रविवार, 25 जनवरी 2026

भारत में लोकतांत्रिक अवनति: एक आंबेडकरवादी संवैधानिक विश्लेषण

 

भारत में लोकतांत्रिक अवनति: एक आंबेडकरवादी संवैधानिक विश्लेषण

-    एस आर दारापुरी आई. पी. एस. (से. नि.)

 यह शोध-पत्र भारत में लोकतांत्रिक शासन, संवैधानिक अधिकारों, धर्मनिरपेक्षता तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता की वर्तमान स्थिति का आंबेडकरवादी–संवैधानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है। लेख का तर्क है कि यद्यपि भारत औपचारिक रूप से एक संवैधानिक लोकतंत्र बना हुआ है, तथापि इसके लोकतांत्रिक सार (substance) में गंभीर क्षरण हुआ है। बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद, कार्यपालिका का केंद्रीकरण और संवैधानिक नैतिकता के क्षय ने भारतीय लोकतंत्र को भीतर से खोखला कर दिया है। डॉ. भीमराव आंबेडकर की उस अवधारणा के आलोक में—जिसमें लोकतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं बल्कि सामाजिक नैतिक व्यवस्था माना गया है—यह लेख भारत को ‘लोकतांत्रिक अवनति’ (democratic backsliding) के एक प्रमुख उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता है।

1. भूमिका

भारतीय संविधान केवल शासन की एक रूपरेखा नहीं, बल्कि सामाजिक रूपांतरण का एक क्रांतिकारी दस्तावेज़ है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से जड़ जमाए जाति, धर्म, लिंग और वर्ग आधारित असमानताओं को समाप्त कर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करना था। संविधान के प्रमुख शिल्पकार डॉ. भीमराव आंबेडकर ने बार-बार चेताया था कि यदि संविधानिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र का आधार नहीं मिला, तो वह टिकाऊ नहीं रह सकेगा।

हाल के वर्षों में भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण, संवैधानिक अधिकारों के संकुचन, धर्मनिरपेक्षता के अवसान तथा न्यायपालिका की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठे हैं। यह लेख इन प्रवृत्तियों का विश्लेषण आंबेडकरवादी संवैधानिक दृष्टिकोण से करता है और यह तर्क प्रस्तुत करता है कि भारत में लोकतंत्र का पतन किसी आकस्मिक संकट का परिणाम नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक और वैचारिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

2. आंबेडकर की संवैधानिक लोकतंत्र की अवधारणा

डॉ. आंबेडकर के लिए लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं था, बल्कि ‘सहजीवी जीवन पद्धति’ (associated mode of living) था, जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे नैतिक मूल्यों पर आधारित हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल राजनीतिक लोकतंत्र—अर्थात् सार्वभौमिक मताधिकार—तब तक अर्थपूर्ण नहीं हो सकता जब तक उसके साथ सामाजिक लोकतंत्र न जुड़ा हो।

आंबेडकर की अवधारणा में संवैधानिक नैतिकता का केंद्रीय स्थान है। इसका आशय संविधान की केवल औपचारिक स्वीकृति से नहीं, बल्कि उसके मूल्यों, सीमाओं और उद्देश्यों के प्रति संस्थागत तथा सामाजिक प्रतिबद्धता से है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि भारतीय समाज की जाति-आधारित संरचना लोकतंत्र के लिए मूलतः प्रतिकूल है और ऐसे समाज में बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र को आसानी से अधिनायकवाद में परिवर्तित कर सकता है।

3. लोकतांत्रिक शासन और कार्यपालिका का केंद्रीकरण

भारत में नियमित चुनावों और उच्च मतदाता भागीदारी के कारण लोकतंत्र का औपचारिक ढांचा अब भी मौजूद है। किंतु शासन की वास्तविक प्रक्रिया में कार्यपालिका का असाधारण केंद्रीकरण देखने को मिलता है। संसद की भूमिका निरंतर सीमित होती गई है—संसदीय सत्रों की संख्या में कमी, महत्वपूर्ण विधेयकों पर अपर्याप्त बहस, अध्यादेशों और धन विधेयकों का बढ़ता प्रयोग इस प्रवृत्ति को दर्शाता है।

आंबेडकर के दृष्टिकोण से यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। उन्होंने कार्यपालिका की निरंकुशता को स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा माना था, विशेषकर ऐसे समाज में जहाँ सामाजिक असमानताएँ गहरी हों। राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध जाँच एजेंसियों के चयनात्मक प्रयोग ने लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा की निष्पक्षता को भी कमजोर किया है।

4. संवैधानिक अधिकार और वास्तविक समानता का संकट

भारतीय संविधान में निहित मौलिक अधिकार आज भी विधिक रूप से विद्यमान हैं, किंतु उनके वास्तविक प्रयोग पर गंभीर प्रतिबंध लगे हैं। राजद्रोह, गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम और निवारक निरोध कानूनों के बढ़ते प्रयोग ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित किया है। बिना मुकदमे के लंबी अवधि तक कारावास एक सामान्य प्रशासनिक व्यवहार बनता जा रहा है।

आंबेडकर के अनुसार मौलिक अधिकार विशेष रूप से दलितों, आदिवासियों और अन्य वंचित समुदायों के सामाजिक सशक्तिकरण के उपकरण थे। कानून के चयनात्मक प्रयोग और अल्पसंख्यकों तथा असहमत स्वरों के प्रति कठोर रुख संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 की भावना के प्रतिकूल है। यह स्थिति अधिकार-आधारित संवैधानिकता से ‘व्यवस्था और सुरक्षा’ आधारित शासन की ओर संक्रमण को दर्शाती है।

5. धर्मनिरपेक्षता और बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद

धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान की आधारभूत विशेषताओं में से एक है, जिसका तात्पर्य सभी धर्मों के प्रति राज्य की समान दूरी और सम्मान से है। समकालीन भारत में यह सिद्धांत गंभीर संकट में है। राज्य की नीतियों और राजनीतिक विमर्श में बहुसंख्यक धार्मिक पहचान को विशेषाधिकार प्राप्त होता दिखाई देता है।

आंबेडकर धर्म और राजनीति के घालमेल के घोर आलोचक थे। उनका मानना था कि धार्मिक बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र के लिए घातक है, क्योंकि यह अल्पसंख्यकों को समान नागरिक के बजाय अधीन प्रजा में बदल देता है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, घृणास्पद भाषणों पर चयनात्मक कार्रवाई और साम्प्रदायिक हिंसा के मामलों में राज्य की निष्क्रियता धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था के क्षरण को रेखांकित करती है।

6. न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक संरक्षण

आंबेडकर ने न्यायपालिका को संविधान का ‘संरक्षक’ माना था। औपचारिक रूप से भारतीय न्यायपालिका अब भी स्वतंत्र है, किंतु उसके समकालीन आचरण में गंभीर सीमाएँ दिखाई देती हैं। संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों की सुनवाई में अत्यधिक विलंब, मामलों की चयनात्मक प्राथमिकता और कार्यपालिका के प्रति बढ़ती न्यायिक संकोचशीलता चिंता का विषय है।

यह स्थिति प्रत्यक्ष न्यायिक अधिग्रहण (capture) की बजाय न्यायिक निष्क्रियता या संयम के नाम पर त्याग (judicial abdication) को दर्शाती है, जिसके परिणामस्वरूप असंवैधानिक व्यवहार धीरे-धीरे सामान्यीकृत हो जाता है।

7. निष्कर्ष: चौराहे पर खड़ा संवैधानिक लोकतंत्र

यह लेख तर्क देता है कि भारत में लोकतंत्र का संकट पूर्ण अधिनायकवाद का नहीं, बल्कि संवैधानिक लोकतंत्र के भीतर से खोखले होने का संकट है। चुनावी प्रक्रियाएँ बनी हुई हैं, किंतु अधिकार, धर्मनिरपेक्षता, संस्थागत संतुलन और न्यायिक संरक्षण जैसे लोकतंत्र के मूल तत्व कमजोर पड़ते जा रहे हैं।

आंबेडकर की यह चेतावनी आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है कि संवैधानिक नैतिकता के अभाव में लोकतंत्र केवल एक औपचारिक आवरण बनकर रह जाएगा। भारतीय गणराज्य का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वह सामाजिक लोकतंत्र, वास्तविक समानता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनर्जीवित कर पाता है या नहीं।

साभार: ChatGPT

संदर्भ

आंबेडकर, बी.आर. संविधान सभा की बहसें. भारत सरकार।

आंबेडकर, बी.आर. जाति का उच्छेद. 1936

आंबेडकर, बी.आर. राज्य और अल्पसंख्यक. 1947

बेतैय, आंद्रे. लोकतंत्र और उसकी संस्थाएँ. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस।

लेवित्स्की, स्टीवन एवं ज़िब्लाट, डैनियल. लोकतंत्र कैसे मरते हैं. 2018

 

शनिवार, 24 जनवरी 2026

हिंदुत्व, कॉरपोरेट पूँजी और भारत में श्रेणीबद्ध असमानता का पुनरुत्पादन: एक आंबेडकरवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

 

हिंदुत्व, कॉरपोरेट पूँजी और भारत में श्रेणीबद्ध असमानता का पुनरुत्पादन: एक आंबेडकरवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

एस. आर. दारापुरी
राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

यह लेख हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ का विश्लेषण आंबेडकरवादी एवं दलित–बहुजन राजनीतिक अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से करता है। यह तर्क देता है कि बहुसंख्यक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और संकेंद्रित कॉरपोरेट पूँजी के बीच समकालीन गठबंधन कोई ऐतिहासिक विच्छेद नहीं, बल्कि भारत की श्रेणीबद्ध असमानता की व्यवस्था का पुनर्संरचनात्मक रूप है। हिंदुत्व जाति-आधारित पदानुक्रम और सामाजिक बहिष्करण को वैचारिक वैधता प्रदान करता है, जबकि कॉरपोरेट पूँजी राज्य संरक्षण और नवउदारवादी पुनर्गठन के माध्यम से आर्थिक शक्ति का संकेन्द्रण करती है। ये दोनों मिलकर संवैधानिक लोकतंत्र को कमजोर करते हैं, दलित–बहुजन श्रम को हाशिये पर धकेलते हैं, तथा जाति, वर्ग और पुनर्वितरण से जुड़े भौतिक प्रश्नों को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से विस्थापित कर देते हैं। यह लेख इस गठजोड़ को वैश्विक अधिनायकवादी नवउदारवाद के संदर्भ में रखता है, साथ ही इसकी विशिष्ट ब्राह्मणवादी और जाति-आधारित संरचना को रेखांकित करता है।

1. भूमिका (Introduction)

समकालीन भारत में हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ के सुदृढ़ीकरण को जाति-आधारित सामाजिक व्यवस्था और ब्राह्मणवादी प्रभुत्व की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में समझना आवश्यक है। आंबेडकरवादी दृष्टि से यह गठजोड़ केवल लोकतांत्रिक संस्थाओं को क्षीण नहीं करता, बल्कि सक्रिय रूप से श्रेणीबद्ध असमानता का पुनरुत्पादन करता है—जिसे डॉ. भीमराव आंबेडकर ने हिंदू सामाजिक व्यवस्था का मूल संगठन सिद्धांत बताया था।

जहाँ नवउदारवादी सुधारों ने आर्थिक असमानता को तीव्र किया है, वहीं हिंदुत्व ने एक ऐसा सांस्कृतिक-राजनीतिक ढाँचा उपलब्ध कराया है जो पदानुक्रम, आज्ञाकारिता और बहिष्करण को सामान्य और स्वाभाविक बनाता है। दूसरी ओर, कॉरपोरेट पूँजी को ऐसे राजनीतिक वातावरण से लाभ होता है जहाँ दलित–बहुजन श्रम को अनुशासित, अराजनीतिक और खंडित किया जाता है, तथा पुनर्वितरण की माँगों को धार्मिक राष्ट्रवाद के माध्यम से विस्थापित कर दिया जाता है।

यह लेख तर्क देता है कि हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ ब्राह्मणवादी पूँजीवाद का एक समकालीन रूप है, जिसमें बाज़ार शक्ति और जाति-आधारित विचारधारा का संयोग दिखाई देता है।

2. आंबेडकरवादी ढाँचा: जाति, पूँजी और सत्ता

आंबेडकर ने जाति को केवल श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का विभाजन माना—जो धार्मिक विचारधारा, अंतर्विवाह और सामाजिक दंडों द्वारा संरक्षित है। इस ढाँचे में: आर्थिक शोषण सामाजिक पदानुक्रम से अविभाज्य है, पूँजी संचय ऐतिहासिक रूप से जाति-आधारित श्रम दोहन पर आधारित रहा है तथा सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र स्वभावतः अस्थिर है।

अतः हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ को केवल वैचारिक या आर्थिक परिघटना के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक रूप में जाति सत्ता की निरंतरता के रूप में विश्लेषित किया जाना चाहिए।

भारत में नवउदारवादी पूँजीवाद ने जाति को समाप्त नहीं किया है; बल्कि उसने जाति को पुनः कार्यात्मक बनाया है—विशेषकर दलित–बहुजन समुदायों में केंद्रित असंगठित श्रम के विस्तार, सामूहिक सौदेबाज़ी और श्रम संरक्षण के क्षरण, तथा पूँजी, ज्ञान और राज्य संस्थाओं पर अभिजात नियंत्रण को बनाए रखते हुए।

3. कॉरपोरेट पूँजी और ब्राह्मणवादी राज्य सत्ता

भारत में बड़ी कॉरपोरेट पूँजी सामाजिक संरचना की दृष्टि से संकीर्ण है और सांस्कृतिक रूप से प्रभुत्वशाली जाति नेटवर्कों से जुड़ी हुई है। समकालीन राज्य कॉरपोरेट संचय को निम्नलिखित तरीकों से सुगम बनाता है: सामूहिक श्रम से निर्मित सार्वजनिक परिसंपत्तियों का निजीकरण, हाशिये के श्रमिकों को प्रभावित करने वाले श्रम और पर्यावरण कानूनों का शिथिलीकरण तथा बड़ी कंपनियों को कर छूट और नियामक अपवाद।

आंबेडकरवादी दृष्टि से यह राज्य के उस रूपांतरण को दर्शाता है जिसमें वह संविधान द्वारा परिकल्पित सामाजिक न्याय के साधन के बजाय उच्च जातीय कॉरपोरेट हितों का संरक्षक बन जाता है।

आरक्षण, श्रम संरक्षण और कल्याणकारी प्रावधान—जो दलित–बहुजन समुदायों के लिए संघर्ष से प्राप्त सुरक्षा उपाय हैं—को लगातार अक्षमता या तुष्टीकरण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे संरचनात्मक सुधार की अवधारणा ही अवैध ठहराई जाती है।

4. सामाजिक नियंत्रण की विचारधारा के रूप में हिंदुत्व

हिंदुत्व जाति-पूँजीवाद का सांस्कृतिक पक्ष है। एकरूप हिंदू पहचान का दावा करते हुए यह व्यवस्थित रूप से: जाति उत्पीड़न को सभ्यतागत गौरव से प्रतिस्थापित करता है, दलित–बहुजन आकांक्षाओं को भौतिक सत्ता के बिना प्रतीकात्मक समावेशन में बदल देता है तथा पदानुक्रम को सांस्कृतिक सामंजस्य के रूप में पुनः परिभाषित करता है

आंबेडकर ने चेताया था कि हिंदू धर्म की शक्ति असमानता को प्राकृतिक और पवित्र प्रतीत कराने में निहित है। हिंदुत्व इस कार्य को आधुनिक संदर्भ में मीडिया, दृश्यात्मक राजनीति और राष्ट्रवाद के माध्यम से पूरा करता है, जिससे जाति चेतना और वर्ग एकजुटता कमजोर होती है।

धार्मिक ध्रुवीकरण भूमिहीनता, असुरक्षित श्रम, शैक्षिक बहिष्करण और घटते सार्वजनिक रोजगार जैसे प्रश्नों से ध्यान हटाता है।

5. चुनावी राजनीति, धन शक्ति और बहिष्करण

चुनावों का बढ़ता कॉरपोरेटीकरण दलित–बहुजन हितों के राजनीतिक हाशियाकरण को और गहरा करता है। पूँजी-प्रधान चुनाव अभियान, मीडिया वर्चस्व और अपारदर्शी वित्तपोषण तंत्र राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को कॉरपोरेट-अनुकूल दलों के पक्ष में झुका देते हैं।

यद्यपि दलित–बहुजन प्रतिनिधित्व संख्यात्मक रूप से बढ़ सकता है, किंतु निर्णय-निर्माण की शक्ति संकेंद्रित बनी रहती है—जिससे आंबेडकर की यह चेतावनी पुष्ट होती है कि आर्थिक शक्ति के बिना राजनीतिक प्रतिनिधित्व खोखला है।

इस प्रकार चुनावी लोकतंत्र कमजोर पुनर्वितरण, विरोध के अपराधीकरण और श्रम व जाति-आधारित आंदोलनों के दमन के साथ सहअस्तित्व में रहता है।

6. जाति–वर्ग राजनीति का विस्थापन

हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ जाति–वर्ग राजनीति को व्यवस्थित रूप से विस्थापित करता है, सामाजिक संघर्षों को इस प्रकार पुनर्परिभाषित करते हुए: हिंदू बनाम मुसलमान, राष्ट्रवादी बनाम राष्ट्र-विरोधी तथा सांस्कृतिक अंदरूनी बनाम विदेशी प्रभाव।

यह विखंडन पूँजी को लाभ पहुँचाता है, क्योंकि इससे दलित–बहुजन–आदिवासी–श्रमिक गठबंधनों का निर्माण रुक जाता है जो आर्थिक संकेन्द्रण और जातिगत विशेषाधिकार को चुनौती दे सकते थे।

आंबेडकर ने कहा था कि जाति उत्पीड़ितों के बीच नैतिक और राजनीतिक समुदाय के निर्माण को रोकती है। हिंदुत्व इसी संरचनात्मक कमजोरी का उपयोग असमान राजनीतिक अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में करता है।

7. लोकतांत्रिक संस्थाएँ और असंवैधानिक प्रवृत्ति

आंबेडकर ने संविधान को कानून और संस्थागत सुरक्षा के माध्यम से जाति के उन्मूलन का उपकरण माना था। हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ इस दृष्टि को स्वायत्त संस्थाओं को कमजोर करके, संवैधानिक नैतिकता का क्षरण करके तथा अधिकार-आधारित नागरिकता को सांस्कृतिक निष्ठा से प्रतिस्थापित करके कमजोर करता है

भूमि अधिग्रहण या निजीकरण का विरोध करने वाले दलित, आदिवासी, श्रमिक और अल्पसंख्यक आंदोलनों के विरुद्ध दमन, राज्य सत्ता के वर्ग–जाति चरित्र को उजागर करता है।

8. तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य: जाति पूँजीवाद और वैश्विक अधिनायकवाद

यद्यपि अन्य देशों में अधिनायकवादी नवउदारवादी शासन से समानताएँ दिखाई देती हैं, भारत का अनुभव विशिष्ट है क्योंकि यहाँ पूँजीवाद का संलयन जाति विचारधारा से हुआ है। नस्ल-आधारित लोकलुभावनवाद के विपरीत, हिंदुत्व प्राचीन श्रेणीबद्ध असमानता की व्यवस्था पर आधारित है, जो इसे गहरी सामाजिक वैधता और स्थायित्व प्रदान करती है।

इससे प्रतिरोध अधिक जटिल हो जाता है, क्योंकि आर्थिक शोषण धार्मिक संबद्धता और प्रतीकात्मक मान्यता के आवरण में छिप जाता है।

9. निष्कर्ष

आंबेडकरवादी और दलित–बहुजन राजनीतिक अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ बहुसंख्यक शासन के अंतर्गत जाति पूँजीवाद के सुदृढ़ीकरण का प्रतिनिधित्व करता है। यह असमानता को गहराता है, संवैधानिक लोकतंत्र को खोखला करता है और सामाजिक व आर्थिक लोकतंत्र की मुक्ति-संभावनाओं को सीमित करता है।

आंबेडकर की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है: जाति के उन्मूलन और पूँजी के लोकतंत्रीकरण के बिना राजनीतिक लोकतंत्र मात्र एक मुखौटा रहेगा। अतः वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती देने के लिए ब्राह्मणवाद और कॉरपोरेट सत्ता—दोनों का एक साथ सामना करना अनिवार्य है।

साभार: ChatGPT

 

भारत में लोकतांत्रिक अवनति: एक आंबेडकरवादी संवैधानिक विश्लेषण

  भारत में लोकतांत्रिक अवनति: एक आंबेडकरवादी संवैधानिक विश्लेषण -     एस आर दारापुरी आई. पी. एस. (से. नि.)   यह शोध-पत्र भारत में लोकत...