शनिवार, 1 दिसंबर 2012

उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने की राजनीती एस आर दारापुरी

उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने की राजनीती
एस आर दारापुरी
हाल में उत्तर प्रदेश में  16 नवम्बर को समाजवादी पार्टी के  मुख्य मंत्री अखिलेश यादव ने 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने के लिए कैबिनेट की एक उप समिति बनायीं है जो दो माह में राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट देगी। रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार सम्बंधित पिछड़ी जातियों को अनुचित जातियों की  सूचि मे शामिल करने के लिए केंद्र सरकार से सिफारिश करेगी । इस पर  बसपा और भाजपा ने  प्रकरण में सरकार की नियत पर सवाल उठाते हुए उप समिति बनाये जाने का विरोध  करते हुए गुरुवार को विधान सभा से बहिर्गमन कर दिया। दोनों पार्टियों का कहना था कि मामले को लटकाने के लिए उपसमिति बनाये जाने की बजाए सरकार सम्बंधित प्रस्ताव को सदन के माध्यम से केंद्र सरकार को क्यों नहीं भेजती?
सरकार ने विधान सभा में एक प्रशन के उत्तर में यह बताया  था कि निषाद, बिन्द, मल्लाह,केवट, कश्यप, भर, धीवर, बाथम, मछुआरा,
प्रजापति,राजभर,कहार, कुम्हार, धीमर, मांझी, तुरहा तथा गौड़ आदि जातियों को अनुसूचित जातियों की सूचि में शामिल करने के लिए उपसमिति बनायीं गयी है जो दो माह में अपनी रिपोर्ट सरकार को देगी। रिपोर्ट के आधार पर सरकार केद्र सरकार को उक्त जातियों को एससी की सूचि में शामिल करने की सिफरिश  की जाएगी। इस पर बसपा और भाजपा के प्रतिनिधियों ने यह कहते हुए सदन से बहिर्गमन  किया कि  सरकार प्रकरण को केवल लटकाना चाहती है।
इस सम्बन्ध में यह उल्लेखनीय है कि इस से पहले भी वर्ष 2006 में मुलायम सिंह की सरकार ने 16 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची तथा 3 अनुसूचित जातियों को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने के लिए शासनादेश जारी  किया था जिसे आंबेडकर महासभा तथा अन्य  दलित संघठनों   द्वारा न्यायालय में चुनौती देकर रद्द करवा दिया गया था।   
वर्ष 2007 में सत्ता में आने पर मायावाती, जो कि अपने  आप को दलितों का मसीहा घोषित करती है, ने भी इसी प्रकार से 16 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूचि में शामिल करने की संस्तुति केन्द्रीय सरकार को भेजी  थी। इस पर केन्द्रीय सरकार ने इस के औचित्य के बारे में उस से सूचनाएं मांगी तो वह इस का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सकी।और  केन्द्रीय सरकार ने उस प्रस्ताव को वापस भेज दिया।
इस विवरण से स्पष्ट है कि  समाजवादी पार्टी  और बसपा   इन पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल कराकर उन्हें  अधिक आरक्षण दिलवाने का लालच देकर  केवल उनका वोट प्राप्त करने की राजनीति कर रही हैं क्योंकि वे अच्छी  तरह जानती हैं कि न तो उन्हें स्वयम इन जातियों को अनुसूचित जातियों की सूचि में डालने का अधिकार है और न ही यह जातियां अनुसूचित जातियों के माप दंड पर पूरा ही  उतरती हैं। वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार किसी भी जाति को अनुसूचित जातियो की सूचि में शामिल करने अथवा उसे इस से निकालने  का अधिकार केवल पार्लियामेंट को ही है। राज्य सरकार  औचित्य सहित केवल अपनी संस्तुति  केन्द्रीय सरकार को भेज सकती है जो इस सम्बन्ध में केन्द्रीय सरकार ही  रजिस्ट्रार जनरल  आफ इंडिया तथा रष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग से परामर्श के बाद  पार्लियामेंट के माध्यम से ही  किसी जाति को सूचि में शामिल अथवा निकाल सकती है। संविधान की धारा 341 में राष्ट्रपति  ही राज्यपाल से परामर्श करके संसद द्वारा कानून पास करवा कर इस सूचि में किसी जाति का प्रवेश  अथवा निष्कासन कर सकता है। इस में राज्य सरकार को कोई भी शक्ति प्राप्त नहीं है। वास्तव में यह पार्टियाँ अपनी संस्तुति केन्द्रीय सरकार को  भेज कर  सारा मामला कांग्रेस  की  झोली में  डालकर यह प्रचार करती हैं कि हम तो आप को अनुसूचित जातियों की सूचि में डलवाना चाहते हैं परन्तु केंद्र सरकार उसे नहीं कर रही है। यह केवल अति पिछड़ी जातियों को गुमराह करके वोट बटोरने की राजनीति  है जिसे अब शायद ये जातियां भी बहुत अच्छी  तरह से जान गयी हैं।
इस सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि अखलेश यादव की सपा सरकार अथवा मायावती की बसपा सरकार द्वारा जिन अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूचि में डालने की जो संस्तुति पहले की गयी थी अथवा आगे की जाएगी वह मान्य  नहीं होगी क्योंकि यह जातियां अनुसूचित जातियों की   अस्पृश्यता की आवश्यक शर्त को पूरा नहीं करतीं। यह सर्व विदित  है कि अनुसूचित जातियां सवर्ण हिन्दुओं के लिए अछूत हैं जबकि सम्बंधित पिछड़ी जातियां उन के लिए सछूत  हैं। इस प्रकार उनका किसी भी हालत में अनुसूचित जातियों की सूचि में शामिल किया जाना संभव नहीं है।
 यदि सपा सरकार  इन पिछड़ी जातियों को आरक्षण का  वांछित लाभ वास्तव में देना चाहती हैं जोकि वार्तमान में उन्हें पिछड़ों में समृद्ध जातियों (यादव, कुर्मी तथा जाट आदि ) के  शामिल रहने से नहीं मिल पा रहा है तो  उसे इन जातियों की सूचि को दो या तीन हिस्सों में बाँट कर उनके लिए 27% के आरक्षण को उनकी आबादी के अनुपात में बाँट देना चाहिए। देश के अन्य कई राज्य बिहार, तमिलनाडु, कर्णाटक अदि में यह व्यवस्था पहले से ही लागू  है। मंडल योग में भी इस प्रकार की संस्तुति की गयी थी।
  उत्तर प्रदेश में इस सम्बन्ध में 1975 में डॉ छेदी लाल साथी की अध्यक्षता में सर्वाधिक पिछड़ा आयोग गठित किया गया था जिस ने अपनी रिपोर्ट 1977 में उत्तर प्रदेश सरकार को सौंप दी थी परन्तु उस पर आज तक कोई भी कार्रवाही नही की गयी। साथी आयोग ने पिछड़े वर्ग की जातियों को तीन श्रेणियों में निम्न प्रकार  बाँटने  तथा उन्हें 29.5 % आरक्षण देने की संस्तुति की थी:
"अ" श्रेणी में उन जातियों को रखा गया था जो पूर्ण रूपेण भूमिहीन, गैर-दस्तकार, अकुशल श्रमिक, घरेलू सेवक हैं और हर प्रकार से ऊँची जातियों पर निर्भर हैं। इनको 17% आरक्षण देने की संस्तुति की गयी थी।
"ब" श्रेणी में पिछड़े वर्ग की वह जातियां, जो कृषक या दस्तकार हैं। इनको 10% आरक्षण देने की संस्तुति की गयी थी। .
"स" श्रेणी में मुस्लिम पिछड़े वर्ग की जातियां हैं जिनको 2.5 % आरक्षण देने की संस्तुति की गयी थी।
वर्तमान में उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों के लिए 27% आरक्षण उपलब्ध है। अतः इसे डॉ छेदी लाल साथी आयोग की संस्तुतियों के अनुरूप पिछड़ी  जातियों को तीन हिस्सों में बाँट कर उपलब्ध आरक्षण को उनकी आबादी के अनुपात में बाँटना अधिक न्यायोचित होगा। इस से अति पिछड़ी जातियों को अपने हिस्से के अंतर्गत आरक्षण मिलना संभव हो सकेगा।
 इन अति पिछड़ी जातियों को यह भी समझाना होगा कि सपा सरकार इन अति पिछड़ी जातियों को इस सूचि से हटा कर अपनी समृद्ध जातियों यादव, कुर्मी और जाट के लिए आरक्षण बढ़ाना चाहती है और उन्हें अनुसूचित जातियों से लडाना चाहती है। अतः उन्हें सपा और बसपा  की इस चाल को समझाना चाहिए और उन के इस झांसे में न आ कर डॉ छेदी लाल साथी आयोग की संस्तुतियों के अनुसार अपना आरक्षण अलग कराने  की मांग उठानी चाहिए। इसी प्रकार कुछ  जातियां जो वर्तमान में अनुसूचित जातियों की सूचि में हैं परन्तु उन्हें अनुसूचित जनजातियों  की सूचि में होना चाहिए उन्हें सपा सरकार से एक आयोग बना कर उनकी स्थिति का आंकलन करवा भारत  सरकार  को संस्तुति करने की मांग  उठानी चाहिए तभी इन जातियों को भी उचित न्याय मिल सकेगा वरना वे इन पार्टियों द्वारा झूठे आश्वासन दे कर इसी तरह ठगे जाते रहेंगे। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. माननिये मुख्यमंत्री जी आप सअनुरोध हैं कि सर्वप्रथम आप अपने राज्य में कहार जाति को जनजाति का प्रमाण पत्र जारी
    कराएं, पता नहीं कितने ऐसे जनजाति के लोग फसें हुए हैं जो कि मजबूरी में उन्हें सामान्य बर्ग में रहकर सभी प्रकार कि कठिनाईओं
    का सामना करना पड़ रहा हैं और वो लोग सामान्य वर्ग में रहकर सभी प्रकार कि कठिनाईओं का सामना कर रहे हैं क्यों कि आपके प्रद्सेह में उन्हें
    जनजाति का होने के पश्चात सर्टिफिकेटे जारी नहीं कि जा रही हैं.....
    कृपया जल्द ही कुछ करें !! हम सदैव आपके आभारी रहेंगे,..


    brijesh gaur

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  2. पिछड़े वर्ग को यह बतीये कि उनके कह म् कितना % की भागीदारी होना चाहिये आरक्षण कहना गलत है आरक्षण कहने पर हीनता की बोध होता है इसलिये पिछड़े वरिग को अपनी हर जगह बराबर की हिस्सा मिलना चाहिये जे उच्च वर्ग के लोगों ने कब्जी कर लिया है क्या आपके पिछण् वर्ग मे पढ़े लिखे लोग नही है

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  3. पिछड़े वर्ग को यह बतीये कि उनके कह म् कितना % की भागीदारी होना चाहिये आरक्षण कहना गलत है आरक्षण कहने पर हीनता की बोध होता है इसलिये पिछड़े वरिग को अपनी हर जगह बराबर की हिस्सा मिलना चाहिये जे उच्च वर्ग के लोगों ने कब्जी कर लिया है क्या आपके पिछण् वर्ग मे पढ़े लिखे लोग नही है

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