधनों पर नियंत्रण रखना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, उन्होंने कृषि क्षेत्र में सामूहिक खेती का सुझाव दिया, जिसमें भूमि का स्वामित्व राज्य के पास हो और उसका संचालन सहकारी ढंग से किया जाए। इस प्रस्ताव का उद्देश्य जमींदारी प्रथा और जाति-आधारित कृषि शोषण को समाप्त करना था।
आंबेडकर की एक अत्यंत मौलिक देन यह थी कि उन्होंने आर्थिक अधिकारों—जैसे काम का अधिकार, जीविका का अधिकार—को मौलिक अधिकारों के रूप में मान्यता देने की वकालत की। यह विचार इस धारणा पर आधारित था कि केवल राजनीतिक अधिकार पर्याप्त नहीं हैं; वास्तविक स्वतंत्रता के लिए आर्थिक सुरक्षा अनिवार्य है।
उनकी आर्थिक सोच का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जाति-व्यवस्था का विश्लेषण है। Annihilation of Caste में उन्होंने स्पष्ट किया कि जाति केवल सामाजिक संस्था नहीं है, बल्कि यह आर्थिक संसाधनों के वितरण को भी नियंत्रित करती है (Ambedkar 1936/1979)। इसलिए किसी भी आर्थिक सुधार को जाति के प्रश्न से अलग नहीं किया जा सकता।
भारत में नवउदारवाद: उद्भव और विशेषताएँ
भारत में नवउदारवादी नीतियों का प्रारंभ 1991 में हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री P. V. Narasimha Rao और वित्त मंत्री Manmohan Singh के नेतृत्व में आर्थिक सुधार लागू किए गए (Chandra et al. 2000) । इन सुधारों में अर्थव्यवस्था का उदारीकरण, सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण और वैश्विक बाजारों के लिए खुलापन शामिल था।
नवउदारवाद का मूल सिद्धांत यह है कि मुक्त बाजार संसाधनों के आवंटन का सबसे प्रभावी माध्यम है। David Harvey (2005) के अनुसार, नवउदारवाद व्यक्तिगत उद्यमिता और निजी संपत्ति अधिकारों को सर्वोच्च महत्व देता है।
भारतीय संदर्भ में, नवउदारवाद एक ऐसी सामाजिक संरचना में कार्य करता है जो पहले से ही गहरी असमानताओं से ग्रस्त है। परिणामस्वरूप, आर्थिक विकास के बावजूद सामाजिक न्याय के लक्ष्य अधूरे रह जाते हैं।
तुलनात्मक विश्लेषण: आंबेडकर बनाम नवउदारवाद
आंबेडकर के राज्य समाजवाद और नवउदारवाद के बीच कई महत्वपूर्ण अंतरों को रेखांकित किया जा सकता है।
पहला, राज्य की भूमिका के संदर्भ में, आंबेडकर राज्य को सामाजिक परिवर्तन का सक्रिय साधन मानते थे, जबकि नवउदारवाद राज्य की भूमिका को सीमित कर उसे केवल बाजार का सहायक बनाता है।
दूसरा, आर्थिक न्याय के प्रश्न पर आंबेडकर समानता और पुनर्वितरण को प्राथमिकता देते हैं, जबकि नवउदारवाद आर्थिक वृद्धि को प्राथमिक लक्ष्य मानता है और यह मानता है कि इसके लाभ स्वतः समाज के सभी वर्गों तक पहुँचेंगे (Drèze and Sen 2013)।
तीसरा, संपत्ति के स्वामित्व के संदर्भ में आंबेडकर सार्वजनिक स्वामित्व और एकाधिकार-विरोधी नीतियों के पक्षधर थे, जबकि नवउदारवाद निजीकरण और पूँजी संचय को बढ़ावा देता है।
अंततः, आंबेडकर का दृष्टिकोण जाति के प्रश्न को केंद्र में रखता है, जबकि नवउदारवाद इसे लगभग अनदेखा कर देता है।
जाति और नवउदारवादी अर्थव्यवस्था
आंबेडकर के अनुसार, जाति एक “क्रमबद्ध असमानता” की प्रणाली है, जो आर्थिक अवसरों को निर्धारित करती है। नवउदारवाद इस वास्तविकता की उपेक्षा करता है और यह मानता है कि सभी व्यक्ति बाजार में समान रूप से प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।
वास्तविकता यह है कि उच्च जातियाँ ऐतिहासिक रूप से संसाधनों और शिक्षा तक बेहतर पहुँच के कारण आर्थिक रूप से अधिक सशक्त हैं। इसके विपरीत, दलित और आदिवासी समुदाय अक्सर असंगठित और असुरक्षित श्रम में संलग्न होते हैं।
Anand Teltumbde (2018) ने इस स्थिति को “जाति पूँजीवाद” (caste capitalism) के रूप में वर्णित किया है, जहाँ बाजार की प्रक्रियाएँ जातिगत असमानताओं को पुनः उत्पन्न करती हैं।
नवउदारवाद के परिणाम
नवउदारवादी नीतियों के कई महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक परिणाम सामने आए हैं।
पहला, आर्थिक असमानता में वृद्धि हुई है। पिकेटी और चांसल (2018) के अनुसार, भारत में संपत्ति का संकेंद्रण तेजी से बढ़ा है।
दूसरा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों का निजीकरण होने से ये सेवाएँ गरीब और वंचित वर्गों के लिए कम सुलभ हो गई हैं (Drèze and Sen 2013)।
तीसरा, श्रम बाजार में असंगठित क्षेत्र का विस्तार हुआ है, जिससे रोजगार की अस्थिरता बढ़ी है (Breman 1996)।
चौथा, कल्याणकारी नीतियों का स्वरूप सीमित और लक्षित हो गया है, जिससे व्यापक सामाजिक सुरक्षा का अभाव बना हुआ है (Patnaik 2018)।
नव-आंबेडकरवादी राजनीतिक अर्थव्यवस्था की आवश्यकता
इन परिस्थितियों में आंबेडकर की आर्थिक दृष्टि को पुनः प्रासंगिक बनाना आवश्यक है। एक नव-आंबेडकरवादी ढाँचा निम्नलिखित तत्वों पर आधारित हो सकता है:
राज्य की सक्रिय और उत्तरदायी भूमिका, बाजार का सामाजिक नियमन, शिक्षा और स्वास्थ्य में सार्वजनिक निवेश, निजी क्षेत्र में आरक्षण जैसी नीतियाँ एवं भूमि सुधार और संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण
यह दृष्टिकोण आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
निष्कर्ष
आंबेडकर का राज्य समाजवाद और नवउदारवाद, दोनों भारत के विकास के दो भिन्न मार्ग प्रस्तुत करते हैं। जहाँ नवउदारवाद आर्थिक वृद्धि पर केंद्रित है, वहीं आंबेडकर का दृष्टिकोण सामाजिक न्याय, समानता और गरिमा को प्राथमिकता देता है।
भारत जैसे समाज में, जहाँ जाति-आधारित असमानताएँ गहराई से जड़ित हैं, केवल बाजार-आधारित विकास मॉडल पर्याप्त नहीं है। आंबेडकर की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र स्थायी नहीं रह सकता।
इसलिए, भारत के भविष्य के लिए आंबेडकर की आर्थिक दृष्टि का पुनर्मूल्यांकन अत्यंत आवश्यक है।
संदर्भ
Ambedkar, B. R. 1936/1979. Annihilation of Caste. In Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches, Vol. 1. New Delhi: Government of India.
Ambedkar, B. R. 1947/1979. States and Minorities. In Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches, Vol. 1. New Delhi: Government of India.
Breman, Jan. 1996. Footloose Labour. Cambridge: Cambridge University Press.
Chandra, Bipan et al. 2000. India After Independence. New Delhi: Penguin.
Drèze, Jean, and Amartya Sen. 2013. An Uncertain Glory. Princeton: Princeton University Press.
Harvey, David. 2005. A Brief History of Neoliberalism. Oxford: Oxford University Press.
Patnaik, Prabhat. 2018. The Retreat to Unfreedom. New Delhi: Tulika Books.
Piketty, Thomas, and Lucas Chancel. 2018. World Inequality Report.
Teltumbde, Anand. 2018. Republic of Caste. New Delhi: Navayana.
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