पाठ्यक्रम राजनीति, जाति-विमर्श और लोकतांत्रिक शिक्षा: एक समकालीन विमर्श
- एस आर दारापुरी आईपीएस (से.नि.)
आधुनिक राष्ट्र-राज्य में शिक्षा केवल ज्ञान प्रदान करने का साधन नहीं, बल्कि नागरिकता निर्माण की प्रक्रिया है। विद्यालयी पाठ्यपुस्तकें यह निर्धारित करती हैं कि नई पीढ़ी अपने अतीत, समाज और राज्य को किस दृष्टि से समझेगी। इसलिए पाठ्यक्रम-निर्माण मूलतः एक राजनीतिक और नैतिक प्रक्रिया है। भारत जैसे बहुस्तरीय समाज में, जहाँ जाति ऐतिहासिक रूप से सामाजिक संरचना का केंद्रीय तत्व रही है, वहाँ जाति और जाति-आधारित भेदभाव का शैक्षणिक निरूपण लोकतांत्रिक शिक्षा की गुणवत्ता का मानक बन जाता है।
हाल के वर्षों में National Council of Educational Research and Training (एनसीईआरटी) द्वारा किए गए पाठ्यपुस्तक संशोधनों ने इस विषय पर व्यापक बहस को जन्म दिया है। विशेष रूप से Our Pasts, Social and Political Life तथा Indian Society जैसी पुस्तकों में जाति-आधारित भेदभाव, अस्पृश्यता और सामाजिक बहिष्करण से संबंधित अंशों के विलोपन या संक्षेपण को लेकर गंभीर प्रश्न उठे हैं। आधिकारिक तौर पर इन परिवर्तनों को “सिलेबस भार कम करने” की प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया। किंतु आलोचकों का मत है कि यह मात्र तकनीकी संपादन नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ के पुनर्निर्माण का प्रयास है।
लोकतांत्रिक शिक्षा का मूल उद्देश्य आलोचनात्मक चेतना का विकास है। जॉन ड्यूई ने लोकतंत्र को केवल शासन-पद्धति नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व की नैतिक व्यवस्था माना। लोकतंत्र तभी सशक्त हो सकता है जब नागरिक समाज की संरचनात्मक असमानताओं को समझने और उन पर प्रश्न उठाने में सक्षम हों। यदि पाठ्यक्रम सामाजिक अन्याय को सामान्यीकृत कर दे या उसके प्रत्यक्ष उदाहरणों को हटा दे, तो यह नागरिक विवेक के विकास को सीमित कर सकता है।
भारतीय संदर्भ में जाति-विमर्श को समझने के लिए B. R. Ambedkar की विचारधारा अत्यंत महत्वपूर्ण है। अंबेडकर ने जाति को “क्रमबद्ध असमानता” की व्यवस्था कहा, जिसमें सामाजिक श्रेणियाँ जन्म से निर्धारित होती हैं और व्यक्ति की स्वतंत्रता, सम्मान तथा अवसरों को नियंत्रित करती हैं। उनके अनुसार राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता जब तक सामाजिक लोकतंत्र—समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व—की स्थापना न हो। शिक्षा को उन्होंने सामाजिक मुक्ति का सबसे शक्तिशाली साधन माना। इस दृष्टि से, यदि पाठ्यपुस्तकों में जातिगत उत्पीड़न के ठोस उदाहरणों को हटाया जाता है, तो यह सामाजिक लोकतंत्र की समझ को कमजोर कर सकता है।
पूर्ववर्ती एनसीईआरटी पुस्तकों में जाति को जन्म-आधारित सामाजिक विभाजन, पेशागत प्रतिबंध, अस्पृश्यता की प्रथा और सामाजिक-आर्थिक बहिष्करण के रूप में प्रस्तुत किया गया था। विद्यार्थियों को यह बताया जाता था कि किस प्रकार दलित समुदायों को कुओं से पानी लेने, मंदिरों में प्रवेश करने या विद्यालयों में समान रूप से बैठने का अधिकार नहीं था। साथ ही, दलित आंदोलनों और सामाजिक सुधार प्रयासों का उल्लेख भी किया जाता था, जिससे यह स्पष्ट होता था कि भारतीय समाज केवल उत्पीड़न की कथा नहीं, बल्कि प्रतिरोध और परिवर्तन की भी कथा है।
हालिया संशोधनों में इन उदाहरणों का संक्षेपण या विलोपन देखा गया है। कई स्थानों पर “जाति-आधारित भेदभाव” की स्पष्ट भाषा को सामान्य शब्दों से प्रतिस्थापित किया गया है। इससे जाति की संरचनात्मक प्रकृति धुंधली पड़ जाती है और वह केवल सांस्कृतिक विविधता का एक तत्व प्रतीत होने लगती है। इस प्रकार की प्रस्तुति सामाजिक संघर्ष और अन्याय के ऐतिहासिक आयामों को कम करके दिखा सकती है।
इस परिवर्तन के लोकतांत्रिक परिणाम गंभीर हो सकते हैं। यदि छात्र जातिगत उत्पीड़न की ऐतिहासिक और सामाजिक वास्तविकताओं से अपरिचित रहेंगे, तो वे आरक्षण, सामाजिक न्याय नीतियों और संवैधानिक प्रावधानों की आवश्यकता को गहराई से नहीं समझ पाएँगे। अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता का उन्मूलन केवल विधिक प्रावधान नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय की स्वीकृति है। जब इतिहास का यह आयाम कमजोर किया जाता है, तो संवैधानिक नैतिकता की जड़ें भी कमज़ोर हो सकती हैं।
इसके अतिरिक्त, प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। वंचित समुदायों के विद्यार्थियों के लिए पाठ्यक्रम में उनके संघर्षों की उपस्थिति आत्मसम्मान और नागरिकता-बोध को सुदृढ़ करती है। यदि उनके अनुभवों को पाठ्यपुस्तकों से हटा दिया जाए, तो यह प्रतीकात्मक अदृश्यता उत्पन्न कर सकता है।
यह भी सत्य है कि पाठ्यक्रम-राजनीति केवल भारत तक सीमित नहीं है। विश्व के अनेक लोकतंत्रों में इतिहास-लेखन और पाठ्यक्रम संशोधन को लेकर विवाद होते रहे हैं। इन सभी उदाहरणों में एक साझा तत्व है—राष्ट्रीय पहचान का निर्माण और उसकी दिशा। प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्रीय एकता आलोचनात्मक आत्ममंथन से बचकर संभव है, या वह न्यायपूर्ण और आत्मविश्वासी समाज में ही स्थायी हो सकती है?
समर्थकों का तर्क है कि पाठ्यक्रम को हल्का करना आवश्यक था और संवेदनशील विषयों को आयु-उपयुक्त बनाना चाहिए। परंतु लोकतांत्रिक सिद्धांत यह संकेत देता है कि असुविधाजनक सत्य से बचना नागरिक परिपक्वता के विपरीत है। सामाजिक यथार्थ का संतुलित किंतु स्पष्ट प्रस्तुतीकरण ही विद्यार्थियों को जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बना सकता है।
अंततः, पाठ्यपुस्तक संशोधन केवल संपादकीय परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक स्मृति और राजनीतिक चेतना का पुनर्निर्माण है। यदि जाति-विमर्श को संक्षिप्त या सामान्यीकृत किया जाता है, तो इससे लोकतांत्रिक शिक्षा की आलोचनात्मक धार कुंठित हो सकती है। भारतीय लोकतंत्र की सुदृढ़ता इस पर निर्भर करेगी कि उसकी शिक्षा-प्रणाली ऐतिहासिक सत्य, सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों के प्रति कितनी प्रतिबद्ध रहती है।
लोकतांत्रिक समाज के लिए आवश्यक है कि उसकी शिक्षा-व्यवस्था न केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाए, बल्कि अपनी ऐतिहासिक कमजोरियों का ईमानदार विश्लेषण भी करे। न्यायपूर्ण भविष्य का निर्माण तभी संभव है जब अतीत की असमानताओं को स्वीकार कर उनसे सीख ली जाए।
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