शनिवार, 12 मई 2012

डॉ. आंबेडकर के कार्टून  पर राजनीति से उपजे खतरे
एस. आर. दारापुरी
 कल लोक सभा और राज्य सभा में राष्ट्रीय शैक्षिक एवं अनुसन्धान परिषद ( एनसीआरटी) की किताब में  डॉ. बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर पर छपे कार्टून को लेकर कुछ सदस्यों  दुआरा इसे आपत्तिजनक कह कर हंगामा किया गया. दोनों सदनों में विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लिया. इसमें मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के इस्तीफे की मांग भी उठी. शोर शराबे और हंगामे के कारण पूर्वान्ह में सदन की कार्रवाही सुचारू रूप से नहीं चल सकी. बाद में सिब्बल के  दोषियों  के खिलाफ कार्रवाही का  आश्वासन देने के साथ इसके लिए माफ़ी mangni पड़ी.

 कक्षा ११ में पढाई जाने वाली राजनीति शास्त्र की पुस्तक में आंबेडकर के तथाकथित आपतिजनक कार्टून का मुद्दा  सबसे पहले लोकसभा में वीसीके पार्टी के थिरुवा बलवान तोल ने उठाया और आपतिजनक कार्टून की प्रति भी सदन में दिखाई. उनके समर्थन में भाजपा,सपा, बसपा, और अन्य दलों के सदस्यों ने भी शोर शराबा किया. वे मानव संसाधन मंत्री का इस्तीफा मांग रहे थे. राज्य सभा में प्रश्न काल के दौरान जब सिब्बल एक प्रशन का जवाब देने के लिए खड़े हुए तो बसपा  के ब्रजेश पाठक ने कार्टून की प्रति दिखाते हुए इस मुद्दे को उठा दिया. इस पर अन्य सदस्य भी उनसे सफाई मांगने लगे.
   सरकार की तरफ से कपिल सिब्बल ने दोनों सदनों में सफाई दी और इस गलती के लिए माफी मांगी. इस पर बसपा प्रमुख मायावती  ने कहा कि वह सरकार की सफाई से संतुष्ट नहीं है. सरकार बताये कि यह कृत्य करने वालों पर क्या कार्रवाही की गयी, यह अपराधिक कृत्य है. मायावती ने इसे लोकतंत्र का अपमान कहा. बाद में संसद भवन परिसर में लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान ने भी कहा, " दोषियों का निलंबन ही नहीं उन पर एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा चलाना  चाहिए. उन्होंने ने तो एनसीआरटी को ही बंद करने की मांग भी कर डाली.

दोनों सदनों में उपरोक्त हंगामे के फलस्वरूप सरकार ने एनसीआरटी की उपरोक्त पुस्तक से विवादित कार्टून को निकालने की घोषणा की जिस पर  एनसीआरटी की पुस्तक सलाहकार समिति के दो सदस्यों योगेन्द्र यादव और सुहास पल्शिकर ने समिति से इस्तीफा दे दिया. इस पर योगेन्द्र यादव ने कहा , "लोक सभा में हुई बहस पूरी तरह से सूचित नहीं थी .  हम लोग पुस्तक निर्माता समिति के मुख्य सलाहकार थे. इस लिए हम लोगों ने इस्तीफा देना ही उचित समझा. मैं चाहता था कि सांसद लोग पुस्तक या  जिस पृष्ट पर कार्टून छ्पा था  को पढ़ लेते."

आंबेडकर नेहरु कार्टून विवाद पर राजनीतिक विश्लेषकों और समाज विज्ञानियों  में विरोधी प्रतिक्रया है. कुछ दलित बुद्धिजीविओं का कहना है कि कार्टून डॉ. आंबेडकर के लिए अपमानजनक है. दूसरों का विशवास है कि यह विवाद अनावश्यक है. एक टिप्पणीकार  के अनुसार इस में चुनाव तंत्र, जिस में वोट की राजनीति और प्राथमिकतायें ही निर्णय लेने की बाध्यताएं होती हैं,  की बू आती है.

समाज विज्ञानी आशीष नंदी ने कहा, " उक्त विवाद से प्रकट होता है कि यद्यपि लोक्तंत्रिकर्ण हुआ है परन्तु समाज में लोकतान्त्रिक मूल्यों का समावेश नहीं हुआ है. लोकतंत्र केवल चुनाव तंत्र बन कर रह गया है." एक अन्य समाज विज्ञानी शिव विशाव्नाथान ने कहा कि अगर इसे गहराई  से देखा जाए तो यह विवाद नेहरु और अम्बेडकर दोनों के लिए अनुचित है. " शंकर एक सम्मानित कार्टूनिस्ट के रूप में राजनीति के व्यंग को समझते थे. कार्टून इस बात  की ताईद करता है कि डॉ. आंबेडकर संविधान के निर्माता और खेवट थे यद्यपि नेहरु चिंतित दिखाई पड़ते हैं . इस में किसी के लिए कुछ भी अपमानजनक नहीं है. डॉ. आंबेडकर सबसे पहले इस कार्टून का व्यंग और समानुभूति पहचान लेते." कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यह कार्टून संभवतया १९४९ में पहली वार छ्पा था जब डॉ. आंबेडकर जीवित थे परन्तु उन्होंने तो इस पर कोई आपत्ति नहीं की  थी तो फिर अब इस पर आपत्ति क्यों?

आइये अब इस कार्टून पर चर्चा की जाए. उक्त कार्टून प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट  केशव  शंकर पिल्लै दुआरा बनाया गया था. इस में संविधान निर्माण की गति पर व्यंग किया गया है. इस में डॉ. आंबेडकर संविधान रुपी घोंघे प़र चाबुक लेकर उसे आगे बढ़ाते हुए दिखाई देते है. उनके पीछे नेहरु भी चाबुक लेकर घोंघे को  आगे बढ़ाने की मुद्रा में दिखाए गए हैं.  कार्टून में जनता इसे देखते हुए दिखाई गई है. इस कार्टून  के माध्यम से छात्रों  से यह पूछा गया है कि संविधान निर्माण में इतना समय क्यों लगा?  इस कार्टून के बगल में संविधान निर्माण की प्रक्रिया का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है. अब अगर इसे बिना किसी पूर्वाग्रह के देखा जाए तो इस में कुछ भी आपत्तिजनक दिखाई नहीं देता है. परन्तु फिर भी इस पर कुछ अति उत्साही व्यक्तियों खास करके  कुछ दलित राजनेताओं दुआरा  यह कह क़र कि यह  डॉ. आंबेडकर  के लिए अपमानजनक है,  बवाल खड़ा किया. अब यह चुनाव तंत्र का गणित नहीं तो और क्या है? इस में कुछ लोगों ने यह दिखाने कि कोशिश कि है कि वे डॉ. आंबेडकर और दलितों के बहुत बड़े हितैषी हैं. अब अगर इस पूरे हंगामे के पीछे की राजनीति और इस से उपजे खतरों को देखा जाए तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहुत बड़ी चोट है. इस से हमारे समाज में पहले से व्याप्त फासीवाद और कट्टरपंथ  को और ताकत मिली है. हम जानते हैं कि इस से पहले किस प्रकार हिन्दू और मुस्लिम कट्टरपंथी शिवाजी पर पुस्तक और सलमान रुश्दी की पुस्तक प़र बवाल खड़ा कर उन्हें जब्त करवा चुके हैं. इसी प्रकार विभिन्न अवसरों पर सांस्कृतिक पुलिस लोगों पर कहर ढाती रही है. आज हालत यह है कि इस बढ़ते फासीवादी और कट्टरपंथी  रुझान के कारण लोग सही बात कहने से भी डरने लगे हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दिन बदिन ख़तम होती जा रही है जो कि लोकतंत्र की बुनियाद है.
यदि इतिहास को देखा जाये तो यह पाया जाता है कि दलित  बोलने की स्वतंत्रता से सबसे अधिक वंचित रहे हैं. अब तक वे चुप्पी का सब से बड़ा शिकार रहे हैं. अतः उनके लिए इस स्वतंत्रता को बनाये रखना सब से अधिक महत्वपूर्ण काम  है. अगर हाल में वाराणसी में बौद्ध पूर्णिमा पर घटी घटना को देखा जाए तो इस से दलितों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  के लिए आसन्न खतरों का आभास होता है. इस वर्ष ६ मई को वाराणसी में कचहरी  स्थित डॉ. अम्बेद्कार की प्रतिमा पर बौद्ध जयंती का आयोजन किया गया था. वहां पर आयोजकों  ने बुद्ध के साथ डॉ. आंबेडकर और पेरियार के चित्र भी लगाये थे. इन में से डॉ. आंबेडकर के चित्र  के नीचे  "हम हिन्दू नहीं हैं" और पेरियार के चित्र के नीचे  " हिन्दू देवी देवताओं में विशवास मत करो. " लिखा था. इस को देखने से आप को  कुछ भी आपत्तिजनक दिखाई नहीं देगा परन्तु इस पर भी  हिन्दू वाहिनी के कुछ लोगों दुआरा आपत्ति की गयी और इस की शिकायत जिला प्रशासन से की गयी. इस पर जिला प्रशासन ने  आयोजकों  के विरोध को नज़र अंदाज़ करते हुए वहां से उन दोनों चित्रों को हटवा दिया  और तभी वहां पर बौद्ध जयंती का कार्यक्रम संपन्न हो सका. यद्यपि  इस घटना की थोड़ी चर्चा  कुछ स्थानीय समाचार पत्रों में हुयी परन्तु विरोध करने वाले अपने मकसद में सफल हो गए.  इस छोटी सी घटना से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि दलितों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कितना बड़ा खतरा है. अतः इस अधिकार को बचाना न केवल दलितों बल्कि सभी के लिए बहुत महत्वपूर्ण  है.

हम लोग इस से  भी अवगत हैं कि महाराष्ट्र में कुछ वर्ष पूर्व किस प्रकार बाबा साहेब की पुस्तक "रिडल्स इन हिन्दुइज्म" को लेकर आपत्तियां की गयी थीं और यह पुस्तक तभी बच सकी थी  जब इस के समर्थन में बम्बई में दलितों दुआरा एक बहुत बड़ा प्रदर्शन आयोजित किया गया. इस समय बाबा साहेब के कार्टून को लेकर जो बवाल किया गया है उससे न तो बाबा साहेब का ही सम्मान बढ़ा है न ही दलितों का. इस के उल्ट दलितों ने जाने अनजाने अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता को नुक्सान ही पहुँचाया है और फासीवादी और कट्टरपंथी ताकतों को ही मज़बूत किया है. अब अगर कल को बाबा साहेब के  हिन्दू धर्म के विरुद्ध और बौद्ध धर्म के पक्ष में विचारों  को लेकर हिन्दुत्ववादियों दुआरा आपत्ति करके पाठ्य पुस्तकों में से इस के निकाले  जाने  की मांग शुरू हो जाये तो दलितों के पास इस का क्या जवाब होगा.  यदि  कट्टरपंथी बाबा साहेब की कुछ पुस्तकों को आपतिजनक कह कर ज़ब्त करने की मांग करने लगें तो दलित इस का विरोध किस आधार पर कर पाएंगे. अतः मेरे विचार में बाबा साहेब के कार्टून प़र  अनावश्यक आपत्ति उठाकर उसे पुस्तक में से निकलवाने से दलितों का कोई  भला नहीं हुआ है बल्कि इस से तानाशाही और कट्टरपंथी ताकतें ही मज़बूत हुई हैं.

 डॉ. आंबेडकर अभिवयक्ति की स्वतंत्रता के बहुत बड़े समर्थक थे.  एक बहस के दौरान बाबा साहेब ने  वाल्टेयर  को उधृत करते हुए कहा था, "मैं आप से सहमत न होते हुए भी आप के ऐसा कहने के अधिकार की आखरी साँस तक रक्षा करूँगा." मुझे विश्वास है कि अगार आज बाबा साहेब जीवित होते तो वे  अपने कार्टून के मामले में कुछ दलित नेताओं दुआरा राजनीति करके अभिव्यक्ति  की स्वंतत्रता की की गई क्षति  तथा फासीवादी और कट्टरपंथी ताकतों को मज़बूत करने  की  दिशा में की गयी कार्रवाई को कतई पसंद नहीं करते.

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