भारत में आसन्न आर्थिक संकट की प्रकृति और इसके संभावित प्रभाव
एस आर दारापुरी आई.पी.एस. (से.नि.)
प्रस्तावना
वर्तमान समय में भारत को विश्व की सबसे तेज़ी से विकसित होती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। सरकारी वक्तव्यों, कॉरपोरेट रिपोर्टों तथा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा भारत की उच्च जीडीपी वृद्धि दर, विस्तृत डिजिटल अर्थव्यवस्था, आधारभूत संरचना में बढ़ते निवेश तथा वैश्विक प्रभाव को निरंतर रेखांकित किया जाता है। भारत को एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जो भविष्य में चीन के विकल्प के रूप में वैश्विक विनिर्माण और निवेश का केंद्र बन सकता है।
किन्तु इस आशावादी परिदृश्य के पीछे अनेक गहरे संरचनात्मक अंतर्विरोध विद्यमान हैं, जो एक गंभीर आर्थिक संकट के उभरने की ओर संकेत करते हैं। भारत में आने वाला आर्थिक संकट श्रीलंका या अर्जेंटीना जैसे देशों की तरह अचानक वित्तीय पतन का रूप शायद न ले, क्योंकि भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार, विविधीकृत अर्थव्यवस्था तथा अपेक्षाकृत स्थिर बैंकिंग प्रणाली मौजूद है। फिर भी देश एक दीर्घकालिक और जटिल संरचनात्मक संकट की ओर बढ़ रहा है, जिसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं—बेरोज़गारी, कृषि संकट, क्रय-शक्ति में गिरावट, बढ़ती असमानता, श्रम का असंगठितीकरण तथा वित्तीय दबाव।
इस संकट का मूल विरोधाभास यह है कि एक ओर अर्थव्यवस्था उच्च वृद्धि दर प्रदर्शित कर रही है, जबकि दूसरी ओर समाज के बड़े हिस्से की आर्थिक स्थिति लगातार असुरक्षित होती जा रही है। इसलिए यह संकट केवल अस्थायी या चक्रीय नहीं, बल्कि भारत के विकास मॉडल में निहित गहरी संरचनात्मक समस्याओं का परिणाम है। यदि इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो भारत आर्थिक अस्थिरता, सामाजिक तनाव तथा राजनीतिक ध्रुवीकरण के लंबे दौर में प्रवेश कर सकता है।
उभरते आर्थिक संकट की प्रकृति
रोजगारविहीन विकास
भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक “रोजगारविहीन विकास” (Jobless Growth) है। यद्यपि भारत निरंतर उच्च जीडीपी वृद्धि दर दर्ज कर रहा है, परंतु इसके अनुरूप रोजगार सृजन नहीं हो रहा। आर्थिक विकास बड़ी संख्या में सुरक्षित और उत्पादक नौकरियाँ उत्पन्न करने में विफल रहा है, विशेषकर युवाओं के लिए।
भारत की विशाल श्रमशक्ति का अधिकांश भाग आज भी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है, जहाँ वेतन कम, रोजगार असुरक्षित तथा सामाजिक सुरक्षा का अभाव है। शिक्षित युवा भी बेरोज़गारी और अल्परोज़गारी की समस्या से जूझ रहे हैं। लाखों लोग अपनी योग्यता से असंबद्ध अस्थायी, संविदात्मक या कम वेतन वाली नौकरियाँ करने को विवश हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म आधारित “गिग अर्थव्यवस्था” ने श्रम की अस्थिरता को और बढ़ा दिया है। इससे आर्थिक विकास और रोजगार के बीच गंभीर असंतुलन उत्पन्न हो गया है। यदि बढ़ती आकांक्षाओं वाले युवाओं को पर्याप्त अवसर नहीं मिलते, तो यह सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का कारण बन सकता है।
मांग और क्रय-शक्ति का संकट
भारतीय अर्थव्यवस्था की दूसरी बड़ी समस्या घरेलू मांग का कमजोर होना है। किसी भी अर्थव्यवस्था का सतत विकास तभी संभव है, जब आम जनता की क्रय-शक्ति बढ़े। किंतु भारत में महँगाई, स्थिर वेतन, बेरोज़गारी तथा जीवन-यापन की बढ़ती लागत ने जनता की उपभोग क्षमता को कमजोर कर दिया है।
खाद्य पदार्थों, ईंधन, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा परिवहन की लागत में तीव्र वृद्धि हुई है। इसके विपरीत मजदूरी और वेतन वृद्धि महँगाई की दर के अनुरूप नहीं हुई। ग्रामीण आय विशेष रूप से दबाव में है। परिणामस्वरूप बड़ी आबादी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संघर्ष कर रही है।
यह स्थिति एक दुष्चक्र को जन्म देती है। जब आम लोग कम खर्च करते हैं, तो उद्योगों की मांग घटती है। मांग घटने पर निवेश और रोजगार सृजन में कमी आती है, जिससे क्रय-शक्ति और अधिक कमजोर हो जाती है। इस प्रकार मांग का संकट आर्थिक मंदी का कारण भी बनता है और परिणाम भी।
कृषि संकट और ग्रामीण संकट
भारतीय कृषि क्षेत्र आज भी अर्थव्यवस्था का सबसे कमजोर पक्ष बना हुआ है। यद्यपि बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, फिर भी राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान लगातार घट रहा है। किसान कम लाभ, बढ़ते कर्ज, छोटी जोतों, जलवायु परिवर्तन और बाजार की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं।
बीज, खाद, बिजली, सिंचाई और डीज़ल जैसी कृषि लागतों में निरंतर वृद्धि हुई है, जबकि किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। जलवायु परिवर्तन ने सूखा, बाढ़, अनियमित मानसून और अत्यधिक तापमान जैसी समस्याओं को बढ़ा दिया है।
ग्रामीण संकट का व्यापक प्रभाव संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है, क्योंकि ग्रामीण आय में गिरावट से उपभोग मांग घटती है और शहरों की ओर पलायन बढ़ता है। हाल के किसान आंदोलनों ने इस असंतोष की गहराई को स्पष्ट कर दिया है।
बाहरी निर्भरता और वैश्विक आर्थिक दबाव
भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक आर्थिक परिवर्तनों और बाहरी झटकों के प्रति भी संवेदनशील है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए बड़े पैमाने पर आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है। अतः अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में वृद्धि सीधे महँगाई, परिवहन लागत और वित्तीय दबाव को बढ़ाती है।
पश्चिम एशिया में युद्ध या वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान भारत की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं। तेल कीमतों में वृद्धि व्यापार घाटे और रुपये पर दबाव को बढ़ाती है। मुद्रा का अवमूल्यन आयात को महँगा बनाता है और महँगाई को और तीव्र करता है।
वैश्विक मंदी भारतीय निर्यात, विदेशी निवेश तथा सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र को भी प्रभावित कर सकती है। चूँकि भारत अब वैश्विक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ चुका है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय संकटों का प्रभाव देश के भीतर तेजी से महसूस किया जाता है।
राजकोषीय संकट और सार्वजनिक ऋण
केंद्र और राज्य सरकारें दोनों ही बढ़ते वित्तीय दबाव का सामना कर रही हैं। आधारभूत संरचना परियोजनाओं, कल्याणकारी योजनाओं, सब्सिडी, रक्षा व्यय और ऋण भुगतान के कारण सरकारी खर्च बढ़ रहा है। दूसरी ओर बेरोज़गारी और धीमी आय वृद्धि के कारण कर-संग्रह अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पा रहा।
कोविड-19 महामारी के बाद यह संकट और गहरा गया। महामारी के दौरान सरकारों को राहत और कल्याणकारी खर्च बढ़ाना पड़ा, जबकि आर्थिक गतिविधियाँ धीमी पड़ गईं। कई राज्य सरकारें आज भारी ऋण बोझ और सीमित वित्तीय क्षमता से जूझ रही हैं।
कॉरपोरेट क्षेत्र को दी गई कर छूटों और प्रोत्साहनों ने भी राजकोषीय दबाव बढ़ाया है। आलोचकों का मत है कि कॉरपोरेट लाभ बढ़ने के बावजूद रोजगार और मजदूरी में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई।
बढ़ती आर्थिक असमानता
भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान दिशा की सबसे गंभीर विशेषता तीव्र होती आर्थिक असमानता है। आर्थिक विकास का लाभ मुख्यतः बड़े कॉरपोरेट समूहों, वित्तीय पूँजी और उच्च आय वर्गों तक सीमित रहा है, जबकि विशाल श्रमिक वर्ग आर्थिक असुरक्षा का सामना कर रहा है।
एक छोटा सा वर्ग राष्ट्रीय संपत्ति के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखता है, जबकि करोड़ों लोग बेरोज़गारी, कम आय, कुपोषण, खराब स्वास्थ्य सेवाओं और निम्न शिक्षा स्तर जैसी समस्याओं से ग्रस्त हैं। क्षेत्रीय असमानताएँ भी बढ़ रही हैं।
अत्यधिक असमानता सामाजिक एकता और लोकतांत्रिक स्थिरता को कमजोर करती है। जब विकास का लाभ समाज के अधिकांश हिस्से तक नहीं पहुँचता, तो जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास कमजोर होने लगता है।
संकट के संरचनात्मक कारण
कमजोर विनिर्माण आधार
भारत चीन, दक्षिण कोरिया या वियतनाम की तरह श्रम-प्रधान औद्योगिकीकरण विकसित नहीं कर पाया। विनिर्माण क्षेत्र पर्याप्त रोजगार उत्पन्न करने में विफल रहा है। अर्थव्यवस्था अत्यधिक सेवा-क्षेत्र पर निर्भर हो गई है, जबकि उच्च कौशल आधारित सेवाओं तक बड़ी आबादी की पहुँच नहीं है।
श्रम का असंगठितीकरण
भारत की अधिकांश श्रमशक्ति असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। श्रमिकों के पास नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, स्वास्थ्य सुविधाएँ तथा सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार नहीं है। इससे मजदूरी दबती है और आर्थिक स्थिरता कमजोर होती है।
नीतिगत झटके और आर्थिक कुप्रबंधन
नोटबंदी ने असंगठित क्षेत्र, छोटे व्यापारों और दिहाड़ी मजदूरों को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इसी प्रकार वस्तु एवं सेवा कर (GST) के प्रारंभिक क्रियान्वयन ने छोटे और मध्यम उद्योगों को कठिनाइयों में डाल दिया। कोविड-19 लॉकडाउन ने बेरोज़गारी और गरीबी को और बढ़ाया।
कॉरपोरेट केंद्रीकरण और वित्तीयकरण
आर्थिक उदारीकरण के बाद कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों के हाथों में आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण बढ़ा है। छोटे उद्योग पूँजी, ऋण और बाजार प्रतिस्पर्धा में पिछड़ते जा रहे हैं। अर्थव्यवस्था में वित्तीय सट्टेबाज़ी का महत्व बढ़ा है, जबकि रोजगार सृजनकारी निवेश अपेक्षाकृत कम हुआ है।
संकट का संभावित प्रभाव
बढ़ती बेरोज़गारी और सामाजिक असंतोष
युवा बेरोज़गारी भारत की सबसे विस्फोटक समस्या बन सकती है। शिक्षित बेरोज़गारी सामाजिक निराशा और असंतोष को जन्म देती है। यदि आकांक्षाएँ बढ़ती रहें और अवसर सीमित रहें, तो सामाजिक तनाव और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है।
अस्थायी और असुरक्षित रोजगार का विस्तार
भविष्य में रोजगार बढ़ने पर भी अधिकांश नौकरियाँ अस्थायी, संविदात्मक और कम वेतन वाली हो सकती हैं। इससे मध्यवर्गीय स्थिरता कमजोर होगी और व्यापक आर्थिक असुरक्षा पैदा होगी।
महँगाई और जीवन स्तर में गिरावट
खाद्य पदार्थों, ईंधन और आवश्यक सेवाओं की बढ़ती कीमतें आम जनता की वास्तविक आय को कम करेंगी। गरीब और निम्न मध्यवर्ग सबसे अधिक प्रभावित होंगे।
राजनीतिक ध्रुवीकरण और अधिनायकवादी प्रवृत्तियाँ
आर्थिक संकट अक्सर पहचान-आधारित राजनीति, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और केंद्रीकृत सत्ता को बढ़ावा देता है। आर्थिक असंतोष को सामाजिक संघर्षों की ओर मोड़ा जा सकता है, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर पड़ सकती हैं।
संघीय ढाँचे पर दबाव
राज्यों और केंद्र के बीच कर-वितरण, ऋण लेने की सीमाओं तथा कल्याणकारी व्यय को लेकर तनाव बढ़ सकता है। आर्थिक रूप से कमजोर राज्य अधिक गंभीर संकट का सामना करेंगे।
उपसंहार
भारत में उभरता हुआ आर्थिक संकट मूलतः असमान और बहिष्कारी विकास मॉडल का परिणाम है। उच्च जीडीपी वृद्धि और कॉरपोरेट लाभ के बावजूद अर्थव्यवस्था की बुनियादी समस्याएँ—बेरोज़गारी, कृषि संकट, कमजोर क्रय-शक्ति, श्रम असुरक्षा और बढ़ती असमानता—लगातार गहराती जा रही हैं।
भारत के पास विशाल घरेलू बाजार, विदेशी मुद्रा भंडार, तकनीकी क्षमता तथा विविधीकृत अर्थव्यवस्था जैसी महत्वपूर्ण शक्तियाँ मौजूद हैं। इसलिए तत्काल आर्थिक पतन की संभावना कम है। किंतु यदि आर्थिक विकास रोजगार, सामाजिक न्याय और जनकल्याण से कटकर चलता रहा, तो दीर्घकालिक स्थिरता संभव नहीं होगी।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल आर्थिक वृद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसी समावेशी और न्यायपूर्ण विकास व्यवस्था स्थापित करना है, जो रोजगार सृजन करे, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए, श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और आर्थिक असमानता को कम करे।
यदि ऐसा नहीं हुआ, तो भारत “उच्च-वृद्धि अस्थिरता” (High-Growth Instability) के उस दौर में प्रवेश कर सकता है, जहाँ आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक संकट और राजनीतिक तनाव भी निरंतर बढ़ते रहेंगे।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें