शुक्रवार, 8 मई 2015

क्या सामान्य वर्ग की बेरोज़गारी के लिए आरक्षण जिम्मेदार है?





क्या सामान्य वर्ग की 
बेरोज़गारी के लिए आरक्षण जिम्मेदार है?
एस.आर.दारापुरी ,राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
आज लगभग सभी समाचार पत्रों में लखनऊ जनपद के काकोरी ब्लाक के मल्हा
गाँव की सरिता द्विवेदी नाम की 22 वर्षीय लड़की द्वारा आत्महत्या की दर्दनाक खबर
छपी है. आत्महत्या के पीछे सरिता द्वारा पुलिस में सिपाही की भर्ती में सफल न होना
बताया गया है. सरिता द्वारा आत्महत्या करने के कारणों को दर्शाते हुए जो सुसाईड
नोट लिखा गया है उस में उसने सरकार, भर्ती में धांधली और आरक्षण को जिम्मेवार
ठहराया है.
सबसे पहले तो सरिता जो कि एक होनहार लड़की थी और ग्रामीण परवेश में रह
कर जीवन में आगे बढ़ने का संघर्ष कर रही थी की असामयिक मृत्यु अति दुखदायी है. उस
की मृत्यु उस के गरीब परन्तु प्रगतिशील माँ-बाप के लिए एक असहनीय आघात है. उन की
दुःख की इस घड़ी में पूरा समाज उन के दुःख में शामिल है. सरिता का पुलिस में भर्ती
होने का उल्लिखित मुख्य उद्देश्य समाज को न्याय दिलाना हम सब के लिए प्रेरणा का
श्रोत है.
अब आइये सब से पहले सरिता के सुसाईड नोट में आत्महत्या के अंकित
कारणों पर विचार करें. उक्त नोट में सरिता ने राजनेताओं और राजकीय व्यवस्था को
दोषी ठहराया है. इस के साथ ही उसने भर्ती में धांधली जैसे कि उस की मेरिट को 188
से कम करके 288 कर दिया जाना भी अंकित किया है. उस ने लिखा है कि उस ने दौड़ की
प्रतियोगिता में 100 में से 100 अंक प्राप्त किये थे जिस से स्पष्ट है कि उस का
मेरिट में ऊँचा ही स्थान रहा होगा. अतः इस बात की गहराई से जांच की जानी चाहिए कि
क्या उस की मेरिट के साथ सचमुच में कोई छेड़छाड़ की गयी थी.
अब सरिता द्वारा सुसाईड नोट में अपना चयन न होने के लिए आरक्षण के भी
जिम्मेदार होने की बात कही गयी है. इस भ्रान्ति पर विस्तार से चर्चा करने की ज़रुरत
है. सब से पहले यह देखना ज़रूरी है कि रोजगार के क्षेत्र में वह कितना हिस्सा है
जिस में आरक्षण लागू है. यह सर्विदित है कि आरक्षण केवल सरकारी क्षेत्र में है जो
कि कुल उपलब्ध रोज़गार का 2% ही है. निजी क्षेत्र जो कि कुल रोज़गार का 98% है, में
आरक्षण लागू नहीं है. अब 2% सरकारी रोज़गार में देश की 76% आबादी के लिए पिछड़ों के
लिए 27% और अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए 22.5% अर्थात कुल 50% तक की सीमा तक ही
आरक्षण लागू है. इस के साथ ही निजीकरण के वर्तमान दौर में सरकारी उपक्रमों के
निजीकरण के कारण आरक्षण का दायरा निरंतर सीमित हो रहा है जिस के कारण आरक्षित वर्ग
के लिए उपलब्ध अवसर निरंतर कम हो रहे हैं और वर्गों में भी बेरोज़गारी बढ़ रही है.
इस के इलावा विश्व बैंक और आइएमएफ की शर्तों के अनुसार भारत सरकार को प्रति वर्ष
1% की दर से अपनी स्थापना को कम करना है. इन कारणों से सरकारी क्षेत्र में रोज़गार
के अवसरों का कम होना और बेरोज़गारी का बढ़ना लाजिमी है. अतः दलितों, पिछड़ों और
सामान्य वर्ग के लोगों में बढती बेरोजगारी के लिए आरक्षण नहीं बल्कि रोज़गार के
सिकुड़ते अवसर हैं.
यह भी सर्विदित है कि हमारे देश में 1990 के दशक में निजीकरण,
भूमंडलीकरण और खुले बाज़ार की नीतियाँ लागू करते समय यह आश्वासन दिया गया था कि इस
से देश में रोज़गार को बढ़ावा मिलेगा परन्तु अब तक के अनुभव से यह पाया गया है कि इन
नीतियों के कारण रोज़गार के नए अवसर पैदा हुए होने की बजाये कम हुए हैं. यह
चिरस्थापित सत्य है कि निजी क्षेत्र का मुख्य लक्ष्य लाभ कमाना होता है जो कि लागत
मूल्य जिस में मजदूरी लागत भी शामिल है कम से कम रखने पर ही संभव है. अतः निजी
क्षेत्र किसी भी कीमत पर अधिक रोगजार पैदा नहीं करेगा. इसी लिए यह ज़रूरी है कि
सरकारी क्षेत्र में रोज़गार के अवसर बचाने के लिए निजीकरण का विरोध किया जाना
चाहिए.
यह देखा गया है कि अधिकतर राजनैतिक पार्टियाँ आरक्षण के नाम पर केवल
राजनीति करती हैं और आरक्षण का चारा फेंक कर लोगों को बेवकूफ बनाती हैं. वे यह भी
भली प्रकार जानती हैं कि निजीकरण के कारण आरक्षण का दायरा निरंतर सीमित हो रहा है
फिर भी वे लोगों को आरक्षण का झुनझुना पकड़ा देते हैं. इतना ही नहीं वे वोट लेने के
चक्कर में अधिक से अधिक जातियों को आरक्षित वर्ग में शामिल करने की राजनीति भी
करती हैं चाहे वे उस की बिलकुल भी पात्र न हों जैसे कि उत्तर प्रदेश में भाजपा ने
जाटों को भी पिछड़ी जातियों की सूची में शामिल कर दिया था. इस प्रकार राजनीतिक
पार्टिया सरकारी नीतियों के कारण बढ़ रही बेरोज़गारी की समस्या का समाधान करने की
बजाये आरक्षित और अनारक्षित वर्ग को आपस में लड़ा कर अपना उल्लू सीधा करती हैं और
इस से बहुत से लोग गुमराह हो जाते हैं जैसा कि सरिता भी. अतः हम लोगों को आरक्षण की
राजनीति को भी गहराई से समझाना होगा क्योंकि सरकारी रोज़गार के अवसर बढ़ाये बिना
आरक्षण का कोई मतलब नहीं जिस के लिए निजीकरण पर रोक लगानी ज़रूरी है.
 उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है
कि सामान्य वर्ग में बढ़ती बेरोज़गारी के लिए आरक्षण नहीं बल्कि रोज़गार के निरंतर कम
हो रहे अवसर हैं जो कि सरकार की गलत नीतियों का परिणाम है. इस का केवल एक ही
समाधान है और वह है रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाया जाना जिस के हो जाने पर सरकार को
अपनी नीतियों में व्यापक बदलाव करने पड़ेंगे. ऐसा हो जाने पर या तो सरकार रोज़गार
देगी या फिर बेरोज़गारी भत्ता देगी जैसा कि पच्छिम के बहुत सारे देशों में है. यह
बिलकुल लोकतान्त्रिक मांग है और इस के लिए व्यापक जनांदोलन चलाया जाना चाहिए. अतः
सामान्य वर्ग के नवयुवकों को निरंतर घट रहे आरक्षण का विरोध छोड़ कर रोज़गार को
मौलिक अधिकार बनाने की लडाई शुरू करनी चाहिए जिस में आरक्षित और अनारक्षित वर्ग की
हिस्सेदारी होनी चाहिए. इस मुद्दे को राजनैतिक मुद्दा बनाया जाना चाहिए. आल इंडिया
पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय संयोजक अख्लेंद्र प्रताप सिंह ने इसी मुद्दे को लेकर
पिछले वर्ष जन्तर मन्तर, नयी दिल्ली पर दस दिन का अनशन भी किया था जिसे काफी राजनीतिक
पार्टियों, किसान तथा मजदूर यूनियनों और जनसंगठनों का व्यापक समर्थन भी मिला
था.    



    
     

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