बुधवार, 8 मार्च 2017

बुद्ध - हरिवंश राय बच्चन

बुद्ध  - हरिवंश राय बच्चन 



जब ईश्वर-अल्ल्ह की नहीं गली दाल
वहाँ बुद्ध की क्या चलती चाल
वे थे मूर्ति के खिलफ उसने उन्ही की बनायीं मूर्ति 

वे थे पूजा के विरुद्ध उसने उन्ही को दिया पूज
उन्हें ईश्वर में था अविश्वास उसने उन्ही को कह दिया भगवान
वे तो आये थे फ़ैलाने को वैराग
मिटाने को श्रृंगार पटार उसने उन्ही को बना दिया श्रृंगार
बनाया उनका सुन्दर आकार
उनका बेल-मुंड था शीश उसने लगाये बाल घुँगरदार
मिट्टी,लकड़ी,लोहा,पीतल,तांबा,सोना,चाँदी,मूंगा,पन्ना,हाथी दाँत
सब के अंदर इन्हे डाल, तराश, खराद बना दिया इन्हे बाजार में बिकने का सामान
बुद्ध भगवान अमीरों के ड्राइंग रूम, रईसों के मकान
तुम्हारे चित्र, तुम्हारी मूर्ति से शोभायमान
पर वे हैं तुम्हारे दर्शन से अनभिज्ञ
तुम्हरे विचारों से अनजान
सपने में भी इन सब को नहीं आता ध्यान
इसीलिए क्या की थी आसमान जमीन एक
और आज देखता हूँ तुमको जहाँ
एक ओर है तुम्हारी प्रतिमा दूसरी ओर है डांसिंग हॉल
हे पशुओं पर दया के प्रचारक
अहिंसा के अवतार परम विरक्त संयम साकार
मची तुम्हारे सामने रूप यौवन की ठेल-पेल
इच्छा और वासना खुल कर कर रही है खेल
हर तरफ है हिंसा, हर तरफ है चोरी, मक्कारी.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें