शुक्रवार, 24 मई 2013

वर्तमान में बौद्ध धम्म की प्रासंगिकता



(25 मई को बौद्ध पूर्णिमा पर विशेष )
वर्तमान में बौद्ध धम्म की प्रासंगिकता
एस आर. दारापुरी
आज संसार में हिंसा, धर्मिक उन्माद और नस्लीय टकराव जैसी गंभीर समस्यायों का बोलबाला है. चारों तरफ मानव अस्तित्व को गंभीर खतरे दिखाई दे रहे हैं. एक ओर मानव ने विज्ञान, तकनीकि और यांत्रिकी में  विकास एवं उसका उपयोग करके अपार समृद्धि प्राप्त की है, वहीँ दूसरी ओर मानव ने स्वार्थ, लोभ, हिंसा आदि भावनाओं के वशीभूत होकर आपसी कलह, लूट खसूट, अतिक्रमण आदि का अकल्याणकारी और विनाशकारी मार्ग भी अपनाया है. अतः आज की दुनिया में भौतिक सम्पदा के साथ साथ मानव अस्तित्व को भी बचाना आवश्यक हो गया है.
वैसे तो कहा जाता है कि हरेक आदमी अपना कल्याण चाहता है परन्तु व्यवहार में यह पूर्णतया सही नहीं है. यह यथार्थ है कि आदमी अपने कल्याण के साथ साथ अपना नुक्सान भी स्वयं ही करता है जैसा कि आज तक की हुयी तमाम लड़ाईयों, विश्व युद्धों तथा वर्तमान में व्यापत हिन्सा  व आपसी टकराहट से प्रमाणित है. अतः आदमी के विनाशकारी विचारों को बदलना और उन पर नियंत्रण रखना बहुत ज़रूरी है. आज से लगभग 2558 वर्ष पहले बुद्ध ने मानवीय प्रवृतियों का विश्लेषण करते हुए कहा था कि मनुष्य का मन ही सभी कर्मों का नियंता है. अतः मानव की गलत प्रवृतियों को नियंत्रित करने के लिए उस के मन में सद विचारों का प्रवाह करके उसे सदमार्ग पर ले जाना आवश्यक है. उन्होंने यह सदमार्ग बौद्ध धम्म के  रूप में दिया था. अतः आज मानव-मात्र की कुप्रवृतियों जैसे हिंसा, शत्रुता, द्वेष, लोभ आदि से मुक्ति पाने के लिए बौद्ध धम्म व् बौद्ध दर्शन को अपनाने कि बहुत  ज़रुरत है.
आपसी शत्रुआ के बारे में बुद्ध ने कहा था कि ,” वैर से वैर शांत नहीं होता. अवैर से ही वैर शांत होआ है.” यह सुनहरी सूत्र हमेशा से सार्थक रहा है. डॉ. आंबेडकर ने भी कहा था कि हिंसा द्वारा प्राप्त की गयी जीत स्थायी नहीं होती क्योंकि कि उसे प्रतिहिंसा द्वारा हमेशा पलटे जाने का डर रहता है. अतः वैर को जन्म देने वाले कारकों को बुद्ध ने पहचान कर उनको दूर करने का मार्ग बहुत पहले ही प्रशस्त किया था. उन्होंने मानवमात्र के दुखों को कम करने के लिए पंचशील और अष्टांगिक मार्ग के नैतिक एवं कल्याणकारी जीवन दर्शन का प्रतिपादन किया था. यह ऐतिहासिक तौर पर प्रमाणित है कि बौद्ध काल में जब “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” के बौद्ध मार्ग का शासकों और आम जन द्वारा अनुसरण गया तो वह काल सुख एवं समृधि के कारण भारत के इतिहास का “स्वर्ण युग” कहलाया. उस समय शांति और समृधि फैली. इसके साथ ही दुनिया  के जिन देशों में बौद्ध धम्म फैला, उन देशों में भी सुख, शांति तथा समृधि फैली. अतः बौद्ध धम्म का पंचशील और अष्टांगिक मार्ग आज भी विश्व में शांति  और कल्याण हेतु बहुत सार्थक है.
यह कहा जाता है कि धर्म आदमी का कल्याण करता है परन्तु व्यवहार में यह देखा गया है यह पूर्णतया सही नहीं है. इतिहास इस बात का गवाह है कि संसार मे जितनी मारकाट धर्म के नाम पर हुयी है उतनी मारकाट अब तक की सभी लड़ाईयों और विश्व युद्धों में नहीं हुयी है. यह सब धार्मिक उन्माद, कट्टरपंथी एवं अपने धर्म  को दूसरों पर जबरदस्ती थोपने के कारण हुआ है. धर्म के नाम पर तलवार का इस्तेमाल करने से मानव-मात्र का बहुत नुक्सान हुआ है. यह केवल बौद्ध धम्म ही है जो कि तलवार के बूते  पर नहीं बल्कि करुना-मैत्री जैसे सद्गुणों के कर्ण संसार  के बड़े भूभाग में फैला और आज भी बड़ी तेजी से फ़ैल रहा है. जहाँ एक ओर दूसरे धर्मों को मानने वालों की संख्या लगातार घट रही है और वे अपने अनुयायिओं क बाँध कर रखने के लिए तरह तरह के हथकंडे व आधुनिक प्रचार तकनीक को अपनाने के लिए बाध्य हो रहे हैं, वहीँ बौद्ध धम्म अपनी नैतिकता एवं सर्व कल्याणकारी शिक्षाओं के कारण स्वतः प्रसारित हो रहा है.
यह सर्वविदित है कि हमारा देश एक जाति प्रधान देश है जिस के कारण  हमारी आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा सदियों से सभी मानव अधिकारों से वंचित रहा है और आज भी काफी हद तक वंचित है. यह बुद्ध ही थे जिन्होंने जाति-भेद को समाप्त करने के लिए अपने भिक्खु संघ में पहल की. उन्होंने सुनीत भंगी, उपली नाई तहत अन्य कई तथाकथित निचली जातियों के लोगों को संघ में राजा और राजकुमारों की बराबरी का स्थान दिया जिनमे से कई अर्हत बने. बुद्धा ने ही महिलायों को भिक्खुनी संघ में स्थान देकर नारी पुरुष समानता के सिधांत को मज़बूत किया.  यद्यपि दास  प्रथा तथा  जाति भेद पूर्ण  रूप से समाप्त नहीं हुआ परन्तु बुद्ध द्वारा वर्ण व्यवस्था तथा उसके धार्मिक आधार पर किया गया  प्रहार बहुत कारगर सिद्ध हुआ. डॉ. आंबेडकर ने अपने लेखन में कहा है कि भारत में बौद्ध धम्म का उदय एक क्रांति थी  और बाद में ब्राह्मण धर्म कि पुनर्स्थापना एक प्रतिक्रांति थी जिस ने बौद्ध धम्म द्वारा स्थापित सभी मानवीय सामाजिक मूल्यों को पलट कर रख दिया था. फलस्वरूप जाति व्यवस्था एवं ब्राह्मण धर्म को अधिक सख्ती से लागू करने के लिए मनुस्मृति तथा अन्य समृतियों  कि रचना करके उन में प्रतिपादित नियमों और विधानों को कठोरता से लागू किया गया.
आज भारत तथा  विश्व में जो धार्मिक कट्टरवाद व टकराव दिखाई दे रहा है वह हम सब के लिए बहुत बड़ी चिंता और चुनौती का विषय है. भारत में साम्प्रदायिक दंगों और जातीय जनसंहारों में जितने निर्दोष लोगों की जाने गयी हैं वे भारत द्वारा अब तक लड़ी गयी सभी लड़ाईयों में मारे गए सैनिकों से कहीं अधिक हैं. अतः अगर भारत में धार्मिक स्वतंत्रता  और धर्म निरपेक्षता के संवैधानिक अधिकार को बचाना है तो बौद्ध धम्म के धार्मिक सहिष्णुता, करुणा और मैत्री के सिद्धांतों को अपनाना ज़रूरी है. आज सांस्कृतिक फासीवाद और हिंदुत्ववाद जैसी विघटनकारी विचारधारा को रोकने के लिए बौद्ध धम्म के मानवतावादी और समतावादी दर्शन को जन जन तक ले जाने की ज़रुरत है.
दुनिया में धार्मिक टकरावों का एक कारण इन धर्मों को विज्ञानं द्वारा दी जा रही चुनौती भी है. जैसा कि ऊपर अंकित किया गया है कि  विभिन्न ईश्वरवादी धर्मों के अनुयायिओं की संख्या कम होती जा रही है क्योंकि वे विज्ञानं की तर्क और परीक्षण वाली कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं. अतः वे अपने को बचाए रखने के लिए तरह तरह के प्रलोभनों द्वारा, चमत्कारों का प्रचार एवं अन्य हथकंडों का इस्तेमाल करके अपने अनुयायिओं को बांध कर रखना चाहते हैं. उनमे अपने धर्म की अवैज्ञानिक और अंध-विश्वासी धारणाओं को बदलने की स्वतंत्रता एवं इच्छाशक्ति का नितांत आभाव है. इस के विपरीत बौद्ध धम्म विज्ञानवादी, परिवर्तनशील तथा  प्रकृतवादी होने के कारण विज्ञानं के साथ चलने तथा ज़रूरत पड़ने पर बदलने में सक्षम है. इन्हीं गुणों के कारण डॉ. आंबेडकर ने भविष्यवाणी की थी कि,” यदि भविष्य की दुनियां को धर्म की ज़रुरत होगी तो इसको केवल बौद्ध धम्म ही पूरा कर सकता है.” उनका भारत को पुनः बौद्ध्मय बनाने का  सपना भी था. अतः हम निस्संकोच कह सकते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में बौद्ध धम्म एवं बौद्ध दर्शन पूर्णतया प्रासंगिक है.

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श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका एस.आर. दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय पीपुल्स फ्रंट (आज 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष) भीमराव रामजी अंबेडकर ने आधुनिक भारत में श्रम कल्याण नीति को आकार देने में एक बुनियादी और अक्सर कम सराही गई भूमिका निभाई। उनका योगदान केवल संवैधानिक आदर्शों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वायसराय की कार्यकारी परिषद (1942–1946) में 'श्रम सदस्य' के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने व्यावहारिक श्रम सुधारों में भी गहरी भूमिका निभाई। उनके काम ने कई ऐसे अधिकारों और सुरक्षा उपायों की नींव रखी, जिनसे भारतीय श्रमिकों को आज भी लाभ मिल रहा है। 1. संस्थागत और नीतिगत नेतृत्व ब्रिटिश भारत के तहत 'श्रम सदस्य' के रूप में, अंबेडकर असल में 'श्रम मंत्री' ही थे। इस भूमिका में, उन्होंने श्रम प्रशासन को एक औपनिवेशिक, शोषणकारी ढांचे से बदलकर अधिक कल्याण-उन्मुख प्रणाली में बदल दिया। उन्होंने श्रमिकों को अनियंत्रित पूंजीवाद से बचाने के लिए राज्य के हस्तक्षेप की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने भारत के भीतर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के ढांचे को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे भारतीय श्रम नीतियां अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो गईं। 2. काम के घंटों में कमी अंबेडकर की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक भारत में '8 घंटे के कार्यदिवस' की शुरुआत करना था। इस सुधार से पहले, औद्योगिक श्रमिक अक्सर कठोर परिस्थितियों में दिन में 12–14 घंटे काम करते थे। इस सुधार ने भारत को वैश्विक श्रम मानकों के बराबर ला खड़ा किया और मानवीय कार्य परिस्थितियों की दिशा में एक बड़ा बदलाव लाया। 3. सामाजिक सुरक्षा उपाय अंबेडकर का दृढ़ विश्वास था कि राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा भी होनी चाहिए। उन्होंने कई सामाजिक सुरक्षा उपायों की वकालत की और उन्हें शुरू किया, जिनमें शामिल हैं: महिला श्रमिकों के लिए मातृत्व लाभ, कार्यस्थल पर चोट लगने पर मुआवज़ा, और भविष्य निधि (Provident fund) योजनाएं इन उपायों ने बाद में 'कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948' और 'कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952' जैसे कानूनों को प्रभावित किया। 4. महिला श्रमिकों की सुरक्षा अंबेडकर श्रम क्षेत्र में लैंगिक न्याय के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने ऐसी नीतियां पेश कीं जिनसे यह सुनिश्चित हो सके: सवेतन मातृत्व अवकाश, खदानों में महिलाओं के लिए भूमिगत काम पर प्रतिबंध, और समान वेतन तथा बेहतर कार्य-स्थितियां। उस समय के हिसाब से उनका दृष्टिकोण प्रगतिशील था और सामाजिक न्याय के उनके व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप था। 5. ट्रेड यूनियन अधिकार और औद्योगिक संबंध अंबेडकर ने सामूहिक सौदेबाजी के महत्व को पहचाना और ट्रेड यूनियनों के विकास का समर्थन किया। उन्होंने इन लक्ष्यों की दिशा में काम किया: ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता, औद्योगिक विवादों के समाधान के लिए तंत्र, और त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलनों (सरकार, नियोक्ता, श्रमिक) को बढ़ावा देना उनके प्रयासों ने संवाद को संस्थागत बनाने और औद्योगिक संघर्ष को कम करने में मदद की। 6. न्यूनतम वेतन और उचित स्थितियां हालांकि न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 स्वतंत्रता के बाद लागू किया गया था, लेकिन अंबेडकर के विचारों ने इसके ढांचे को काफी हद तक प्रभावित किया। उन्होंने लगातार यह तर्क दिया कि श्रम कोई वस्तु नहीं है, और एक गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के लिए श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिए। 7. श्रमिक कल्याण कोष और आवास अंबेडकर ने श्रमिकों के आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा में सहायता के लिए कल्याण कोष की वकालत की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि औद्योगिक विकास में कार्यस्थल से परे श्रमिकों की भलाई के लिए भी प्रावधान शामिल होने चाहिए। 8. श्रमिक कल्याण के लिए संवैधानिक दृष्टिकोण भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में, अंबेडकर ने श्रमिक कल्याण को 'राज्य के नीति निदेशक तत्वों' (अनुच्छेद: 39, 41, 42 और 43) में शामिल किया, जिसमें ये अधिकार शामिल हैं: काम का अधिकार, काम की न्यायसंगत और मानवीय स्थितियां, जीवन-निर्वाह योग्य वेतन, और बेरोजगारी, बीमारी तथा वृद्धावस्था की स्थिति में सार्वजनिक सहायता ये सिद्धांत उनके इस विश्वास को दर्शाते हैं कि लोकतंत्र को सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना ही चाहिए। 9. व्यापक दार्शनिक योगदान अंबेडकर का श्रम दर्शन गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित था। कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों से प्रभावित होने के बावजूद, उनका दृष्टिकोण उनसे भिन्न था; उन्होंने हिंसक क्रांति को अस्वीकार कर दिया और इसके बजाय श्रमिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों की वकालत की। निष्कर्ष श्रमिक कल्याण के क्षेत्र में डॉ. अंबेडकर का योगदान अत्यंत परिवर्तनकारी था। उन्होंने केवल आर्थिक उत्पादकता पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, मानव गरिमा और सामाजिक न्याय को केंद्र में ला दिया। समकालीन भारत में श्रमिकों को प्राप्त कई सुरक्षात्मक उपाय और अधिकार, उन्हीं के दृष्टिकोण और नीतिगत पहलों से प्रेरित हैं। डा. अंबेडकर मजदूरों को न केवल अपने अधिकारों के लिए ही लड़ने के लिए संगठित होने बल्कि राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के लिए भी प्रेरित किया। उनका कार्य हमें यह याद दिलाता है कि श्रमिक कल्याण केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि एक नैतिक और संवैधानिक अनिवार्यता है, जो एक न्यायपूर्ण समाज के लिए अत्यंत केंद्रीय महत्व रखती है।

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