शनिवार, 24 जनवरी 2026

हिंदुत्व, कॉरपोरेट पूँजी और भारत में श्रेणीबद्ध असमानता का पुनरुत्पादन: एक आंबेडकरवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

 

हिंदुत्व, कॉरपोरेट पूँजी और भारत में श्रेणीबद्ध असमानता का पुनरुत्पादन: एक आंबेडकरवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

एस. आर. दारापुरी
राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

यह लेख हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ का विश्लेषण आंबेडकरवादी एवं दलित–बहुजन राजनीतिक अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से करता है। यह तर्क देता है कि बहुसंख्यक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और संकेंद्रित कॉरपोरेट पूँजी के बीच समकालीन गठबंधन कोई ऐतिहासिक विच्छेद नहीं, बल्कि भारत की श्रेणीबद्ध असमानता की व्यवस्था का पुनर्संरचनात्मक रूप है। हिंदुत्व जाति-आधारित पदानुक्रम और सामाजिक बहिष्करण को वैचारिक वैधता प्रदान करता है, जबकि कॉरपोरेट पूँजी राज्य संरक्षण और नवउदारवादी पुनर्गठन के माध्यम से आर्थिक शक्ति का संकेन्द्रण करती है। ये दोनों मिलकर संवैधानिक लोकतंत्र को कमजोर करते हैं, दलित–बहुजन श्रम को हाशिये पर धकेलते हैं, तथा जाति, वर्ग और पुनर्वितरण से जुड़े भौतिक प्रश्नों को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से विस्थापित कर देते हैं। यह लेख इस गठजोड़ को वैश्विक अधिनायकवादी नवउदारवाद के संदर्भ में रखता है, साथ ही इसकी विशिष्ट ब्राह्मणवादी और जाति-आधारित संरचना को रेखांकित करता है।

1. भूमिका (Introduction)

समकालीन भारत में हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ के सुदृढ़ीकरण को जाति-आधारित सामाजिक व्यवस्था और ब्राह्मणवादी प्रभुत्व की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में समझना आवश्यक है। आंबेडकरवादी दृष्टि से यह गठजोड़ केवल लोकतांत्रिक संस्थाओं को क्षीण नहीं करता, बल्कि सक्रिय रूप से श्रेणीबद्ध असमानता का पुनरुत्पादन करता है—जिसे डॉ. भीमराव आंबेडकर ने हिंदू सामाजिक व्यवस्था का मूल संगठन सिद्धांत बताया था।

जहाँ नवउदारवादी सुधारों ने आर्थिक असमानता को तीव्र किया है, वहीं हिंदुत्व ने एक ऐसा सांस्कृतिक-राजनीतिक ढाँचा उपलब्ध कराया है जो पदानुक्रम, आज्ञाकारिता और बहिष्करण को सामान्य और स्वाभाविक बनाता है। दूसरी ओर, कॉरपोरेट पूँजी को ऐसे राजनीतिक वातावरण से लाभ होता है जहाँ दलित–बहुजन श्रम को अनुशासित, अराजनीतिक और खंडित किया जाता है, तथा पुनर्वितरण की माँगों को धार्मिक राष्ट्रवाद के माध्यम से विस्थापित कर दिया जाता है।

यह लेख तर्क देता है कि हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ ब्राह्मणवादी पूँजीवाद का एक समकालीन रूप है, जिसमें बाज़ार शक्ति और जाति-आधारित विचारधारा का संयोग दिखाई देता है।

2. आंबेडकरवादी ढाँचा: जाति, पूँजी और सत्ता

आंबेडकर ने जाति को केवल श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का विभाजन माना—जो धार्मिक विचारधारा, अंतर्विवाह और सामाजिक दंडों द्वारा संरक्षित है। इस ढाँचे में: आर्थिक शोषण सामाजिक पदानुक्रम से अविभाज्य है, पूँजी संचय ऐतिहासिक रूप से जाति-आधारित श्रम दोहन पर आधारित रहा है तथा सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र स्वभावतः अस्थिर है।

अतः हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ को केवल वैचारिक या आर्थिक परिघटना के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक रूप में जाति सत्ता की निरंतरता के रूप में विश्लेषित किया जाना चाहिए।

भारत में नवउदारवादी पूँजीवाद ने जाति को समाप्त नहीं किया है; बल्कि उसने जाति को पुनः कार्यात्मक बनाया है—विशेषकर दलित–बहुजन समुदायों में केंद्रित असंगठित श्रम के विस्तार, सामूहिक सौदेबाज़ी और श्रम संरक्षण के क्षरण, तथा पूँजी, ज्ञान और राज्य संस्थाओं पर अभिजात नियंत्रण को बनाए रखते हुए।

3. कॉरपोरेट पूँजी और ब्राह्मणवादी राज्य सत्ता

भारत में बड़ी कॉरपोरेट पूँजी सामाजिक संरचना की दृष्टि से संकीर्ण है और सांस्कृतिक रूप से प्रभुत्वशाली जाति नेटवर्कों से जुड़ी हुई है। समकालीन राज्य कॉरपोरेट संचय को निम्नलिखित तरीकों से सुगम बनाता है: सामूहिक श्रम से निर्मित सार्वजनिक परिसंपत्तियों का निजीकरण, हाशिये के श्रमिकों को प्रभावित करने वाले श्रम और पर्यावरण कानूनों का शिथिलीकरण तथा बड़ी कंपनियों को कर छूट और नियामक अपवाद।

आंबेडकरवादी दृष्टि से यह राज्य के उस रूपांतरण को दर्शाता है जिसमें वह संविधान द्वारा परिकल्पित सामाजिक न्याय के साधन के बजाय उच्च जातीय कॉरपोरेट हितों का संरक्षक बन जाता है।

आरक्षण, श्रम संरक्षण और कल्याणकारी प्रावधान—जो दलित–बहुजन समुदायों के लिए संघर्ष से प्राप्त सुरक्षा उपाय हैं—को लगातार अक्षमता या तुष्टीकरण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे संरचनात्मक सुधार की अवधारणा ही अवैध ठहराई जाती है।

4. सामाजिक नियंत्रण की विचारधारा के रूप में हिंदुत्व

हिंदुत्व जाति-पूँजीवाद का सांस्कृतिक पक्ष है। एकरूप हिंदू पहचान का दावा करते हुए यह व्यवस्थित रूप से: जाति उत्पीड़न को सभ्यतागत गौरव से प्रतिस्थापित करता है, दलित–बहुजन आकांक्षाओं को भौतिक सत्ता के बिना प्रतीकात्मक समावेशन में बदल देता है तथा पदानुक्रम को सांस्कृतिक सामंजस्य के रूप में पुनः परिभाषित करता है

आंबेडकर ने चेताया था कि हिंदू धर्म की शक्ति असमानता को प्राकृतिक और पवित्र प्रतीत कराने में निहित है। हिंदुत्व इस कार्य को आधुनिक संदर्भ में मीडिया, दृश्यात्मक राजनीति और राष्ट्रवाद के माध्यम से पूरा करता है, जिससे जाति चेतना और वर्ग एकजुटता कमजोर होती है।

धार्मिक ध्रुवीकरण भूमिहीनता, असुरक्षित श्रम, शैक्षिक बहिष्करण और घटते सार्वजनिक रोजगार जैसे प्रश्नों से ध्यान हटाता है।

5. चुनावी राजनीति, धन शक्ति और बहिष्करण

चुनावों का बढ़ता कॉरपोरेटीकरण दलित–बहुजन हितों के राजनीतिक हाशियाकरण को और गहरा करता है। पूँजी-प्रधान चुनाव अभियान, मीडिया वर्चस्व और अपारदर्शी वित्तपोषण तंत्र राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को कॉरपोरेट-अनुकूल दलों के पक्ष में झुका देते हैं।

यद्यपि दलित–बहुजन प्रतिनिधित्व संख्यात्मक रूप से बढ़ सकता है, किंतु निर्णय-निर्माण की शक्ति संकेंद्रित बनी रहती है—जिससे आंबेडकर की यह चेतावनी पुष्ट होती है कि आर्थिक शक्ति के बिना राजनीतिक प्रतिनिधित्व खोखला है।

इस प्रकार चुनावी लोकतंत्र कमजोर पुनर्वितरण, विरोध के अपराधीकरण और श्रम व जाति-आधारित आंदोलनों के दमन के साथ सहअस्तित्व में रहता है।

6. जाति–वर्ग राजनीति का विस्थापन

हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ जाति–वर्ग राजनीति को व्यवस्थित रूप से विस्थापित करता है, सामाजिक संघर्षों को इस प्रकार पुनर्परिभाषित करते हुए: हिंदू बनाम मुसलमान, राष्ट्रवादी बनाम राष्ट्र-विरोधी तथा सांस्कृतिक अंदरूनी बनाम विदेशी प्रभाव।

यह विखंडन पूँजी को लाभ पहुँचाता है, क्योंकि इससे दलित–बहुजन–आदिवासी–श्रमिक गठबंधनों का निर्माण रुक जाता है जो आर्थिक संकेन्द्रण और जातिगत विशेषाधिकार को चुनौती दे सकते थे।

आंबेडकर ने कहा था कि जाति उत्पीड़ितों के बीच नैतिक और राजनीतिक समुदाय के निर्माण को रोकती है। हिंदुत्व इसी संरचनात्मक कमजोरी का उपयोग असमान राजनीतिक अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में करता है।

7. लोकतांत्रिक संस्थाएँ और असंवैधानिक प्रवृत्ति

आंबेडकर ने संविधान को कानून और संस्थागत सुरक्षा के माध्यम से जाति के उन्मूलन का उपकरण माना था। हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ इस दृष्टि को स्वायत्त संस्थाओं को कमजोर करके, संवैधानिक नैतिकता का क्षरण करके तथा अधिकार-आधारित नागरिकता को सांस्कृतिक निष्ठा से प्रतिस्थापित करके कमजोर करता है

भूमि अधिग्रहण या निजीकरण का विरोध करने वाले दलित, आदिवासी, श्रमिक और अल्पसंख्यक आंदोलनों के विरुद्ध दमन, राज्य सत्ता के वर्ग–जाति चरित्र को उजागर करता है।

8. तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य: जाति पूँजीवाद और वैश्विक अधिनायकवाद

यद्यपि अन्य देशों में अधिनायकवादी नवउदारवादी शासन से समानताएँ दिखाई देती हैं, भारत का अनुभव विशिष्ट है क्योंकि यहाँ पूँजीवाद का संलयन जाति विचारधारा से हुआ है। नस्ल-आधारित लोकलुभावनवाद के विपरीत, हिंदुत्व प्राचीन श्रेणीबद्ध असमानता की व्यवस्था पर आधारित है, जो इसे गहरी सामाजिक वैधता और स्थायित्व प्रदान करती है।

इससे प्रतिरोध अधिक जटिल हो जाता है, क्योंकि आर्थिक शोषण धार्मिक संबद्धता और प्रतीकात्मक मान्यता के आवरण में छिप जाता है।

9. निष्कर्ष

आंबेडकरवादी और दलित–बहुजन राजनीतिक अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ बहुसंख्यक शासन के अंतर्गत जाति पूँजीवाद के सुदृढ़ीकरण का प्रतिनिधित्व करता है। यह असमानता को गहराता है, संवैधानिक लोकतंत्र को खोखला करता है और सामाजिक व आर्थिक लोकतंत्र की मुक्ति-संभावनाओं को सीमित करता है।

आंबेडकर की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है: जाति के उन्मूलन और पूँजी के लोकतंत्रीकरण के बिना राजनीतिक लोकतंत्र मात्र एक मुखौटा रहेगा। अतः वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती देने के लिए ब्राह्मणवाद और कॉरपोरेट सत्ता—दोनों का एक साथ सामना करना अनिवार्य है।

साभार: ChatGPT

 

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