शनिवार, 7 जनवरी 2017

मायावती कितनी दलित हितैषी?

      मायावती कितनी दलित हितैषी?
      - एस.आर. दारापुरी, आई.पी.एस.(से.नि) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
मायावती जी ! पिछले दिनों आप ने दलितों को मोदी जी के जुमलों से सावधान रहने की हिदायत की थी. मोदी जी के जुमलों से तो दलित सावधान हैं ही पर उन्हें आप के दलित प्रेम से भी बहुत सावधान रहने की ज़रुरत है. क्योंकि....
* आप भी तो आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की वकालत करती हैं जिस से दलितों और पिछड़ों के जाति आधारित आरक्षण पर उँगलियाँ उठती हैं.
* आप भी पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने की वकालत करती रही हैं. आप पूर्व में इस सम्बन्ध में विधान सभा से बिल पारित करा कर केंद्र सरकार को भेज चुकी हैं. यह अलग बात है कि केंद्र सरकार ने उसे रद्द कर दिया था.
* आप ने पांच साल (2007-12) में मुख्य मंत्री रहते हुए अनुसूचित जातियों के पदोन्नति में आरक्षण की बहाली हेतु इलाहबाद हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में मामले की उचित पैरवी नहीं की जिस के फलस्वरूप हजारों दलित अधिकारियों को पदावनत होना पड़ा.
* आप ने ही 2001 में मुख्य मंत्री के रूप में उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति/ जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम के लागू करने पर रोक लगा दी थी जिससे दलितों का भारी नुक्सान हुआ. आपके इस आदेश के कारण दलितों के उत्पीडन के मामले इस एक्ट के अंतर्गत दर्ज नहीं हुए जिस के फलस्वरूप न तो उन्हें कोई मुयाव्ज़ा मिल सका और न ही दोषियों को दण्डित किया जा सका.
* आप ने ही कांशी राम जी के प्रयासों से बनायीं गयी फिल्म "तीसरी आज़ादी" तथा रामास्वामी नायकर द्वारा लिखी पुस्तक "सच्ची रामायण" पर रोक लगा दी थी.
* आप ने ही स्पोर्ट्स कालेज में दलितों के आरक्षण का कुछ सवर्णों द्वारा विरोध करने पर उसे रद्द कर दिया था.
* आप ने ही सरकारी विद्यालयों में कुछ विद्यार्थियों द्वारा मध्यान्ह भोजन में कुछ दलित रसोईयों द्वारा बनाये गए भोजन का बहिष्कार करने पर दोषियों को दण्डित करने की बजाये दलितों रसोईयों  की नियुक्ति सम्बन्धी आदेश को ही रद्द कर दिया था जो कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना थी. इससे विद्यालयों में दलित रसोईयों की नियुक्तियां बंद हो गयीं और सरकारी सकूलों में छुआछूत को बढ़ावा मिला.
* आप ने ही दलितों के आवास की भूमि को उनके पक्ष में नियमित किये जाने के आदेश का सवर्णों द्वारा विरोध करने पर यह कह कर रद्द कर दिया था कि सम्बंधित अधिकारी ने आप से धोखे से दस्तखत करवा लिए थे।
* आप ने ही 2007 में उत्तर प्रदेश में आंबेडकर महासभा को कार्यालय हेतु 1991 में आंबेडकर रोड, लखनऊ में आवंटित सरकारी भवन का आवंटन रद्द करके उसे अपने मंत्री को आवास हेतु आवंटित कर दिया था जिस के विरुद्ध आंबेडकर महासभा को इलाहबाद हाई कोर्ट, लखनऊ में जनहित याचिका दायर करके स्टे लेना पड़ा था. इस प्रकार आप ने उत्तर प्रदेश में दलितों की मात्र एक संस्था को ही ख़त्म करने की कोशिश की.
* आप ने ही 2008 में लागू हुए वनाधिकार कानून के अंतर्गत वनवासियों और आदिवासियों को भूमि का मालिकाना अधिकार देने की बजाए उनके 81% दावों को रद्द कर दिया था जिस कारण उन्हें अपने कब्ज़े की ज़मीन का मालिकाना हक नहीं मिल सका। विवश हो कर आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट को इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर आदेश प्राप्त करना पड़ा था.
* आप ने ही उत्तर प्रदेश के 2% आदिवासियों के लिए विधान सभा की दो सीटें आरक्षित करने संबंधी बिल का विरोध किया था जिस कारण उन्हें 2012 के विधान सभा चुनाव में कोई भी सीट नहीं मिल सकी थी. अब आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट की सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के कारण  इस चुनाव में उनके लिए दो सीटें आरक्षित हो सकी हैं.

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