बुधवार, 13 जून 2012

सीमा आजाद को राजद्रोह  के अपराध में उम्र कैद के निहितार्थ
एस. आर. दारापुरी
 सीमा आजाद और उस के पति विशव विजय को ८ जून को इलाहाबाद की अदालत ने राजद्रोह के अपराध में उम्र कैद की सजा दी है जिस के गंभीर निहितार्थ हैं. इस सजा के माध्यम से राज्य ने उन सभी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को यह चेतावनी दी है कि जो लोग दलितों, आदिवासिओं  और अन्य शोषित वर्गों के हितों को बचाने और उन के शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं उनको इसी प्रकार से झूठे केसों में फंसा कर जेल में डाला जा सकता है.  हम सब लोग जानते हैं कि  सीमा आजाद एक मानवाधिकार कार्य करता है और उसने उत्तर प्रदेश में बालू खनन मजदूरों और आजमगढ़ से पुलिस दुआरा आतंकवाद के नाम पर उठाये गए नौजवानों के मामलों को उठाया था. उसने गंगा एक्सप्रेस वे के नाम पर तत्कालीन मायावती सरकार द्वारा किसानों से छीनी जा रही ज़मीन और पर्यावरण  को संभावित खतरों के मामले को पूरे जोर शोर के साथ उठाया था. तभी से वह और उसका पति विशव विजय सरकार के निशाने पर आ गए थे और पुलिस उन को किसी बड़े केस में फिट करने के मौके की तलाश में थी.

सीमा आजाद और विशव विजय की गिरफ्तारी से एक दिन पहले उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा कानपुर से कुछ तथाकथित  माओवादियों को गिरफ्तार किया गया  था. पुलिस के लिए सीमा आजाद को उन तथाकथित माओवादियों से जोड़ने का और अच्छा मौका क्या हो सकता था. इस लिए उन्होंने अगले ही दिन सीमा और विशव विजय को गिरफ्तार कर कानपुर के मायोवादियों   से जोड़ दिया. सीमा की गिरफ्तारी उस समय की गयी जब वह दिल्ली में विशव पुस्तक मेला  देख कर रेल द्वारा प्रातः इलाहाबाद वापस लौट रही थी और उसके पति उसे रेलवे स्टेशन से लेकर अपने घर वापस आ रहे थे तो तभी रास्ते में ही पुलिस द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने सीमा के हैण्ड बैग  और विशव विजय के झोले से माओवादी पर्चे और ३०,००० रुपए बरामद होना दिखाया. ये पर्चे उन्हें कानपुर से एक दिन पहले पकडे गए तथाकथित मायोवादियों  से जोड़ते थे. अब साधारण बुद्धि की बात है कि क्या सीमा आजाद और विशव विजय किसी ऐसे स्थान या परिस्थिति में पकडे गए थे यहाँ पर उनके के पर्स या बैग में प्रतिबंधित मायोवादी संघठन  के पर्चे होने की सम्भावना हो सकती है. सीमा तो विशव पुस्तक मेला देख कर प्रातः की गाड़ी से दिल्ली से वापस आ रही थी और विशव विजय उसे रेलवे स्टेशन से लेने गया था. इस से स्पष्ट है कि पुलिस द्वारा उनसे मायोवादी पर्चों की दिखाई गयी बरामदगी फर्जी है. वास्तव में पुलिस द्वारा ही उनपर यह पर्चे रख कर फर्जी बरामदगी दिखाई गयी है. इस बरामदगी के कोई में स्वंतत्र गवाह नहीं हैं बल्कि इसके पुलिस वाले ही गवाह हैं. मैं अपने पुलिस विभाग में ३२ साल की नौकरी के तजुर्बे से यह कह सकता हूँ कि यह बरामदगी बिलकुल फर्जी  है और यह पर्चे पुलिस द्वारा ही रोपित किये गए थे. इस का मकसद केवल उन्हें कानपुर से गिरफ्तार तथाकथित मायोवादियों से जोड़ना था. मेरा पूरा विश्वास है कि पुलिस अधिकतर इसी प्रकार की फर्जी बरामदगियां दिखा कर निर्दोष लोगों को झूठे केसों में फंसाती है.
सीमा की गिरफ्तारी के अगले  दिन जब हम लोगों ने  लखनऊ से सीमा के पी.यू. सी. एल. की कार्यकर्ता  और  उसके निर्दोष होने का ब्यान दिया तो तत्कालीन मायावती सरकार द्वारा हम लोगों को यह कह  कर धमकी दी गयी कि सरकार मायोवादियों के समर्थकों के विरुद्ध भी कड़ी कार्रवाही कर सकती है. इस के बाद जब हम लोगों ने सीमा के निर्दोष होने के बारे में तत्कालीन अप्पर पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) से पी.यू. सी. एल. के प्रतिनिधि मंडल के रूप में मिलने का समय माँगा तो उन्होंने यह क़र मिलने से मना कर दिया कि आप लोग तो मायोवादियों के समर्थक हैं. इस से आप अंदाज़ा  लगा सकते हैं कि वर्तमान सरकारों का मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के प्रति कैसा रवैया है. तब से लेकर पी.यू. सी. एल. इलाहाबाद हाई कोर्ट में सीमा की ज़मानत के लिए बराबर कोशिश करती रही परन्तु उसे ज़मानत नहीं दी गयी.
अब अचानक कोर्ट द्वारा सीमा और विशव विजय को देश द्रोह और कुछ अन्य धारायों के अंतर्गत दोषी करार दे कर उम्र कैद की सजा सुना दी गयी है. कोर्ट में पुलिस द्वारा उन पर केवल मायोवादी पर्चों की बरामदगी के सिवाए कोई भी साक्ष्य पेश नहीं किया गया. यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि न्यायालय ने भी पुलिस की फर्जी बरामदगी को साक्ष्य मान कर उन्हें उम्र कैद की सज़ा दी  है और उन पर ७०,००० रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है. अदालत के इस फैसले से तो पुलिस और अदालत के व्यवहार में कोई भी अंतर मालूम नहीं पड़ता है. यह मामला बिलकुल बिनायक सेन के मामले से मिलता जुलता है जिस में उसे भी इसी प्रकार के फर्जी दस्तावेजों  की बरामदगी के आधार पर  उम्र कैद की सजा दी गयी और वे बहुत मुश्किल से सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत प़र छूट पाए हैं.

सीमा आजाद और विशव विजय को उम्र कैद की दी गयी सजा के बहुत गंभीर निहितार्थ हैं. एक तो यह है कि पुलिस किसी भी व्यक्ति को जो राज्य का किन्ही कारणों से विरोध कर रहा हो या निर्दोष लोगों को मायोवादी या आतंकवादी कह कर झूठे केसों में फंसाने के विरुद्ध आवाज़ उठा रहा हो उसे झूठे मामले में फंसा कर सजा दिलवा सकती है. दूसरे सब से बड़ी चिंता की बात अदालतों के व्यवहार और आचरण की  है जो कि किसी भी तरह पुलिस से भिन्न दिखाई नहीं देता है. यह देखा गया है कि अधिकतर अदालतें आंख बंद करके पुलिस द्वारा घडी गयी कहानी पर विश्वास करके निर्दोषों को दण्डित कर रही हैं. इस में तो काफी  हद तक राज्य, पुलिस और अदालतों में गठजोड़ की बू आती है. मैंने अपने पुलिस सेवा काल में इस को काफी अंदर  से देखा भी है. मैं जानता हूँ कि किस तरह साम, दाम और दंड भेद  के माध्यम से निचली अदालतों के निर्णय को  प्रभावित किया जाता है. मेरे विचार में  पुलिस  का सामंतवादी और जनविरोधी चरित्र तो सर्वविदित है परन्तु अदालतों का व्यवहार और चरित्र  न्याय और लोकतंत्र के लिए सब से बड़ा खतरा बन गया है. ऐसी परिस्थिति में हमें राज्य और पुलिस  की ज्यादितियों के साथ साथ न्यायपालिका के अन्याय के खिलाफ भी आवाज़ उठानी पड़ेगी वरना हम में से कोई भी राजद्रोह  का दोषी करार दे  कर उम्र कैद से दण्डित किया जा सकता है.

 हम लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ तो आज़ादी के लिए विद्रोह किया था और हमारे कई स्वतंत्रता सेनानी राजद्रोह के आरोप में दण्डित किये गए थे परन्तु अब तो हमारे देश में लोकतंत्र है फिर यहाँ पर राजद्रोह का अपराध कैसे हो सकता है. हमारे लोकतंत्र का यह  सब  से बड़ा दुर्भाग्य  है कि  हमारे वर्तमान शासकों ने सरकार की ज्यादतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाने को ही राजद्रोह का अपराध बना दिया है और उस कानून का खुले आम दुरूपयोग हो रहा है. डॉ. आंबेडकर ने ठीक ही कहा था, " मुझे डर है की स्वतन्त्र भारत में गोरे शासकों का स्थान काले शासक ले लेंगे." उनका यह डर बिलकुल सही साबत हुआ है. एक लोकतान्त्रिक देश में राजद्रोह के अपराध की कोई जगह नहीं हो सकती. इस उपनिवेशी कानून को जल्दी से जल्दी ख़त्म करने के लिए लाम बंद होने की ज़रूरत है.
आईये साथिये हम सब  लोग एक साथ खड़े हो कर पुलिस और अदालतों के अन्याय के विरुद्ध लाम बंद हों और सीमा आजाद और विशव विजय की ज़मानत  पर रिहाई के लिए जन आन्दोलन प्रारंभ करें. हम ने अगर ऐसा नहीं किया तो बशीर बदर के लफ़्ज़ों में "आज अगर खामोश रहे तो कल सन्नाटा छाएगा. हर बस्ती में आग लगेगी हर बस्ती जल जाएगी."

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