दलित राजनीति को डॉ. बी. आर. अम्बेडकर से सीख लेकर नया क्रांतिकारी एजेंडा अपनाना होगा
एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट
प्रस्तावना
स्वतंत्र भारत में दलित राजनीति की यात्रा एक गहरे विरोधाभास को प्रस्तुत करती है। एक ओर, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के नेतृत्व में चले संघर्षों तथा संवैधानिक प्रावधानों के कारण दलितों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा, आरक्षण तथा सार्वजनिक संस्थानों में भागीदारी के अभूतपूर्व अवसर प्राप्त हुए हैं। दूसरी ओर, जातिगत उत्पीड़न, सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक विषमता और दलितों के विरुद्ध हिंसा आज भी नए और पुराने दोनों रूपों में विद्यमान है। यह स्थिति समकालीन दलित राजनीति की दिशा, सीमाओं और भविष्य को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
आज की ऐतिहासिक आवश्यकता यह है कि अम्बेडकरवादी राजनीति की वैचारिक बुनियादों की पुनर्समीक्षा की जाए और ऐसा नया क्रांतिकारी एजेंडा विकसित किया जाए जो पारंपरिक जातिगत उत्पीड़न के साथ-साथ नवउदारवादी भारत में उभर रहे आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व का भी सामना कर सके। इसके लिए केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व और चुनावी गणित से आगे बढ़कर सामाजिक न्याय, आर्थिक लोकतंत्र, संवैधानिक नैतिकता और मानवीय गरिमा पर आधारित परिवर्तनकारी राजनीति की आवश्यकता है।
अम्बेडकर की जाति व्यवस्था संबंधी क्रांतिकारी समझ
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर जाति को केवल सामाजिक पूर्वाग्रह या भेदभाव की समस्या नहीं मानते थे। उनके अनुसार जाति भारतीय समाज की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना में गहराई से अंतर्निहित “क्रमबद्ध असमानता” की एक संगठित व्यवस्था है। जहाँ अनेक सुधारवादी विचारक जाति को नैतिक समस्या मानकर सामाजिक सद्भाव के माध्यम से उसका समाधान चाहते थे, वहीं अम्बेडकर ने इसे धार्मिक वैधता और भौतिक हितों द्वारा संचालित शोषण की संरचना के रूप में देखा।
उनकी प्रसिद्ध कृति जाति का विनाश भारतीय सामाजिक व्यवस्था की सबसे क्रांतिकारी आलोचनाओं में से एक है। अम्बेडकर ने स्पष्ट कहा कि जाति प्रथा भाईचारे को नष्ट करती है, समानता का निषेध करती है और लोकतंत्र को असंभव बना देती है। उनके अनुसार राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता जब तक उसके साथ सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र न हो।
अम्बेडकर की राजनीतिक दृष्टि तीन मूलभूत सिद्धांतों—स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—पर आधारित थी। ये मूल्य आधुनिक लोकतांत्रिक चिंतन तथा बौद्ध दर्शन से प्रेरित थे। उनका संघर्ष केवल दलित प्रतिनिधित्व के लिए नहीं बल्कि भारतीय समाज के पुनर्निर्माण के लिए था।
अम्बेडकर के बाद दलित राजनीति का रूपांतरण
अम्बेडकर के निधन के बाद दलित राजनीति एक नए चरण में प्रवेश करती है। संविधान के माध्यम से आरक्षण, राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक गतिशीलता के अवसर उत्पन्न हुए। दलित पैंथर्स तथा बाद में बहुजन आंदोलन जैसे संगठनों ने दलित चेतना को व्यापक रूप दिया।
किन्तु समय के साथ दलित राजनीति का एक बड़ा हिस्सा अत्यधिक चुनाववादी और समझौतावादी होता गया। सामाजिक परिवर्तन की मूल क्रांतिकारी दृष्टि धीरे-धीरे सत्ता साझेदारी और पहचान-आधारित राजनीति तक सीमित होती गई। राजनीतिक सफलता को मुख्यतः सीटों, मंत्रिपदों और प्रतीकात्मक मान्यता के आधार पर मापा जाने लगा।
इस प्रक्रिया के कई दुष्परिणाम सामने आए—
अम्बेडकरवादी राजनीति की वैचारिक गहराई कमजोर हुई। जनआंदोलनों की शक्ति में कमी आई। दलित उपजातियों के बीच विभाजन बढ़ा। प्रभुत्वशाली दलों पर निर्भरता बढ़ी। आर्थिक प्रश्नों की उपेक्षा हुई। जाति और पूँजीवाद के संबंधों की आलोचना कमजोर पड़ी।
फलतः दलित राजनीति अक्सर संसदीय सीमाओं में सिमट गई और व्यापक सामाजिक संरचनाओं को चुनौती देने में असफल रही।
नवउदारवाद और उत्पीड़न के बदलते स्वरूप
1990 के दशक के बाद नवउदारवादी आर्थिक नीतियों ने भारत की सामाजिक-आर्थिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया। निजीकरण, ठेका श्रम, श्रमिक अधिकारों का क्षरण, सार्वजनिक रोजगार में कमी और कॉरपोरेट पूँजी का केंद्रीकरण—इन सभी का सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव दलितों, आदिवासियों और श्रमिक वर्गों पर पड़ा।
जब सरकारी नौकरियाँ लगातार घट रही हों, तब केवल आरक्षण पर्याप्त नहीं रह जाता। साथ ही शिक्षा, पूँजी, डिजिटल संसाधनों और सामाजिक नेटवर्क तक असमान पहुँच ने नई आर्थिक संभावनाओं से दलितों को वंचित रखा है।
इसके अतिरिक्त जातिगत भेदभाव ने आधुनिक संस्थानों में नए रूप ग्रहण कर लिए हैं। विश्वविद्यालयों, कॉरपोरेट संस्थानों, मीडिया, आवास व्यवस्था और डिजिटल मंचों पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के जातिगत बहिष्कार मौजूद हैं। भूमि अधिकार, सामाजिक सम्मान या राजनीतिक स्वायत्तता की मांग करने पर दलितों के विरुद्ध हिंसा भी जारी है।
इसलिए समकालीन दलित राजनीति को केवल प्रतिनिधित्व की पुरानी राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहिए; उसे जाति और पूँजीवाद के गठजोड़ की आलोचना भी विकसित करनी होगी।
नए क्रांतिकारी एजेंडे की आवश्यकता
सामाजिक परिवर्तन के एजेंडे की पुनर्स्थापना
दलित राजनीति को अम्बेडकर की मूल परिवर्तनकारी दृष्टि की ओर लौटना होगा। जाति उन्मूलन को पुनः सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में लाना आवश्यक है। इसके लिए वैचारिक जागरण, जनसंगठन और सांस्कृतिक हस्तक्षेप जरूरी हैं।
दैनिक जीवन में जातिगत विशेषाधिकारों के सामान्यीकरण को चुनौती देने हेतु सामाजिक सुधार आंदोलनों, शैक्षिक अभियानों और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रसार की आवश्यकता है।
आर्थिक लोकतंत्र और पुनर्वितरण
अम्बेडकर आर्थिक न्याय के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने राज्य समाजवाद, श्रमिक अधिकारों और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण पर बल दिया था।
आज के दलित एजेंडे में निम्नलिखित मुद्दे शामिल होने चाहिए—
भूमि सुधार और भूमि वितरण, गुणवत्तापूर्ण सार्वभौमिक शिक्षा और स्वास्थ्य, रोजगार की गारंटी और श्रमिक अधिकार, निजी क्षेत्र में आरक्षण, शहरी आवास अधिकार, कॉरपोरेट एकाधिकार पर नियंत्रण एवं असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा
आर्थिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक अधिकार अधूरे रहेंगे।
उत्पीड़ित समूहों की व्यापक एकता
अम्बेडकर मानते थे कि शोषित समुदाय अलग-थलग रहकर मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। इसलिए दलित राजनीति को आदिवासियों, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं, श्रमिकों और किसानों के साथ व्यापक लोकतांत्रिक एकता स्थापित करनी होगी।
यह एकता केवल चुनावी समझौते नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, समानता और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित साझा संघर्ष होनी चाहिए।
संवैधानिक लोकतंत्र की रक्षा
अम्बेडकर ने चेतावनी दी थी कि सामाजिक असमानता के रहते लोकतंत्र खतरे में रहेगा। उन्होंने राजनीतिक व्यक्तिपूजा और अधिनायकवाद के विरुद्ध भी सावधान किया था।
आज लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण, नागरिक स्वतंत्रताओं पर हमले, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और असहमति के दमन जैसी प्रवृत्तियाँ संविधान और लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती हैं। दलित राजनीति को संविधान की रक्षा के लिए अग्रणी शक्ति बनना होगा।
संविधान केवल प्रतीकात्मक सम्मान का विषय न होकर जनआंदोलन का आधार बनना चाहिए।
बौद्धिक और सांस्कृतिक मुक्ति
अम्बेडकर शिक्षा को मुक्ति का सबसे महत्वपूर्ण साधन मानते थे। उनका विश्वास था कि शोषित समुदायों को अपना स्वतंत्र बौद्धिक नेतृत्व विकसित करना होगा।
आज दलित राजनीति को चाहिए कि वह—
स्वतंत्र मीडिया संस्थान विकसित करे, शोध केंद्र और वैचारिक मंच स्थापित करे, साहित्यिक और सांस्कृतिक आंदोलनों को प्रोत्साहित करे, डिजिटल माध्यमों का उपयोग वैचारिक हस्तक्षेप हेतु करे एवं राजनीतिक शिक्षा कार्यक्रम चलाए।
सांस्कृतिक और बौद्धिक स्वायत्तता के बिना राजनीतिक मुक्ति अधूरी रहेगी।
बौद्ध धर्म और नैतिक मानवतावाद
अम्बेडकर का बौद्ध धर्म ग्रहण केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि जातिगत असमानता के विरुद्ध नैतिक और दार्शनिक विद्रोह था। उन्होंने बौद्ध धर्म को तर्क, समानता, करुणा और मानवतावाद पर आधारित सामाजिक दर्शन के रूप में देखा।
आज अम्बेडकरवादी बौद्ध दृष्टि का महत्व इस बात में है कि वह सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा और लोकतांत्रिक नैतिकता के लिए वैचारिक आधार प्रदान करती है।
निष्कर्ष
समकालीन भारत में दलित राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व या सत्ता में सीमित भागीदारी अम्बेडकर के मुक्ति-दर्शन को पूरा नहीं कर सकती। जातिगत उत्पीड़न, आर्थिक असमानता और बढ़ती अधिनायकवादी प्रवृत्तियों के बीच एक नए क्रांतिकारी राजनीतिक एजेंडे की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है।
वास्तव में अम्बेडकर से सीखने का अर्थ है—जाति उन्मूलन, आर्थिक लोकतंत्र, संवैधानिक नैतिकता और मानवीय गरिमा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को पुनर्जीवित करना। दलित राजनीति को संकीर्ण चुनाववाद से आगे बढ़कर ऐसा व्यापक सामाजिक आंदोलन बनना होगा जो जाति, आर्थिक शोषण, सांप्रदायिकता और अधिनायकवाद—सभी को एक साथ चुनौती दे सके।
अम्बेडकरवादी राजनीति का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह सामाजिक क्रांतिकारिता को लोकतांत्रिक मूल्यों, आर्थिक न्याय को संवैधानिकता, और पहचान की राजनीति को व्यापक मानव मुक्ति के संघर्ष के साथ किस प्रकार जोड़ती है। केवल इसी मार्ग से एक समानतामूलक, लोकतांत्रिक और मानवीय समाज की स्थापना संभव है।
आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट (आईपीएफ) डा. अंबेडकर की जाति उन्मूलन, आर्थिक लोकतंत्र, संवैधानिक नैतिकता और मानवीय गरिमा के प्रति प्रतिबद्धता को स्वीकार करता है। फ्रन्ट उनकी आदिवासियों, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं, श्रमिकों और किसानों के साथ व्यापक लोकतांत्रिक एकता स्थापित करने के एजंडा से भी पूर्णतया सहमत है। इसी उद्देश्य से फ्रन्ट वर्तमान में रोजगार एवं सामाजिक अधिकार अभियान चला रहा है जिसे इन वर्गों का व्यापक समर्थन भी मिल रहा है। अतः आईपीएफ दलितों, आदिवासियों, अति पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों, श्रमिकों, महिलायों और किसानों से इस अभियान से जुड़ने की अपील करता है ताकि देश में हिन्दुत्व एवं कारपोरेट के गठजोड़ की राजनीति को परास्त करके लोकतान्त्रिक, धर्मनिरपेक्ष एवं जन राजनीति को स्थापित किया जा सके।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें