गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

दलित प्रतिरोध, न्यायिक हस्तक्षेप और राज्य शक्ति

 

दलित प्रतिरोध, न्यायिक हस्तक्षेप और राज्य शक्ति:

अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और 2 अप्रैल 2018 की घटनाओं का समालोचनात्मक अध्ययन

एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

सारांश

सन् 2018 में Subhash Kashinath Mahajan v. State of Maharashtra में दिए गए निर्णय ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (आगे ‘अधिनियम’) के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण परिवर्तन सुझाए। इस निर्णय के विरुद्ध दलित समुदायों में व्यापक असंतोष उत्पन्न हुआ, जिसके परिणामस्वरूप 2 अप्रैल 2018 को राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों के दौरान राज्य की प्रतिक्रिया—जिसमें पुलिस बल का प्रयोग, गिरफ्तारी और हिंसा शामिल थी—ने भारतीय लोकतंत्र, संवैधानिक नैतिकता तथा सामाजिक न्याय के प्रश्नों को पुनः केंद्र में ला खड़ा किया।

यह शोध-पत्र इस प्रश्न की जांच करता है कि दलित समुदायों ने इस निर्णय का विरोध क्यों किया तथा 2 अप्रैल 2018 की घटनाओं को किस सीमा तक राज्यीय दमन के रूप में समझा जा सकता है। यह अध्ययन अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण, समाजशास्त्रीय विश्लेषण तथा उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह तर्क प्रस्तुत करता है कि यह प्रकरण भारतीय न्यायिक प्रणाली और सामाजिक यथार्थ के बीच गहरे अंतर्विरोधों को उजागर करता है।

1. प्रस्तावना

भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों पर टिकी है। तथापि, जाति-आधारित भेदभाव और हिंसा आज भी भारतीय समाज की एक कठोर वास्तविकता है। अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 को इसी ऐतिहासिक अन्याय के परिप्रेक्ष्य में लागू किया गया था।

20 मार्च 2018 को Supreme Court of India द्वारा दिए गए निर्णय ने इस अधिनियम की प्रकृति और प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। इसके विरोध में 2 अप्रैल 2018 को जो व्यापक आंदोलन हुआ, उसने न केवल दलित राजनीति की शक्ति को प्रदर्शित किया, बल्कि राज्य और समाज के अंतर्निहित संबंधों को भी उजागर किया।

यह शोध-पत्र निम्नलिखित प्रश्नों पर केंद्रित है:

  1. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध दलित समुदायों का विरोध किन कारणों से उत्पन्न हुआ?
  2. 2 अप्रैल 2018 की घटनाओं में राज्य की भूमिका को किस प्रकार समझा जा सकता है?

2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: जाति व्यवस्था और अत्याचार

भारतीय समाज में जाति व्यवस्था केवल सामाजिक पहचान का ढांचा नहीं, बल्कि शक्ति, संसाधनों और अवसरों के असमान वितरण का माध्यम रही है। B. R. Ambedkar ने इसे “graded inequality” अर्थात् श्रेणीबद्ध असमानता की प्रणाली के रूप में परिभाषित किया (Ambedkar 1936)

गेल ओम्वेट (1994) और गोपाल गुरु (2011) के अनुसार, जाति-आधारित उत्पीड़न केवल आर्थिक शोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक अपमान, सांस्कृतिक वंचना और राजनीतिक बहिष्करण का भी रूप लेता है।

National Crime Records Bureau के आंकड़ों के अनुसार, अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अपराधों की संख्या निरंतर उच्च बनी हुई है (NCRB 2017; 2018) । यह संकेत करता है कि विधिक प्रावधानों के बावजूद सामाजिक वास्तविकता में परिवर्तन सीमित रहा है।

3. अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989: उद्देश्य और महत्व

अत्याचार निवारण अधिनियम का उद्देश्य केवल अपराधों को दंडित करना नहीं था, बल्कि दलितों और आदिवासियों को संरचनात्मक हिंसा से सुरक्षा प्रदान करना भी था।

इस अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ थीं:  त्काल गिरफ्तारी का प्रावधान, विशेष न्यायालयों की स्थापना तथा पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा

आनंद तेलतुंबड़े (2010) के अनुसार, यह अधिनियम दलित समुदायों के लिए “संवैधानिक सुरक्षा कवच” के रूप में कार्य करता है।

4. 2018 का सर्वोच्च न्यायालय निर्णय: विश्लेषण

Subhash Kashinath Mahajan मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निम्नलिखित निर्देश दिए: प्राथमिकी दर्ज करने से पूर्व प्रारंभिक जांच, सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी हेतु पूर्व स्वीकृति तथा अग्रिम जमानत की अनुमति

न्यायालय ने इन निर्देशों को “कानून के दुरुपयोग” को रोकने के लिए आवश्यक बताया।

आलोचनात्मक दृष्टिकोण

उपेन्द्र बक्षी (2018) के अनुसार, यह निर्णय “सामाजिक संदर्भ से कटे हुए न्यायशास्त्र” का उदाहरण है। यह मानता है कि सभी नागरिक समान परिस्थितियों में हैं, जबकि वास्तविकता में दलित समुदाय सामाजिक रूप से कमजोर स्थिति में हैं।

5. दलित विरोध: एक अम्बेडकरवादी विश्लेषण

(क) संरचनात्मक उत्पीड़न की उपेक्षा

अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण के अनुसार, कानून को सामाजिक संदर्भ में समझना आवश्यक है। प्रारंभिक जांच का प्रावधान पीड़ितों के लिए न्याय प्राप्ति को और कठिन बनाता है।

(ख) “दुरुपयोग” का मिथक

घनश्याम शाह (2006) के अध्ययन दर्शाते हैं कि: अधिकांश मामले दर्ज ही नहीं होते तथा दोषसिद्धि दर कम होने का कारण जांच की कमजोरी है

अतः “दुरुपयोग” की धारणा वास्तविकता से अधिक एक राजनीतिक विमर्श प्रतीत होती है।

(ग) निवारक प्रभाव का कमजोर होना

तत्काल गिरफ्तारी का प्रावधान अपराधियों के लिए एक निवारक था। इसे कमजोर करना सामाजिक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करता है।

(घ) न्यायिक अतिक्रमण

आलोचकों का मत है कि न्यायालय ने विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप किया।

6. 2 अप्रैल 2018 का आंदोलन: दलित अस्मिता का उभार

2 अप्रैल 2018 का भारत बंद एक ऐतिहासिक घटना थी, जिसमें देशभर के दलित समुदायों ने भाग लिया।

क्रिस्टोफ जाफरेलो (2019) के अनुसार, यह आंदोलन दलित राजनीति के नए चरण का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ पारंपरिक राजनीतिक दलों से परे व्यापक सामाजिक लामबंदी देखी गई।

7. राज्य की प्रतिक्रिया और हिंसा

इस आंदोलन के दौरान: कई राज्यों में पुलिस फायरिंग हुई, 10 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई तथा  हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया

People's Union for Civil Liberties की रिपोर्टों में पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग और मनमानी गिरफ्तारियों का उल्लेख मिलता है।

8. राज्यीय दमन का प्रश्न

राज्य की भूमिका को तीन आधारों पर समझा जा सकता है:

(क) असंतुलित बल प्रयोग, (ख) विरोध का अपराधीकरण तथा (ग) संरक्षण की विफलता

गोपाल गुरु (2011) के अनुसार, राज्य संस्थाएँ अक्सर सामाजिक असमानताओं को पुनः उत्पन्न करती हैं।

9. मीडिया विमर्श

मुख्यधारा मीडिया ने इस आंदोलन को “हिंसक” और “अराजक” बताया, जबकि वैकल्पिक दृष्टिकोण इसे न्याय की मांग के रूप में देखते हैं। यह अंतर ज्ञान-उत्पादन की असमानताओं को दर्शाता है (Teltumbde 2018)

10. विधायी प्रतिक्रिया

सरकार ने 2018 में संशोधन अधिनियम पारित कर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को निरस्त कर दिया। यह दर्शाता है कि लोकतांत्रिक दबाव नीति-निर्माण को प्रभावित कर सकता है।

11. सैद्धांतिक निहितार्थ

(क) औपचारिक बनाम वास्तविक समानता, (ख) कानून एक संघर्ष का क्षेत्र एवं (ग) लोकतंत्र और हाशिए के समुदाय

12. निष्कर्ष

2018 की घटनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि: कानून और सामाजिक वास्तविकता के बीच गहरा अंतर है, राज्य की तटस्थता संदिग्ध हो सकती है तथा दलित प्रतिरोध लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अंग है।

अन्ततः, यह प्रकरण अम्बेडकर की उस चेतावनी को पुनः स्मरण कराता है कि सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र अधूरा है।

संदर्भ सूची

Ambedkar, B. R. 1936. Annihilation of Caste.
Baxi, Upendra. 2018.
Guru, Gopal. 2011. Humiliation: Claims and Context.
Jaffrelot, Christophe. 2019. India’s Silent Revolution.
Omvedt, Gail. 1994. Dalits and the Democratic Revolution.
Shah, Ghanshyam et al. 2006. Untouchability in Rural India.
Teltumbde, Anand. 2010; 2018.
NCRB. 2017, 2018 Reports.
PUCL Reports. 2018.

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