शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

दलित राजनीति को चाहिए एक नया रैडिकल विकल्प



रोहित की दर्दनाक आत्महत्या ने इस भयानक सच को उजागर किया है कि आज भी भारत में एक दलित को अपने विचारों और विश्वासों के साथ बराबरी और आज़ादी की चाह के साथ जीने की क्या कीमत चुकानी पड़ सकती है. और फिर उसके लिए न्याय की लड़ाई आज के भारत में कैसे लगभग असंभव है, एक हारी हुयी लड़ाई है.
रोहित देश के किसी गुमनाम दलित बस्ती में नहीं था वर्ना वहां से निकल कर साइब्राबाद के केन्द्रीय विश्वविद्यालय में देश की उच्चतम शिक्षा हासिल कर रहा प्रतिभाशाली नौजवान था. उसकी सांस्थानिक हत्या के खिलाफ देश में चौतरफा विरोध के स्वर उठे लेकिन सत्ता प्रतिष्ठान ने उसके लिए न्याय की लड़ाई को कुचलने  में सारी हदें पार कर दीं.
इस प्रकरण से समझा जा सकता है सुदूर गाँव की दलित बस्तियों अथवा शहरों की झुग्गियों झोंपड़ियों में रह रहे दलितों के साथ क्या हो रहा है और उन्हें कितना न्याय मिल पा रहा है.  बाबा साहेब के परिनिर्वाण के 6 दशक बाद भी दलित मुक्ति का सपना न सिर्फ अधूरा है बल्कि और जटिल चुनौतियों के रूबरू है.
दलितों के एक बेहद छोटे हिस्से को आर्थिक समृद्धि और सुरक्षा हासिल हुयी है पर उनके लिए भी अपनी जाति बताकर आज भी भारत के शहरों मे किराये पर मकान पाना आसान नहीं है. सामाजिक सम्बन्ध और बराबरी का दर्जा तो दूर की बात है. इससे भारत में जाति उन्मूलन का मिशन किस मुकाम तक पहुंचा है, समझा जा सकता है. समग्रता में दलित आज भी भारत के वर्चस्वशाली सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक ढांचे से बहिष्कृत हैं.
उनकी एक बेहद छोटी आबादी सरकारी नौकरियों के माध्यम से संगठित क्षेत्र का हिस्सा बनी है जहाँ एक स्तर की आर्थिक सुरक्षा है. और उस से भी छोटी संख्या ने निजी क्षेत्र में समृद्धि हासिल की है जो उनकी कुल आबादी की तुलना में समुद्र में बूँद के बराबर है. बाकी दलितों की  विराट बहुसंख्य बेहद कम वेतन/मजदूरी/आय पर असंगठित क्षेत्र में तरह तरह के अकुशल शारीरिक श्रम में लगी बेहद अमानवीय स्थितियों में जीने के लिए अभिशप्त है.
दलित आज कारपोरेट परस्त आर्थिक नीतियों-सरकारी क्षेत्र के ध्वंस, बढ़ते निजीकरण जहाँ आरक्षण का प्रावधान नहीं है और श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ रही हैं निजी हाथों में जाते शिक्षा-स्वास्थ्य सेवाओं की बढती कीमतों आदि के सबसे बदतरीन शिकार हैं. दलित आज पुराने ब्राह्मणवादी सामंती ढांचे के बर्बर अवशेषों तथा नए कारपोरेट पूंजीवाद के गहराते शोषण के दोहरे बोझ तले कराह रहे हैं.
आखिर रास्ता क्या है?
कैसे बनेगा नया राज और समाज जो स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारे पर आधारित होगा, जहाँ जातियां नष्ट होंगी और सब के लिए सम्मानजनक जीवन-रोज़गार, शिक्षा-स्वास्थ्य की गारंटी होगी? जाहिर है कि इसमें राज्य द्वारा संचालित नीतियों की भूमिका निर्णायक होगी.
यह दिन के उजाले की तरह साफ़ है कि भाजपा और कांग्रेस जिन ताकतों का प्रतिनिधित्व करती हैं वही दलितों की स्थिति के लिए ज़िम्मेदार हैं, इसीलिए इनसे दलितों का भला होने वाला नहीं है. हालाँकि आज दोनों ही दलित हितों का चैंपियन बनने की होड़ में लगी हैं और डॉ. आंबेडकर को अपने वैचारिक-राजनैतिक ढांचे में फिट करने और हड़पने की कोशिश कर रही हैं.
मायावती जी की वैचारिक-राजनैतिक दिशा से क्या दलितों के सामने मौजूद चुनौतियों/संकटों का समाधान होगा और अंततः दलितों की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा? इस प्रशन का जवाब इस बात पर निर्भर है कि क्या उनके पास दलितों की मौजूदा स्थिति के लिए ज़िम्मेदार नीतियों का विकल्प है? और क्या ऐसे वैकल्पिक नीतिगत ढांचे को लागू करने की इच्छाशक्ति उनके अन्दर है? दुर्भाग्यवश मायावती जी की राजनीति और शासनकाल का अनुभव इसकी गवाही नहीं देता.
यह सच है कि कांग्रेस से मोहभंग हुए दलितों को संगठित करते हुए बामसेफ, डी.एस 4 और बसपा के माध्यम से दलितों में ज़बरदस्त राजनैतिक सक्रियता सामने आई थी लेकिन मायावती की सर्वजन राजनीति समय बीतने के साथ मुख्यधारा की राजनीति में ही घुलमिल गयी. कोई अलग पहचान नहीं है, न राजनीतिक संस्कृति के स्तर पर (भ्रष्टाचार, धनबल-बाहुबल को प्रोत्साहन, व्यक्तिपूजा, अलोकतांत्रिक पार्टी संचालन, अवसरवादी गठजोड़ आदि) और न ही नीतियों के स्तर पर.
जब हाथी नहीं गणेश हैका नारा लगता है तो यह समाज में किस तरह के मूल्यबोध को स्थापित करता है? ब्राह्मणवादी प्रतीकों का उभार और जातिवादी गठजोड़ों की राजनीति समाज में गैर बराबरी पर आधारित जातिवादी ढांचे को और सोच को ही तो वैधता देती है. फलस्वरूप दलितों का जातिविहीन, बराबरी पर आधारित समाज का सपना एक कदम दूर चला जाता है. क्या डॉ. आंबेडकर ने भी कभी यह किया था? सर्वोपरी नीतियों के स्तर पर बसपा ने भाजपा-कांग्रेस की कारपोरेट परस्त आर्थिक नीतियों को ही लागू किया जिनकी सब से बड़ी मार दलितों पर ही पड़ती है.
आज सार्वजनिक क्षेत्र का ध्वंस रोके बिना और निजी क्षेत्र में आरक्षण बिना दलित श्रमिकों का भला कैसे होगा, शिक्षा-स्वास्थ्य क्षेत्र को निजी हाथों में जाने और मुनाफाखोरी का उद्योग बनने से रोके बिना दलितों को  शिक्षा, स्वास्थ्य कैसे हासिल होगा ? सीमांत-लघु कृषि के चौतरफा विकास के बिना दलित किसानों का भला कैसे होगा? मठों-महंतों-भूमिचोरों-नए कारपोरेट ज़मींदारों द्वारा हड़पी गयी ज़मीन दलित खेत मजदूरों-भूमिहीनों को दिए बिना उनका विकास कैसे होगा?
भ्रष्टाचार पर लगाम लगाये बिना, कारपोरेट घरानों को अंधाधुंध टैक्स छूट, बैंक क़र्ज़ की लूट पर रोक तथा उनके ऊपर टैक्स बढ़ाये बिना कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य औद्योगिक विकास के लिए पूँजी कहाँ से आएगी, बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा हुए बिना दलित श्रमशक्ति को रोज़गार कैसे मिलेगा? ब्राह्मणवादी-जातिवादी ताकतों, प्रतीकों, मूल्यबोध पर चोट किये बिना जाति का विनाश कैसे होगा? उनका विकास कैसे होगा?
व्यक्तिपूजा-भ्रष्टाचार-बाहुबल-अवसरवादी जातिवादी और साम्प्रदायिक गठजोड़ की राजनीतिक संस्कृति के खात्मे के बिना स्वस्थ, लोकतान्त्रिक महौल कैसे बनेगा जहाँ दलितों का सच्चा राजनीतिक प्रतिनिधित्व उभर सके और वे राज और समाज में अपना सम्मानजनक हिस्सा और स्थान प्राप्त कर सकें? ब्राह्मणवादी-सामंती-कारपोरेट पूँजी की ताकतों के खिलाफ, उनकी पोषक नीतियों के खिलाफ समझौताविहीन संघर्ष के बिना दलितों की मुक्ति कैसे होगी?
दलित हिन्दू सामाजिक पिरामिड के आखिरी पायदान पर खड़े हैं. उनकी मुक्ति में ही पूरे समाज की मुक्ति है और पूरे समाज की मुक्ति के साथ ही दलितों की मुक्ति होगी. दलित आन्दोलन का कार्यभार है कि वह एक स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के बतौर संगठित हो और सभी अन्य उत्पीड़ित शोषित तबकों को अपने साथ गोलबंद करके लोकतान्त्रिक समाज व् रेडिकल राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण करे. दलित छात्रों का आन्दोलन या देश भर में जो छात्र आन्दोलन में जो नयी जागृति दिख रही है वह इस बात को दिखा रही है कि मौजूदा राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व्यवस्था उनकी गहरी लोकतान्त्रिक आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं है. वह एक नया रास्ता बनाना चाहते हैं, नया आन्दोलन खड़ा कर रहे हैं जिससे जनपक्षीय प्रतिबद्ध लोकतान्त्रिक व्यवस्था और समाज का निर्माण हो सके.
चिंतक व भाषाविद नोम चोमस्की की भारत के संभावित राजनीतिक परिवर्तन पर टिप्पणी को दोहराना भी उचित होगा जिस में उसने 15 मई,2014 को बोस्टन में कहा था कि भारत में जो कुछ हो रहा है, वह बहुत बुरा है | भारत खतरनाक स्थिति से गुजरेगा | आर एस एस और भाजपा के नेतृत्व में जो बदलाव भारत में आने वाला है, ठीक इसी अंदाज में जर्मनी में नाजीवाद आया था | नाजी शक्तियों ने भी सस्ती व सिद्धांतहीन लोकप्रियता का सहारा लिया था | भाजपा ने भी वही हथकंडा अपनाया है | कांग्रेस पार्टी ही इन सबके लिए जिम्मेदार है | अब भारत के वामपंथी और प्रगतिशील शक्तियों को संगठित होकर इस चुनौती का सामना करना पड़ेगा |”
 आज देश को ऐसे ही एक राजनैतिक मंच की ज़रुरत है जो वैकल्पिक जनपक्षीय नीतियों, लोकतान्त्रिक मूल्यबोध और राजनीति के माध्यम से दलितों तथा पूरे समाज की मुक्ति और विकास के लिए समर्पित हो. आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) की संकल्पना ऐसे ही एक राजनैतिक मंच का निर्माण है.

आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (रेडिकल) - आइपीएफ (आर) एक जन राजनीतिक मंच है जो शोषण और हृदयहीनता से मुक्त एक मानवीय समाज के लिए समर्पित है। यह वर्तमान शोषणमूलक और अन्यायपूर्ण सामाजिक-आर्थिक ढांचे के अंत के लिए प्रतिबद्ध है। इसकी संकल्पना एक ऐसी सामाजिक एवं आर्थिक संरचना की स्थापना है जो जनआधारित तथा पर्यावरणपक्षीय है। यह समानता तथा एकजुटता के सिद्धांतों से प्रेरित है और इसका लक्ष्य सबके लिए गरिमामय जीवन की गारण्टी करना है।
       कारपोरेट पूंजी और सट्टेबाज वित्तीय पूंजी के अंतर्राष्ट्रीय गिरोह तथा भारतीय शासक वर्ग का हित एक हो गया है। वह इन वैश्विक ताकतों के साथ अधिकाधिक गहरे और वृहत्तर रिश्तों में आंख मूंदकर बंधता जा रहा है। हालांकि नवउदारवादी आर्थिक ढांचा स्वयं वैश्विक पूंजी के अपने केन्द्र में  ही सबसे गहरे संकट का सामना कर रहा है।   
       आइपीएफ (आर) का मत है कि मौजूदा दौर ने, जिसमें इन विनाशकारी ताकतों ने गठजोड़ कायम कर लिया है, इस लक्ष्य को प्राप्त करना और भी जरूरी बना दिया है।
       व्यापक जनसमुदाय पर दो दशकों की नवउदारवादी नीतियों के विनाशकारी प्रभाव ने समाज में लम्बे समय से मौजूद दरिद्रता और असमानता को और भी तीखा कर दिया है। छोटे और सीमांत किसान, खेत मजदूर, दस्तकार, संगठित, असंगठित तथा अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूर, दलित, महिला श्रमिक और कथित स्वरोजगार में लगे लोग इसके बदतरीन शिकार हुए हैं जबकि ऊपरी तबके के एक छोटे से हिस्से ने अभूतपूर्व पैमाने पर संपत्ति और आय अर्जित की है। नवउदारवादी नीतियों पर मुग्ध रहे मध्यवर्ग का अब इससे अधिकाधिक मोहभंग होता जा रहा है और जल्द ही परिस्थितियां उसे यह तय करने के लिए बाध्य कर देंगी कि वह शासक वर्ग या मेहनतकश तबके के पक्ष में खड़ा हो।
      जनता के समक्ष मौजूद चुनौतियों से ध्यान हटाने के लिए शासक वर्ग द्वारा आम जनता के बीच फूट और विभाजन पैदा करने यहां तक कि लड़ाने के योजनाबद्ध ढंग से प्रयास किए जा रहे हैं। इस सनकभरी परियोजना का ही एक पहलू महत्वपूर्ण पड़ोसी देशों के खिलाफ अंधराष्ट्रवाद और युद्धोन्माद भड़काने की कोशिश है। उनकी यह कार्रवाई वैश्विक महाशक्ति, जो अंतर्राष्ट्रीय पूंजी का केन्द्र भी है, की रणनीतिक योजना से मेल खाती है।
       साथ ही, कानून व्यवस्था के नाम पर लोकतांत्रिक असहमति तथा जनगोलबंदी के दायरे में जबर्दस्त कटौती की जा रही है। इससे भी बुरी बात यह कि ‘‘विकास‘‘ और ‘‘सुशासन‘‘ के अनालोचनात्मक और सतही नारों की आड़ में कारपोरेट पूंजी के प्रोत्साहन व समर्थन से तानाशाही की प्रवृत्तियां उभर रही हैं जो राज्य मशीनरी पर पूरी तौर पर कब्जा करने पर आमादा हैं।
       आइपीएफ (आर) का मानना है कि आज समय की मांग है कि एक रेडिकल और समावेशी राजनीति के लिए एक व्यापक लोकतांत्रिक मंच का निर्माण किया जाए। एक ऐसी राजनीति जो राज व समाज के जनतंत्रीकरण को गहरा करे, जो समानता, धर्मनिरपेक्षता,  एकजुटता के आधुनिक मूल्यों को सुदृढ़ करे तथा जो सबके लिए स्वतंत्रता और गरिमा की गारंटी करे। राजनीति जो सामाजिक असमानता तथा अन्याय के सदियों से चले आ रहे अभिशाप का अंत करे। राजनीति जो नवउदारवाद की चुनौती का मुंहतोड़ जवाब दे तथा शासक वर्ग के नापाक मंसूबे को शिकस्त दे। राजनीति जो भारत की उस संकल्पना की पुनः तलाश करेगी जिसे हमने उपनिवेशवादविरोधी दीर्घ संघर्ष से विरासत में हासिल किया है।
 एक शब्द में नियति के साथ अपने साक्षात्कार को हमें पुनर्जीवित करना है।    
 आइपीएफ (आर) इस कार्यभार के प्रति समर्पित है और इस लक्ष्य की दिशा में संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए सभी समान विचार वाले राजनैतिक संगठनों, समूहों, एक्टिविस्टों और व्यक्तियों के साथ हाथ मिलाने का इच्छुक है।  इस पार्टी के संविधान, उद्देश्यों और एजंडा के बारे में आप
www.aipfr.org पर विस्तार से पढ़ सकते हैं.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें