शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

मायावती की सर्वजन राजनीति ने दलितों के आंबेडकरवादी राजनीतिक, सामाजिक और बौद्ध आंदोलनों के साथ क्या किया?

 

मायावती की सर्वजन राजनीति ने दलितों के आंबेडकरवादी राजनीतिक, सामाजिक और बौद्ध आंदोलनों के साथ क्या किया?

एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

            

मायावती का भारतीय राजनीति में उदय दलित इतिहास का एक असाधारण क्षण था। एक दलित महिला का देश के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री बनना सत्ता, सम्मान और दृश्यता का प्रतीक था। कांशीराम द्वारा स्थापित बहुजन राजनीतिक ढाँचे के अंतर्गत मायावती की राजनीति ने चुनावी एकीकरण, प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक नियंत्रण पर विशेष बल दिया।

किन्तु इन उपलब्धियों के साथ-साथ, मायावती की बहुजन राजनीति ने आंबेडकरवादी राजनीतिक, सामाजिक और बौद्ध आंदोलनों पर गहरे और दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव भी डाले। राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ा, परंतु आंबेडकरवाद के वैचारिक, सामाजिक सुधारक और नैतिक-धार्मिक आयाम कमजोर होते चले गए। यह आलेख इन प्रभावों का तीन स्तरों—राजनीतिक, सामाजिक और बौद्ध—पर आलोचनात्मक विश्लेषण करता है।

1. आंबेडकरवादी राजनीतिक आंदोलन पर प्रभाव

1.1 रूपांतरकारी राजनीति से सत्ता-केन्द्रित शासन तक

डॉ. आंबेडकर के लिए राजनीतिक सत्ता सामाजिक लोकतंत्र—स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—की स्थापना का साधन थी। मायावती के शासनकाल में आंबेडकरवादी राजनीति धीरे-धीरे सत्ता-केन्द्रित होती गई, जहाँ चुनावी सफलता और प्रशासनिक स्थिरता वैचारिक संघर्ष से अधिक महत्वपूर्ण हो गई।

उनका शासन मुख्यतः निम्न माध्यमों से संचालित हुआ: नौकरशाही नियंत्रण’ कल्याणकारी योजनाएँ एवं प्रतीकात्मक राजनीति परंतु जाति उन्मूलन, संवैधानिक नैतिकता और सामाजिक लोकतंत्र जैसे आंबेडकरवादी प्रश्न पीछे छूटते गए। परिणामस्वरूप दलित राजनीति दृश्य तो हुई, पर वैचारिक रूप से दुर्बल

1.2 केंद्रीकरण और आंतरिक लोकतंत्र का क्षय

मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी एक अत्यधिक केंद्रीकृत संगठन बन गई: नेतृत्व व्यक्तिनिष्ठ हो गया, आंतरिक विमर्श हतोत्साहित हुआ और स्वतंत्र आंबेडकरवादी विचारकों और कैडर नेताओं को हाशिए पर डाल दिया गया

आंबेडकर ने शिक्षा, बहस और सामूहिक नेतृत्व को लोकतंत्र की आत्मा माना था। इनके अभाव में जब बसपा  का चुनावी पतन हुआ, तो आंदोलन के पास न वैचारिक ऊर्जा बची, न वैकल्पिक नेतृत्व।

1.3 आंबेडकरवाद का चुनावीकरण

आंबेडकरवादी राजनीति धीरे-धीरे बसपा  के चुनावी प्रदर्शन तक सीमित हो गई। राजनीतिक चेतना चुनावों के साथ बढ़ती-घटती रही। जब पार्टी कमजोर पड़ी, तो आंबेडकरवादी राजनीति भी बिखर गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि स्वतंत्र वैचारिक संस्थानों का अभाव था।

2. आंबेडकरवादी सामाजिक आंदोलन पर प्रभाव

2.1 संरचनात्मक सुधार के बिना प्रतीकात्मक सशक्तिकरण

मायावती की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रतीकात्मक राजनीति रही जिसमें आंबेडकर व दलित महापुरुषों की मूर्तियाँ, स्मारक और पार्क एवं सार्वजनिक स्थलों पर दलित इतिहास की उपस्थिति मुख्य थी।

इससे सम्मान और आत्मगौरव की पुनर्स्थापना हुई। लेकिन इसके साथ-साथ: जन-आधारित शैक्षिक आंदोलन, भूमि सुधार, कानूनी साक्षरता एवं जातीय अत्याचारों के विरुद्ध निरंतर संघर्ष जैसे कार्यक्रम नहीं विकसित किए गए। परिणामस्वरूप सामाजिक परिवर्तन राज्य-निर्भर और अस्थायी बना रहा।

2.2 जमीनी सामाजिक संघर्षों का अवमूल्यन

स्वतंत्र दलित सामाजिक आंदोलनों को अक्सर चुनावी अनुशासन के अधीन कर दिया गया। आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और स्वायत्त संघर्षों को राजनीतिक असुविधा मानकर सीमित किया गया।

इससे: दलित समस्याओं के समाधान को प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित कर दिया गया, सामुदायिक सक्रियता कमजोर हुई एवं दलित जनता सक्रिय कर्ता से निष्क्रिय लाभार्थी में बदलती गई । यह स्थिति आंबेडकर की “स्व-संघर्ष” की अवधारणा के विपरीत थी।

2.3 सामाजिक चेतना का विखंडन

ऊपर सत्ता में प्रतिनिधित्व के बावजूद, नीचे समाज में: जातिगत अपमान, पृथक्करण तथा स्कूलों व गाँवों में भेदभाव जैसी समस्याओं के विरुद्ध सतत राजनीतिक संघर्ष नहीं हुआ। इससे राजनीतिक सत्ता और सामाजिक यथार्थ के बीच गहरी खाई बनी।

3. आंबेडकरवादी बौद्ध आंदोलन पर प्रभाव

3.1 नवयान बौद्ध धर्म का हाशियाकरण

आंबेडकर के लिए बौद्ध धर्म परिवर्तन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत क्रांति था—जाति-धर्म का अस्वीकार और नई नैतिक व्यवस्था की स्थापना।

परंतु मायावती की राजनीति में बौद्ध धर्म: चुनावी रूप से लाभकारी नहीं माना गया, OBC-हिंदू गठबंधनों के लिए जोखिम समझा गया जिसके फलस्वरूप: बौद्ध शिक्षा संस्थानों को समर्थन नहीं मिला, बड़े स्तर पर धर्मांतरण अभियान नहीं चले एवं बौद्ध बौद्धिक परंपरा ठहराव का शिकार हो गई।

3.2 आंबेडकर की धार्मिक आलोचना का नरमीकरण

राजनीतिक विमर्श में आंबेडकर को: संविधान निर्माता, दलित प्रतीक एवं राष्ट्रीय सुधारक के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि हिंदू धर्म की उनकी कट्टर आलोचना और बौद्ध धर्म को अपनाने की क्रांतिकारी दृष्टि को कमतर किया गया। इससे आंबेडकर स्वीकार्य तो बने, पर उनकी वैचारिक धार कुंद हो गई

3.3 नैतिक-दार्शनिक आधार का क्षरण

आंबेडकरवादी बौद्ध धर्म ने दलित राजनीति को: नैतिक अनुशासन, तर्कवादी चेतना एवं सार्वभौमिक मानवतावाद प्रदान किया था। इसके हाशियाकरण से राजनीति में नैतिक रिक्तता पैदा हुई, जिसे: चुनावी अवसरवाद, लोकलुभावन कल्याण एवं व्यक्तिपूजा ने भर दिया।                                                    

4. व्यापक परिणाम

4.1 आंबेडकरवादी परंपरा का विखंडन

आंबेडकरवाद—जो कभी राजनीति, समाज सुधार और नैतिक पुनर्निर्माण का एकीकृत प्रकल्प था—खंडित हो गया। राजनीति बिना विचारधारा, सामाजिक दावे बिना निरंतर सुधार एवं बौद्ध धर्म बिना संस्थागत समर्थन के रह गया जिससे दलित मुक्ति की दीर्घकालिक क्षमता कमजोर पड़ी।

4.2 नए आंबेडकरवादी आंदोलनों का उदय

मायावती मॉडल की सीमाओं के कारण ही: ,दलित छात्र आंदोलन, भीम आर्मी जैसे संगठन एवं स्वतंत्र आंबेडकरवादी बौद्धिक मंच उभरे, जो शिक्षा, संवैधानिक अधिकार और सामाजिक संघर्ष पर अधिक बल देते हैं।

निष्कर्ष

मायावती की बहुजन राजनीति ने दलितों को ऐतिहासिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रतीकात्मक सम्मान अवश्य दिया। यह उपलब्धि महत्वपूर्ण और अस्वीकार्य नहीं है। परंतु इसकी कीमत आंबेडकरवादी राजनीतिक, सामाजिक और बौद्ध आंदोलनों की वैचारिक क्षति के रूप में चुकानी पड़ी।

चुनावी सत्ता को विचारधारा से ऊपर रखना, प्रतीक को संरचना से ऊपर रखना, और व्यवहारिकता को नैतिक-धार्मिक परिवर्तन से ऊपर रखना—इन सबने: स्वायत्त सामाजिक आंदोलनों को कमजोर किया, बौद्ध धर्म को हाशिए पर डाला एवं आंबेडकरवाद को चुनावी पहचान तक सीमित कर दिया

आंबेडकर की मुक्ति-कल्पना त्रि-आयामी थी—राजनीतिक सत्ता, सामाजिक समानता और नैतिक-धार्मिक पुनर्निर्माण। मायावती ने पहले आयाम को सशक्त किया, पर शेष दो की उपेक्षा की। भविष्य की दलित राजनीति का दायित्व है कि वह इस असंतुलन को सुधारे—अन्यथा राजनीतिक उपलब्धियाँ क्षणिक और प्रतिवर्ती बनी रहेंगी।

मायावती के अवसरवादी गठबंधनों ने बीजेपी–हिंदुत्व को कैसे पुनः सशक्त किया और दलितों को कैसे भ्रमित किया

 

मायावती के अवसरवादी गठबंधनों ने बीजेपीहिंदुत्व को कैसे पुनः सशक्त किया और दलितों को कैसे भ्रमित किया

एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

मायावती का राजनीतिक सफ़र दलित राजनीति में एक साथ उपलब्धि और विरोधाभास का प्रतीक है। एक दलित महिला का बार-बार मुख्यमंत्री बनना ऐतिहासिक राजनीतिक सशक्तिकरण का प्रतीक था। किंतु उनके अवसरवादी गठबंधनों—विशेषकर BJP के साथ—ने दीर्घकालिक वैचारिक परिणाम उत्पन्न किए, जिनसे हिंदुत्व की राजनीति सशक्त हुई और दलित राजनीतिक चेतना दिशाहीन हुई

इन गठबंधनों को अक्सर व्यावहारिक या रणनीतिक मजबूरी बताकर उचित ठहराया गया, लेकिन वस्तुतः उन्होंने दलित नेतृत्व और उस राजनीतिक विचारधारा के बीच सहयोग को सामान्य बना दिया जो मूलतः आंबेडकरवादी मूल्यों के प्रतिकूल है। यह आलेख तर्क देता है कि मायावती की गठबंधन राजनीति ने अप्रत्यक्ष रूप से BJP–हिंदुत्व को वैधता दी, वैचारिक प्रतिरोध को कमजोर किया, दलित एकता को खंडित किया और दलित मुक्ति की नैतिक दिशा को भ्रमित किया।

1. बीजेपी को “स्वीकार्य राजनीतिक साझेदार” के रूप में स्थापित करना

1.1 आंबेडकरवादी नैतिक सीमा का उल्लंघन

आंबेडकरवादी राजनीति ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मणवाद और हिंदू बहुसंख्यकवाद को दलित मुक्ति का संरचनात्मक शत्रु मानती रही है। उत्तर प्रदेश में मायावती द्वारा बीजेपी  के साथ किए गए बार-बार के गठबंधनों (1995, 1997, 2002) ने इस नैतिक सीमा को तोड़ दिया

जब BJP को वैचारिक विरोधी के बजाय एक सौदेबाज़ सहयोगी के रूप में प्रस्तुत किया गया, तो: हिंदुत्व दलित राजनीतिक कल्पना में सामान्यीकृत हो गया, जाति-विरोधी संघर्ष सत्ता-साझेदारी तक सीमित हो गया तथा  बीजेपी  को दलित समाज के कुछ वर्गों में वैधता मिली। यह हिंदुत्व के लिए एक बड़ा वैचारिक लाभ था, वह भी बिना अपने मूल सिद्धांत बदले।

1.2 हिंदुत्व की “नैतिक धुलाई” (Moral Laundering)

दलित नेतृत्व वाली पार्टी के साथ सरकार बनाने से बीजेपी  को स्वयं को: समावेशी, सामाजिक न्याय समर्थक एवं  दलित आकांक्षाओं के अनुकूल दिखाने का अवसर मिला। यह एक प्रकार की नैतिक धुलाई थी, जिससे बीजेपी  की मनुस्मृति-संलग्न और जाति-आधारित वैचारिक जड़ों पर पर्दा पड़ गया। दलित नेतृत्व के सहयोग ने हिंदुत्व को ऊँची जातियों की परियोजना के रूप में चुनौती देने की क्षमता को कमजोर किया।

2. हिंदुत्व के विरुद्ध वैचारिक प्रतिरोध का क्षय

2.1 मौन ही सहमति बन गया

गठबंधन काल में BSP ने: हिंदू बहुसंख्यकवाद, आरएसएस की विचारधारा, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण एवं सांस्कृतिक एकरूपता जैसे मुद्दों पर आलोचना को सीमित कर दिया। यह मौन दलित–अल्पसंख्यक एकता को कमजोर करता गया और हिंदुत्व को वैचारिक विस्तार के लिए खुली जगह मिलती गई। हिंदुत्व केवल समर्थन से नहीं, बल्कि सिद्धांतहीन चुप्पी से भी मजबूत होता है

2.2 आंबेडकर की कट्टर धार्मिक आलोचना का पतन

डॉ. आंबेडकर की राजनीति हिंदू धर्म और जाति व्यवस्था की तीखी आलोचना पर आधारित थी। किंतु गठबंधन की मजबूरियों ने इस आलोचना को नरम और अप्रासंगिक बना दिया।

फलस्वरूप: आंबेडकर को केवल संविधान निर्माता के रूप में प्रस्तुत किया गया, उनके बौद्ध धर्मांतरण को हाशिए पर रखा गया एवं ब्राह्मणवाद-विरोधी दर्शन को विमुद्रीकृत कर दिया गया। इस वैचारिक पतन ने हिंदुत्व की सांस्कृतिक प्रभुत्व को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत किया।

3. दलित समाज में भ्रम और विखंडन

3.1 परस्पर विरोधी राजनीतिक संदेश

दलित समाज को एक साथ यह बताया गया कि: बीजेपी  उच्च जातीय वर्चस्व की प्रतिनिधि है, बीजेपी  एक आवश्यक शासन-साझेदार है एवं  बीजेपी  पर रणनीतिक रूप से भरोसा किया जा सकता है। इन विरोधाभासी संदेशों ने दलित राजनीतिक चेतना को भ्रमित किया, विशेषकर युवा पीढ़ी में। राजनीति नैतिक संघर्ष के बजाय सौदेबाज़ी प्रतीत होने लगी।

3.2 वैचारिक शिक्षा का पतन

मायावती काल में दलित राजनीतिक लामबंदी मुख्यतः चुनावी अपील, कल्याणकारी योजनाओं एवं  प्रतीकात्मक राजनीति पर आधारित रही, जबकि: आंबेडकरवादी वैचारिक शिक्षा, राजनीतिक साक्षरता एवं  कैडर प्रशिक्षण उपेक्षित किया गया। वैचारिक आधार के अभाव में अनेक दलित बीजेपी  की कल्याणकारी राजनीति, हिंदुत्व के सांस्कृतिक प्रतीक एवं पहचान-आधारित सह-अधिग्रहण के प्रति संवेदनशील हो गए।

3.3 राजनीतिक निराशा और विमुखता

 बीजेपी के साथ कभी विरोध, कभी सहयोग की नीति ने दलित मतदाताओं में: निराशा,संशय एवं राजनीतिक थकान को जन्म दिया। इससे आंबेडकरवादी राजनीति के प्रति दीर्घकालिक निष्ठा कमजोर हुई और BJP की सीधी पहुँच आसान हो गई।

4. बीजेपीहिंदुत्व के लिए रणनीतिक लाभ                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             

4.1 विस्तार के लिए समय और वैधता

मायावती के गठबंधनों ने बीजेपी को: प्रशासनिक वैधता, राजनीतिक श्वास-काल एवं  दलित समाज में पैठ बनाने का समय प्रदान किया। इस दौरान बीजेपी ने: दलित मोर्चों का विस्तार किया, आंबेडकर  के   प्रतीकों का अधिग्रहण किया,   कल्याणकारी पहुँच बढ़ाई तथा स्वतंत्र शक्ति प्राप्त करने के बाद BJP को बीजेपी की आवश्यकता नहीं रही।

बीएसपी-बीजेपी गठबंधनों ने उत्तर प्रदेश में दलित–मुस्लिम राजनीतिक एकता को कमजोर किया। इससे बीजेपी के “पैन-हिंदू” नैरेटिव को बल मिला और बहुसंख्यकवादी राजनीति को मजबूती मिली।

4.2 दलित-अल्पसंख्यक एकता का कमजोर होना

बीजेपीहिंदुत्व गठबंधन ने दलित-मुस्लिम राजनीतिक एकजुटता को तोड़ दिया, जो उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक रूप से बहुत ज़रूरी थी। इस बिखराव ने बीजेपी के पैन-हिंदू नैरेटिव को बढ़ावा दिया और बहुसंख्यकवाद विरोधी गठबंधनों को कमजोर किया।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       

दलित नेतृत्व के साथ सहयोग ने बीजेपी को: व्यवहारिक, विकासोन्मुख, एवं  जाति-पार दिखाने में मदद की। यह छवि उसके राष्ट्रीय विस्तार के लिए निर्णायक सिद्ध हुई।

5. दलित राजनीति पर दीर्घकालिक प्रभाव

5.1 वैचारिक निरस्त्रीकरण

अवसरवादी गठबंधनों ने दलित राजनीति की नैतिक स्पष्टता को क्षीण किया। आंबेडकरवाद: चुनावी प्रतीक, व्यक्ति पूजा एवं  कल्याणकारी सौदेबाज़ी तक सीमित होता गया। हिंदुत्व के विरुद्ध प्रतिरोध कमजोर और असंगत हो गया।

5.2 बीजेपी का वैचारिक विकल्प के रूप में पतन

जब बीएसपी का चुनावी पतन हुआ, तो उसके पास: वैचारिक संस्थाएँ नहीं थीं, जन-आधारित सामाजिक आंदोलन नहीं थे तथा हिंदुत्व के विरुद्ध कोई सुसंगत वैकल्पिक दृष्टि नहीं थी। इस रिक्तता को बीजेपी ने शीघ्र भर दिया।

5.3 दलित युवाओं का विमुख होना

निराश दलित युवा: छात्र आंदोलनों, अधिकार-आधारित संघर्षों तथा नए आंबेडकरवादी संगठनों की ओर मुड़ गए, जो बीएसपी की गठबंधन राजनीति की खुलकर आलोचना करते हैं।

निष्कर्ष

मायावती के अवसरवादी गठबंधनों—विशेषकर बीजेपी  के साथ—के परिणाम अल्पकालिक सत्ता से कहीं आगे तक गए। हिंदुत्व को राजनीतिक साझेदार के रूप में सामान्यीकृत करके, आंबेडकरवादी आलोचना को कमजोर करके और दलित राजनीतिक चेतना को भ्रमित करके, इन गठबंधनों ने BJP–हिंदुत्व को अप्रत्यक्ष रूप से पुनः सशक्त किया

डॉ. आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि वैचारिक स्वतंत्रता के बिना प्राप्त राजनीतिक सत्ता अंततः अधीनता में बदल जाती है। मायावती की गठबंधन राजनीति ने इस चेतावनी को सत्य सिद्ध किया। दलित मुक्ति की राजनीति को पुनः सिद्धांत, विचारधारा और जाति–हिंदुत्व प्रभुत्व के नैतिक प्रतिरोध पर आधारित होना होगा—न कि अवसरवादी अंकगणित पर।

मायावती की सर्वजन राजनीति ने दलितों के आंबेडकरवादी राजनीतिक, सामाजिक और बौद्ध आंदोलनों के साथ क्या किया?

  मायावती की सर्वजन राजनीति ने दलितों के आंबेडकरवादी राजनीतिक , सामाजिक और बौद्ध आंदोलनों के साथ क्या किया ? एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अ...