बुधवार, 26 नवंबर 2014

कानून और पूर्वाग्रह



कानून और पूर्वाग्रह
एस. आर. दारापुरी आई.पी.एस. (से.नि.)एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
भारत की जेलों में आधे से अधिक बंदी कमज़ोर वर्ग की जातियों के हैं जब किअमीर लोग कानून को धत्ता बता कर बच निकलते हैं.
हरेक देश  आधुनिकता और प्रगति का दावा बढ़ा  चढ़ा  कर करता है. फिर भी हरेक देश वर्गों का भद्दा ध्रुवीकरण, समाज के पायदान पर पड़े लोगों का शोषण, धन संपत्ति से वन्चितिकरण, सत्ता और विशेषधिकार की व्यवस्था को मज़बूत करता है. भारत में भी इसी प्रक्रिया के सुदृढ़ीकरण की उदाहरण दी जा रही है. इसी महीने जेलों पर जारी  की गयी सरकारी रिपोर्ट यह दर्शाती है कि दलित, आदिवासी और मुसलमान जो कि समाज का अति पिछड़ा वर्ग हैं  की जेलों में  बंद कैदियों की संख्या आधे  से अधिक है. सब से बड़ी हैरानी की बात यह है कि इन वर्गों की जनसँख्या देश की कुल जनसंख्या  का केवल 39% है जबकि जेलों में इन की जनसंख्या 53% है.
हाल में ही जेलों के बारे में जारी की गयी रिपोर्ट यह दर्शाती है कि हमारी व्यवस्था किस प्रकार विषमतावादी, अमीरों की पक्षधर और गरीबों के विरोध में खड़ी है. उदहारण के लिए 2013 में भारत की  जेलों में 4.2 लाख बंदी थे. इन में से 20% मुसलमान थे जब कि 2001 की जनगणना के अनुसार इन की आबादी देश की कुल आबादी का केवल 13% थी. दलितों की 17% आबादी के विरुद्ध जेलों में उन की संख्या 22% और आदिवासियों की 9% आबादी के विरुद्ध 11% थी.
अब तक हम सब लोग भली भांति अवगत हो चुके  हैं कि मुसलामानों को आतंक के मामलों में कैसे झूठा फंसाया जाता है. इन लोगों को बहुत देर के बाद न्याय मिल पाता है. जेल में लम्बे समय तक बंद रह कर छूटने और जीवन भर के लिए कलंकित हो जाने के कारण बीती ज़िन्दगी  को वापस लाना असंभव हो जाता है. हमारे वर्ग विभाजित समाज में गरीब लोगों को शिकार बनाना बहुत आसान है. इस भेदभाव वाली संस्कृति की व्ययस्था में अमीर और प्रभावशाली लोगों के लिए कानून से बच निकलना बहुत आसान है चाहे उन का अपराध कितना भी संगीन क्यों न हो. दागी मंत्री (केन्द्रीय मंत्री निहाल चाँद मेघवाल और राज्य सभा के उपसभापति कुरियन) संगीन आपराध के आरोपी होने के बावजूद भी अपने सत्ता के पदों पर विराजमान हैं. इसी प्रकार की नर्मी फंड का भारी अपव्यय करने और बड़े बड़े घोटालों के आरोपियों के मामलों में भी देखी जा सकती है. अक्सर सत्ता और विशेषाधिकार कानून के राज से ऊपर दिखाई देते  हैं जब कि यह केवल गरीबों पर ही लागू होता दिखाई देता है.
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा जेलों के बारे में 1995 से और 1999 से जातिवार जारी किये जा रहे आंकड़ों से यह देखा जा सकता है कि पिछले पंद्रह साल से दलित, मुस्लिम और आदिवासी कैदियों  की संख्या में कोई कमी नहीं आई है. साफ़ तौर पर यह हमारी व्यवस्था में जाति, साम्प्रदाय और वर्ग आधारित पूर्वाग्रह का ही परिणाम है. वे कानून को सामान रूप से लागू  करने में बहुत बड़ी बाधा हैं.
 इस बात में ही कुछ सांत्वना मिलती है कि केवल भारत ही ऐसा देश नहीं है जहाँ पर कानून व्यवस्था जाति, वर्ग और धर्म के पूर्वाग्रहों से प्रभावित होती है. अमेरिका जैसे विकसित देश की जेलों में भी रंगभेद का पूर्वाग्रह  काले और गोरे कैदियों की संख्या के अनुपात में स्पष्ट दिखाई देता है. नैशनल असोसिएशन फार प्रोटेक्शन आफ दी कलर्ड पीपुल्स द्वारा जारी  आंकड़े बताते हैं कि जेलों में बंद कुल 20.30 लाख लोगों में 10 लाख अफ्रीकन-अमेरिकन हैं जो कि गोरों की अपेक्षा 6 गुना अधिक हैं. इतना ही नहीं है. कहा जाता है कि अमेरिका में लगभग 1.40 करोड़ गोरे  और 2.60 करोड़ काले अवैध ड्रग्स का सेवन करते हैं. दूसरे शब्दों में काले लोगों के मुकाबले में 5 गुणा अधिक गोरे ड्रग्स का इस्तेमाल करते हैं परन्तु अवैध ड्रग इस्तेमाल करने के अपराध में जेल भेजे जाने वाले काले लोगों की दर गोरे  लोगों की दर से 10 गुना अधिक है.     

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

भाजपा द्वारा दलितों का ब्राह्मणीकरण



भाजपा द्वारा  दलितों का ब्राह्मणीकरण
एस.आर.दारापुरी आई. पी.एस. (से.नि.) तथा राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट  
पिछले लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कई दलित नेताओं जैसे राम विलास  पासवान और रामदास अठावले के साथ गठजोड़ किया था. उस ने उदित राज को अपनी पार्टी में शामिल करके दलितों में अपनी घुस पैठ बढ़ाई थी. चुनाव प्रणाम से सिद्ध हुआ कि इस में उसे आशातीत सफलता मिली थी. उत्तर प्रदेश में तो वह सभी 1आरक्षित सीटें जीत गयी थी. इस से प्रोत्साहित होकर और वर्तमान उपचुनावों के मद्देनज़र उस ने दलितों को आकर्षित करने का अभियान तेज़ कर दिया है. इस हेतु उस ने कई रणनीतियां अपनाई हैं. पहली रणनीति उनकी हिन्दू पहचान को उभारने की है और उन्हें बड़े हिन्दू समूह का हिस्सा बनाने की है. इस के लिए उसने राजनीति के संप्रदायीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत दलितों को मुसलामानों से लड़ाने की नीति अपनाई है. उस ने दलितों के मुसलामानों के साथ सामान्य विवादों को हिन्दू मुस्लिम झगड़े का रंग देने का काम किया है. उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद हिन्दू मुस्लिम टकराव की घटनाओं में से लगभग 70 घटनाएँ दलित मुस्लिम टकराव की थीं. इन में मुख्य मुरादाबाद जिले के कांठ गाँव की लाउड स्पीकर वाली घटना, सहारनपुर में सिख- मुस्लिम फसाद की घटना थी जिस में हिन्दुओं की तरफ से सब से अधिक दलित ही गिरफ्तार हुए थे तथा अन्य दलित लड़की और मुस्लिम लड़का या मुस्लिम लड़की और दलित लड़का वाली घटनाएँ शामिल हैं. इस प्रकार कम से कम उत्तर प्रदेश में तो भाजपा ने हिन्दू मुस्लिम फसाद के मामलों में दलितों को हिन्दू पक्ष का एक प्रमुख हिस्सा बना लिया है. इस से पहले भी भाजपा बाल्मीकियों, खटीकों और जाटवों का हिन्दू मुस्लिम फसाद में इस्तेमाल करती रही है.
भाजपा ने दलितों को आकर्षित करने के लिए दूसरा हथियार उन के ब्राह्मणीकरण का अपनाया है. इस द्वारा उस ने उन दलित उपजातियों में अपनी घुस पैठ बढ़ाई है जो अभी भी कट्टर हिन्दू हैं और दलितों की बड़ी उपजातियों के विरोध में रहती हैं. उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में चमार/जाटव दलितों की सब से बड़ी उपजाति है और पासी, बाल्मीकि, धोबी और खटीक छोटी उपजातियां है. परम्परा से यह छोटी उपजातियां चमार/जाटव उपजाति से प्रतिस्पर्धा और प्रतिरोध में रही हैं. इसी लिए ये उपजातियां राजनीतिक तौर पर भी इस बड़ी उपजाति से प्रतिस्पर्धा में रही हैं. बसपा का सब से बड़ा आधार चमार/जाटव उपजाति रही है और यह छोटी उपजातियां बसपा के साथ थोड़ी हद तक ही जुडी थीं. यह उपजातियां बसपा से प्रतिक्रिया में भाजपा अथवा समाजवादी पार्टी के साथ रही हैं. दलितों के सामाजिक विभाजन का असर उन के राजनीतिक जुड़ाव पर भी दिखाई देता है. उत्तर प्रदेश में पिछले विधान सभा चुनाव में यह उप जातियां सपा की तरफ गयी थीं और मायावती से रुष्ट हो कर चमार/जाटव वोटर भी सपा की तरफ गए थे. पूर्व में कांग्रेस और भाजपा भी इन जातियों को सीमित सीमा में अपनी पार्टी में समाहित करने में सफल रही हैं. मायावती की गलत नीतियों के कारण इन उपजातियों में यह धारणा पनप गयी थी कि बसपा केवल चमारो/जाटवों की पार्टी है और इस का लाभ केवल उन्हीं तक सीमित है. इस आरोप में काफी सच्चाई भी है. अतः ये उप जातियां बसपा की जगह दूसरी पार्टियों में अपना स्थान ढूंढती रही हैं और इधर बसपा से लगभग अलगाव में चली गयी हैं जिस का खामियाजा मायावती को 2012 और 2014 के चुनाव में भुगतना पड़ा. यही स्थिति रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया के समय में थी. देश के दूसरे राज्यों में भी इसी प्रकार का सामाजिक और राजनैतिक विभाजन है. . महाराष्ट्र में महार दलितों की सब से बड़ी उपजाति है और चम्भार और ढेड छोटी उपजातियां हैं. वहां पर उसी प्रकार का सामाजिक और राजनैतिक विभाजन है. आन्ध्र प्रदेश में भी माला और मादिगा में सामाजिक और राजनैतिक विभाजन है. कर्नाटिक में भी ऐसा ही उपजाति बटवारा है. भाजपा की इन उपजातियों में काफी समय से पैठ रही है.
दलितों के इस राजनैतिक और सामाजिक बटवारे का कारण राजनैतिक आरक्षण भी है. वर्तमान संयुक्त मताधिकार प्रणाली के अंतर्गत आरक्षित सीटों पर वही दलित जीत पाता है जो सवर्ण जातियों का वोट प्राप्त कर सकता है. चूँकि सवर्ण वोट सवर्ण राजनैतिक पार्टियों के पास रहता है अतः वे जिस को चाहते हैं वह ही जीत पाता  है. यह व्यवस्था दलित पार्टियों की सब से बड़ी कमजोरी है. अतः यह देखा गया है अधिकतर आरक्षित सीटें सवर्ण पार्टियों द्वारा ही जीत ली जाती हैं. इसी लिए सवर्ण पार्टियाँ अपने स्वामिभक्त और हलके फुल्के दलितों को खड़ा करके आरक्षित सीटें जीत लेती हैं और दलित पार्टियों के अच्छे से अच्छे उमीदवार हार जाते हैं. इसी कुचक्र में डॉ. आंबेडकर को दो  बार हार का मुंह देखना पड़ा था. दरअसल अलग मताधिकार के अंतर्गत दलितों को राजनीतिक स्वतंत्रता का जो अधिकार मिला था उसे गाँधी जी ने अनुचित दबाव में पूना पैकट के अंतर्गत छीन लिया जिस का खामियाजा आज तक दलित भुगत रहे हैं. अब दलित राजनीतिक तौर पर बड़ी सवर्ण पार्टियों के गुलाम हैं और इस ने दलितों के अन्दर एक स्वार्थी और लम्पट तबके को पैदा कर दिया है जो चुनाव तो दलितों के नाम पर जीतता है परन्तु वफ़ादारी सवर्ण आकाओं की निभाता है. भाजपा ने भी इस चुनाव में इसी व्यवस्था का लाभ फायदा उठाया है और सब से अधिक आरक्षित सीटें जीती हैं और आगे भी काफी आशान्वित है.
दरअसल दलितों में शुरू से ही दो प्रकार की सांस्कृतिक  विचारधारा पनपती रही है. एक हिन्दू धर्म और ब्राह्मणवाद के खिलाफ और दूसरी उसकी पक्षधर. पुराने समय में भक्ति आन्दोलन और वर्तमान में अम्बेडकरवाद के प्रभाव में कुछ उपजातियां ब्राह्मणवाद के विरोध में खड़ी हुयी थीं और कुछ उपजातियां हिन्दू धर्म के दायरे में ही रहीं. पंजाब में आदि-धर्म आन्दोलन, उत्तर प्रदेश में आदि-हिन्दू आन्दोलन, आंध्र में आदि-आंध्र, तमिलनाडू में आदि-द्रविड़ आन्दोलन और बंगाल में नमोशूद्र आन्दोलन इस के प्रमुख आन्दोलन रहे हैं. बीसवीं सदी में डॉ. आंबेडकर के प्रभाव में हिन्दू धर्म के खिलाफ एक देश व्यापी आन्दोलन चला जिस की परिणति 1956 में हिन्दू धर्म का त्याग और बौद्ध धम्म का स्वीकार है. एक तरफ हिन्दू धर्म छोड़ कर बौद्ध धम्म ग्रहण करने वालों की संख्या में बहुत बड़ी वृद्धि हो रही है वहीँ दूसरी ओर दलितों की छोटी उपजातियों का ब्राह्मणीकरण हो रहा है.
हाल में आर.एस.एस. ने दलितों की छोटी हिन्दू उप-जातियों को पटाने के लिए तीन पुस्तकों का विमोचन किया है जिस में कहा गया है कि खटीक, बाल्मीकि और चमार पूर्व में क्षत्री जातियां थीं परन्तु मुसलामानों ने उन्हें अपना गुलाम कर प्रताड़ित किया और नीच बना दिया और भाजपा उन्हें फिर से क्षत्री बना कर सम्मान दे रही है. इस से कुछ दलित उपजातियों के भाजपा के जाल में फंसने की पूरी सम्भावना है क्योंकि एक तो वे अभी तक हिन्दू बनी हुयी हैं और दूसरे वे बड़ी उपजातियों से प्रतिक्रिया में रहती हैं. इस के इलावा वर्तमान चुनाव प्रक्रिया से भाजपा उन्हें आरक्षित सीटें जितवा कर राजनीतिक लाभ भी पहुंचाने की स्थिति में है. इस हालत के लिए दलितों की राजनितिक पार्टियाँ भी काफी हद तक जिम्मेवार हैं जिन्होंने इन उपजातियों को उचित प्रतिनिधित्व न देकर भाजपा को उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करने का अवसर दिया है जिस से हिंदुत्व मज़बूत हुआ है. एक तरीके से जातिवादी राजनीति भी हिंदुत्व को ही मज़बूत करती है क्योंकि धर्म की राजनीति जाति को माध्यम  बना कर वोटों का ध्रुवीकरण करती है.
अतः दलितों को जाति की राजनीति के स्थान पर मुद्दों की राजनीति को अपनाना होगा जो जाति को तोड़ कर दलितों और गैर दलितों को एकजुट कर सकती है. हिंदुत्व दलितों के लिए सब से बड़ा खतरा है क्योंकि हिंदुत्व वर्ण वयस्था का पक्षधर है जो जाति व्यवस्था को मज़बूत करता है. जाति व्यवस्था शोषण की व्यवस्था है जिस का सब से बड़े शिकार दलित ही हैं. अतः दलितों को आर.एस.एस. द्वारा जाति उच्चीकरण के नाम पर फैंके जा रहे हिंदुत्व के जाल में फंसने से बचना होगा. उन्हें जाति की राजनीति के स्थान पर मुद्दों की राजनीति को अपनाना होगा. उन्हें अपने फायदे के लिए हिंदुत्ववादी ताकतों के साथ जाति के नाम पर सौदा करने वाले दलित नेताओं से भी बचना होगा. उनकी मुक्ति तो डॉ. आंबेडकर के जाति विनाश के आन्दोलन को मज़बूत करने से ही संभव है न कि जाति को सुदृढ़ करने से. धर्म आधारित हिंदुत्व की जातिवादी राजनीति उन्हें गुलामी की ओर ही ले जायेगी मुक्ति की ओर नहीं. उन्हें डॉ. आंबेडकर के भारत में जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य को पूरा करने में अग्रगणी भूमिका निभानी होगी.       

  

श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका एस.आर. दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय पीपुल्स फ्रंट (आज 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष) भीमराव रामजी अंबेडकर ने आधुनिक भारत में श्रम कल्याण नीति को आकार देने में एक बुनियादी और अक्सर कम सराही गई भूमिका निभाई। उनका योगदान केवल संवैधानिक आदर्शों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वायसराय की कार्यकारी परिषद (1942–1946) में 'श्रम सदस्य' के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने व्यावहारिक श्रम सुधारों में भी गहरी भूमिका निभाई। उनके काम ने कई ऐसे अधिकारों और सुरक्षा उपायों की नींव रखी, जिनसे भारतीय श्रमिकों को आज भी लाभ मिल रहा है। 1. संस्थागत और नीतिगत नेतृत्व ब्रिटिश भारत के तहत 'श्रम सदस्य' के रूप में, अंबेडकर असल में 'श्रम मंत्री' ही थे। इस भूमिका में, उन्होंने श्रम प्रशासन को एक औपनिवेशिक, शोषणकारी ढांचे से बदलकर अधिक कल्याण-उन्मुख प्रणाली में बदल दिया। उन्होंने श्रमिकों को अनियंत्रित पूंजीवाद से बचाने के लिए राज्य के हस्तक्षेप की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने भारत के भीतर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के ढांचे को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे भारतीय श्रम नीतियां अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो गईं। 2. काम के घंटों में कमी अंबेडकर की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक भारत में '8 घंटे के कार्यदिवस' की शुरुआत करना था। इस सुधार से पहले, औद्योगिक श्रमिक अक्सर कठोर परिस्थितियों में दिन में 12–14 घंटे काम करते थे। इस सुधार ने भारत को वैश्विक श्रम मानकों के बराबर ला खड़ा किया और मानवीय कार्य परिस्थितियों की दिशा में एक बड़ा बदलाव लाया। 3. सामाजिक सुरक्षा उपाय अंबेडकर का दृढ़ विश्वास था कि राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा भी होनी चाहिए। उन्होंने कई सामाजिक सुरक्षा उपायों की वकालत की और उन्हें शुरू किया, जिनमें शामिल हैं: महिला श्रमिकों के लिए मातृत्व लाभ, कार्यस्थल पर चोट लगने पर मुआवज़ा, और भविष्य निधि (Provident fund) योजनाएं इन उपायों ने बाद में 'कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948' और 'कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952' जैसे कानूनों को प्रभावित किया। 4. महिला श्रमिकों की सुरक्षा अंबेडकर श्रम क्षेत्र में लैंगिक न्याय के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने ऐसी नीतियां पेश कीं जिनसे यह सुनिश्चित हो सके: सवेतन मातृत्व अवकाश, खदानों में महिलाओं के लिए भूमिगत काम पर प्रतिबंध, और समान वेतन तथा बेहतर कार्य-स्थितियां। उस समय के हिसाब से उनका दृष्टिकोण प्रगतिशील था और सामाजिक न्याय के उनके व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप था। 5. ट्रेड यूनियन अधिकार और औद्योगिक संबंध अंबेडकर ने सामूहिक सौदेबाजी के महत्व को पहचाना और ट्रेड यूनियनों के विकास का समर्थन किया। उन्होंने इन लक्ष्यों की दिशा में काम किया: ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता, औद्योगिक विवादों के समाधान के लिए तंत्र, और त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलनों (सरकार, नियोक्ता, श्रमिक) को बढ़ावा देना उनके प्रयासों ने संवाद को संस्थागत बनाने और औद्योगिक संघर्ष को कम करने में मदद की। 6. न्यूनतम वेतन और उचित स्थितियां हालांकि न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 स्वतंत्रता के बाद लागू किया गया था, लेकिन अंबेडकर के विचारों ने इसके ढांचे को काफी हद तक प्रभावित किया। उन्होंने लगातार यह तर्क दिया कि श्रम कोई वस्तु नहीं है, और एक गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के लिए श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिए। 7. श्रमिक कल्याण कोष और आवास अंबेडकर ने श्रमिकों के आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा में सहायता के लिए कल्याण कोष की वकालत की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि औद्योगिक विकास में कार्यस्थल से परे श्रमिकों की भलाई के लिए भी प्रावधान शामिल होने चाहिए। 8. श्रमिक कल्याण के लिए संवैधानिक दृष्टिकोण भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में, अंबेडकर ने श्रमिक कल्याण को 'राज्य के नीति निदेशक तत्वों' (अनुच्छेद: 39, 41, 42 और 43) में शामिल किया, जिसमें ये अधिकार शामिल हैं: काम का अधिकार, काम की न्यायसंगत और मानवीय स्थितियां, जीवन-निर्वाह योग्य वेतन, और बेरोजगारी, बीमारी तथा वृद्धावस्था की स्थिति में सार्वजनिक सहायता ये सिद्धांत उनके इस विश्वास को दर्शाते हैं कि लोकतंत्र को सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना ही चाहिए। 9. व्यापक दार्शनिक योगदान अंबेडकर का श्रम दर्शन गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित था। कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों से प्रभावित होने के बावजूद, उनका दृष्टिकोण उनसे भिन्न था; उन्होंने हिंसक क्रांति को अस्वीकार कर दिया और इसके बजाय श्रमिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों की वकालत की। निष्कर्ष श्रमिक कल्याण के क्षेत्र में डॉ. अंबेडकर का योगदान अत्यंत परिवर्तनकारी था। उन्होंने केवल आर्थिक उत्पादकता पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, मानव गरिमा और सामाजिक न्याय को केंद्र में ला दिया। समकालीन भारत में श्रमिकों को प्राप्त कई सुरक्षात्मक उपाय और अधिकार, उन्हीं के दृष्टिकोण और नीतिगत पहलों से प्रेरित हैं। डा. अंबेडकर मजदूरों को न केवल अपने अधिकारों के लिए ही लड़ने के लिए संगठित होने बल्कि राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के लिए भी प्रेरित किया। उनका कार्य हमें यह याद दिलाता है कि श्रमिक कल्याण केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि एक नैतिक और संवैधानिक अनिवार्यता है, जो एक न्यायपूर्ण समाज के लिए अत्यंत केंद्रीय महत्व रखती है।

श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका एस.आर. दारापुरी , राष्ट्रीय अध्यक्ष , अखिल भारतीय पीपुल्स फ्रंट (आज 1 मई को अंतर्राष्...